सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासन पर्व) के इक्कीसवाँ अध्याय व बाईसवाँ अध्याय (From the 21 chapter and the 22 chapter of the entire Mahabharata (anushashn Parva))
सम्पूर्ण महाभारत अनुशासनपर्व (दान धर्मपर्व ) इक्कीसवाँ अध्याय (सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) इक्कीसवें अध्याय के श्लोक 1-20 का हिन्दी अनुवाद) “अष्टावक्र और …
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सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासन पर्व) के उन्नीसवाँ अध्याय व बीसवाँ अध्याय (From the 19 chapter and the 20 chapter of the entire Mahabharata (anushashn Parva))
सम्पूर्ण महाभारत अनुशासनपर्व (दान धर्मपर्व ) उन्नीसवाँ अध्याय (सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) उन्नीसवें अध्याय के श्लोक 1-104 का हिन्दी अनुवाद) “अष्टावक्र मु…
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सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासन पर्व) के अट्ठारहवाँ अध्याय (From the 18 chapter of the entire Mahabharata (anushashn Parva))
सम्पूर्ण महाभारत अनुशासनपर्व (दान धर्मपर्व ) अट्ठारहवाँ अध्याय (सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) अट्ठारहवें अध्याय के श्लोक 1-83 का हिन्दी अनुवाद) “शिवसहस्रनाम…
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सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासन पर्व) के सत्तरहवाँ अध्याय (From the 17 chapter of the entire Mahabharata (anushashn Parva))
सम्पूर्ण महाभारत अनुशासनपर्व (दान धर्मपर्व ) सत्तरहवाँ अध्याय (सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) सत्तरहवें अध्याय के श्लोक 1-182 का हिन्दी अनुवाद) “शिवसहस्रनामस…
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- प्रबिसि नगर कीजे सब काजा। हृदय राखि कोसलपुर राजा। गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई।। अर्थात ;- अयोध्याजी के राजा श्री रामचंद्रजी को मन में रख कर जो सब काम करता है उसके लिये विष भी अमृत बन जाता है, शत्रु मित्र बन जाते हैं, समुद्र गाय के खुर जितना छोटा हो जाता है, अग्नि में शीतलता आ जाती है। professional website click on this link. click here website demo
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