सम्पूर्ण महाभारत (आदि पर्व) का दूसरा अध्याय (The second chapter of the entire Mahabharata (Aadi Parv))


 सम्पूर्ण महाभारत 

आदि पर्व (पर्वसंग्रह पर्व)

द्वितीय अध्याय

(सम्पूर्ण महाभारत (आदि पर्व) द्वितीय अध्याय के श्लोक 1-20 का हिन्दी अनुवाद)

"समन्तपंचक क्षेत्र का वर्णन, अक्षौहिणि सेना का प्रमाण, महाभारत में वर्णित पर्वों और उनके संक्षिप्त विषयों का संग्रह तथा महाभारत के श्रवण एवं पठन का फल"

ऋषि बोले ;- सूतनन्दन! आपने अपने प्रवचन के प्रारम्भ में जो समन्तपंचक (कुरुक्षेत्र) की चर्चा की थी, अब हम उस देश (तथा वहाँ हुए युद्ध) के सम्बन्ध में पूर्ण रूप से सब- कुछ यथावत सुनना चाहते हैं। 

उग्रश्रवा जी ने कहा ;- साधुशिरोमणि विप्रगण! अब मैं कल्याणदायिनी शुभ कथाएँ कह रहा हूँ; उसे आप लोग सावधान चित्त से सुनिये और इसी प्रसंग में समन्तपंचकक्षेत्र का वर्णन भी सुन लीजि‍ये। त्रेता और द्वापर की सन्धि के समय शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ परशुराम जी ने क्षत्रियों के प्रति क्रोध से प्रेरित होकर अनेकों बार क्षत्रिय राजाओं का संहार किया। अग्नि के समान तेजस्वी परशुराम जी ने अपने पराक्रम से सम्पूर्ण क्षत्रियवंश का संहार करके समन्तपंचकक्षेत्र में रक्त के पाँच सरोवर बना दिये।

क्रोध से आविष्ट होकर परशुराम जी ने उन रक्त रूप जल से भरे हुए सरोवरों में रक्तांजलि के द्वारा अपने पितरों का तर्पण किया, यह बात हमने सुनी है। तदनन्तर, 

ऋचीक आदि पितृगण परशुराम जी के पास आकर बोले ;- महाभारत राम! सामर्थ्‍यशाली भृगुवंशभूषण परशुराम! तुम्हारी इस पितृभक्ति और पराक्रम से हम बहुत ही प्रसन्न हैं। महाप्रतापी परशुराम! तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हें जिस वर की इच्छा हो हमसे माँग लो।'

परशुराम जी ने कहा ;- यदि आप सब हमारे पितर मुझ पर प्रसन्न हैं और मुझे अपने अनुग्रह का पात्र समझते हैं तो मैंने जो क्रोधवश क्षत्रियवंश का विध्वंस किया है, इस कुकर्म के पाप से मैं मुक्त हो जाऊँ और ये मेरे बनाये हुए सरोवर पृथ्वी में प्रसिद्ध तीर्थ हो जायें। यही वर मैं आप लोगों से चाहता हूँ। तदनन्तर ‘ऐसा ही होगा’ यह कहकर पितरों ने वरदान दिया। साथ ही ‘अब बचे खुचे क्षत्रिय वंश को क्षमा कर दो’- ऐसा कहकर उन्हें क्षत्रियों के संहार से भी रोक दिया।

इसके पश्चात परशुराम जी शान्त हो गये। उन रक्त से भरे सरोवरों के पास जो प्रदेश है उसे ही समन्तपंचक कहते हैं। यह क्षेत्र बहुत ही पुण्यप्रद है। जिस चिह्न से जो देश युक्त होता है और जिससे जिसकी पहचान होती है, विद्वानों का कहना है कि उस देश का वही नाम रखना चाहिये। जब कलियुग और द्वापर की सन्धि का समय आया, तब उसी समन्तपंचक क्षेत्र में कौरवों और पाण्डवों की सेनाओं का परस्पर भीषण युद्ध हुआ। भूमि सम्बन्धी दोषों से रहित उस परम धार्मिक प्रदेश में युक्त करने की इच्छा से अठारह अक्षौहिणी सेनाएँ इकट्ठी हुई थी।

ब्राह्मणों! वे सब सेनाएँ वहाँ इकट्ठी हुईं और वहीं नष्ट हो गयीं। द्विजवरों! इसी से उस देश का नाम समन्तपंचक पड़ गया। वह देश अत्यन्त पुण्यमय एवं रमणीय कहा गया है। उत्तम व्रत का पालन करने वाले श्रेष्ठ ब्राह्मणों! तीनों लोकों में जिस प्रकार उस देश की प्रसिद्धि हुई थी, वह सब मैंने आप लोगों से कह दिया।

ऋषियों ने पूछा ;- सूतनन्दन! अभी-अभी आपने जो अक्षौहिणी शब्द का उच्चारण किया है, इसके सम्बन्ध में हम लोग सारी बातें यथार्थ रूप से सुनना चाहते हैं। अक्षौहिणी सेना में कितने पैदल, घोड़े, रथ और हाथी होते हैं? इसका हमें यथार्थ वर्णन सुनाइये, क्योंकि आपको सब कुछ ज्ञात है।

उग्रश्रवा जी ने कहा ;- एक रथ, एक हाथी, पाँच पैदल सैनिक और तीन घोड़े- बस, इन्हीं को सेना के सर्मज्ञ विद्वानों ने ‘पत्ति’ कहा है। इसी पत्ति की तिगुनी संख्या को विद्वान पुरुष ‘सेनामुख’ कहते हैं। तीन ‘सेनामुखों’ को एक ‘गुल्म’ कहा जाता है।

(सम्पूर्ण बमहाभारत (आदि पर्व) द्वितीय अध्याय के श्लोक 21-41 का हिन्दी अनुवाद)

  तीन गुल्म का एक ‘गण’ होता है, तीन गण की एक ‘वाहिनी’ होती है और तीन वाहिनियों को सेना का रहस्य जानने वाले विद्वानों ने ‘पृतना’ कहा है। तीन पृतना की एक ‘चमू’ तीन चमू की एक ‘अनीकिनी’ और दस अनीकिनी की एक ‘अक्षौहिणी’ होती है। यह विद्वानों का कथन हैं। 

   श्रेष्ठ ब्राह्मणों! गणित के तत्त्वज्ञ विद्वानों ने एक अक्षौहिणी सेना में रथों की संख्या इक्कीस हजार आठ सौ सत्तर (21870) बतलायी है। हाथियों की संख्या भी इतनी ही रहनी चाहिये। निष्पाप ब्राह्मणों! एक अक्षौहिणी में पैदल मनुष्यों की संख्या एक लाख नौ हजार तीन सौ पचास (109350) जाननी चाहिये। एक अक्षौहिणी सेना में घोड़ों की ठीक-ठीक संख्या पैंसठ हजार छः सौ दस (65610) कही गयी है। तपोधनों! संख्या का तत्त्व जानने वाले विद्वानों ने इसी को अक्षौहिणी कहा है, जिसे मैंने आप लोगों को विस्तारपूर्वक बताया है।

   श्रेष्ठ ब्राह्मणों! इसी गणना के अनुसार कौरवों-पाण्डव दोनों सेनाओं की संख्या अठारह अक्षौहिणी थी। अद्भुत कर्म करने वाले काल की प्रेरणा से समन्तपंचक क्षेत्र में कौरवों को निमित्त बनाकर इतनी सेनाएँ इकट्ठी हुईं और वहीं नाश को प्राप्त हो गयीं। अस्त्र-शस्त्रों के सर्वोपरि मर्मज्ञ भीष्म पितामह ने दस दिनों तक युद्ध किया, द्रोणाचार्य ने पाँच दिनों तक कौरव सेना की रक्षा की। शत्रु सेना को पीड़ित करने वाले वीरवर कर्ण ने दो दिन युद्ध किया और शल्य ने आधे दिन तक। इसके पश्चात (दुर्योधन और भीमसेन का परस्पर) गदायुद्ध आधे दिन तक होता रहा।

   अठारहवाँ दिन बीत जाने पर रात्रि के समय अश्वत्थामा, कृतवर्मा और कृपाचार्य ने निःशंक सोते हुए युधिष्ठिर के सैनिकों को मार डाला। शौनक जी! आपके इस सत्संग सत्र में मैं यह जो उत्तम इतिहास महाभारत सुना रहा हूँ, यही जनमेजय के सर्पयज्ञ में व्यास जी के बुद्धिमान शिष्य वैशम्पायन जी के द्वारा भी वर्णन किया गया था। उन्होंने बड़े-बड़े नरपतियों के यश और पराक्रम का विस्तारपूर्वक वर्णन करने के लिये प्रारम्भ में पौष्य, पौलोम और आस्तीक- इन तीन पर्वों का स्मरण किया है। जैसे मोक्ष चाहने वाले पुरुष वैराग्य की शरण ग्रहण करते हैं, वैसे ही प्रज्ञावान मनुष्य अलौकिक अर्थ, विचित्र पद, अदभुत आख्यान और भाँति-भाँति की परस्पर विलक्षण मर्यादाओं से युक्त इस महाभारत का आश्रय ग्रहण करते हैं। जैसे जानने योग्य पदार्थों में आत्मा, प्रिय पदार्थों में अपना जीवन सर्वश्रेष्ठ है, वैसे ही सम्पूर्ण शास्त्रों पर ब्रह्म परमात्मा की प्राप्ति रूप प्रयोजन को पूर्ण करने वाला यह इतिहास श्रेष्ठ है।

   जैसे भोजन किये बिना शरीर-निर्वाह सम्भव नहीं है, वैसे ही इस इतिहास का आश्रय किये बिना पृथ्वी पर कोई कथा नहीं है। जैसे अपनी उन्नति चाहने वाले महात्वाकांक्षी सेवक अपने कुलीन और सद्भावसम्पन्न स्वामी की सेवा करते हैं, इसी प्रकार संसार के श्रेष्ठ कवि इस महाभारत की सेवा करके ही अपने काव्य की रचना करते हैं। जैसे लौकिक और वैदिक सब प्रकार के ज्ञान को प्रकाशित करने वाली सम्पूर्ण वाणी स्वरों एव व्यंजनों में समायी रहती है, वैसे ही (लोक, परलोक एवं परमार्थ सम्बन्धी) सम्पूर्ण उत्तम विद्या, बुद्धि इस श्रेष्ठ इतिहास में भरी हुई है। यह महाभारत इतिहास ज्ञान का भण्डार है। इसमें सूक्ष्म से सूक्ष्म पदार्थ और उनका अनुभवन कराने वाली युक्तियाँ भरी हुई हैं। इसका एक-एक पद और पर्व आश्चर्यजनक है तथा यह वेदों के धर्ममय अर्थ से अलंकृत है। अब इसके पर्वों की संग्रह-सूची सुनिये। पहले अध्याय में पर्वानुक्रमणी है और दूसरे में पर्व संग्रह।

(सम्पूर्ण महाभारत (आदि पर्व) द्वितीय अध्याय के श्लोक 42-72 का हिन्दी अनुवाद)

  इसके पश्चात पौष्य, पौलोम, आस्तीक और आदि अंशावतरण पर्व हैं। तदनन्तर सम्भव पर्व का वर्ण है, जो अत्यन्त अदभुत और रोमांचकारी है। इसके पश्चात जंतुगृह (लाक्षाभवन) दाहपर्व है। तदनन्तर हिडिम्बवध पर्व है, फिर बकवध और उसके बाद चैत्ररथ पर्व है। उसके बाद पांचाल राजकुमार देवी द्रौपदी के स्वयंवर पर्व का तथा क्षत्रिय धर्म से सब राजाओं पर विजय प्राप्तिपूर्वक वैवाहिक पर्व का वर्णन है। विदुरागमन-राज्यलम्भपर्व, तत्पश्चात अर्जुन-वनवास पर्व और फिर सुभद्राहरण पर्व है। सुभद्राहरण के बाद हरणाहरण पर्व है, पुनः खाण्डवदाह पर्व है, उसी में मय-दानव के दर्शन की कथा है। इसके बाद क्रमशः सभापर्व, मन्त्रपर्व, जरासन्ध-वध पर्व और दिग्विजय पर्व का प्रवचन है। तदनन्तर राजसूय अर्धाभिहरण और शिशुपालवध पर्व कहे गये हैं।

  इसके बाद क्रमशः द्यूत एवं अनुद्यूत पर्व हैं। तत्पश्चात वनयात्रा पर्व तथा किर्मीरवध पर्व है। इसके बाद अर्जुनाभिगमन पर्व जानना चाहिये और फिर कैरातपर्व आता है, जिसमें सर्वेश्वर भगवान शिव तथा अर्जुन के युद्ध का वर्णन है। तत्पश्चात इन्द्रलोकाभिगमन पर्व है, फिर धार्मिक तथा करुणोत्पादक नलोपाख्यान पर्व है। तदनन्तर बुद्धिमान कुरुराज का तीर्थयात्रा पर्व, जटासुरवध पर्व और उसके बाद यक्षयु़द्ध पर्व है। इसके पश्चात निवातकवचयुद्ध, आजगर और मार्कण्डेय समास्यापर्व क्रमशः कहे गये हैं। इसके बाद आता है द्रौपदी और सत्यभामा के संवाद का पर्व, इसके अनन्तर घोषयात्रा-पर्व है, उसी में मृगस्वप्नोद्भव और ब्रीहिद्रौणिक उपाख्यान है। तदनन्तर इन्द्रद्युम्न का आख्यान और उसके बाद द्रौपदी हरण-पर्व है। उसी में जयद्रथविमोक्षण पर्व है।

   इसके बाद पतिव्रता सावित्री के पातिव्रत्य का अदभुत माहात्म्य है। फिर इसी स्थान पर रामोपाख्यान पर्व जानना चाहिये। इसके बाद क्रमशः कुण्डलाहरण और आरण्य-पर्व कहे गये हैं। तदनन्तर विराट पर्व का आरम्भ होता है, जिसमें पाण्डवों के नगर प्रवेश और समय पालन सम्बन्धी पर्व हैं। इसके बाद कीचकवध पर्व, गोग्रहण (गोहरण) पर्व तथा अभिमन्यु और उत्तरा के विवाह का पर्व है। इसके पश्चात परमअद्भुत उद्योगपर्व समझना चाहिये। इसी में संजययान पर्व कहा गया है। तदनन्तर चिन्ता के कारण धृतराष्ट्र के रातभर जागने से सम्बन्ध रखने वाला प्रजागर पर्व समझना चाहिये। तत्पश्चात वह प्रसिद्ध सनत्सुजात पर्व है, जिसमें अत्यन्त गोपनीय अध्यात्म दर्शन का समावेश हुआ है। इसके पश्चात यानसन्धि तथा भगवद्यान पर्व है, इसी में मातलि का उपाख्यान, गावल-चरित, सावित्र, वामदेव तथा वैन्य-उपाख्यान, जामदग्न्य और षोडशराजिक उपाख्यान आते हैं।

  फिर श्रीकृष्ण का सभा प्रवेश, विदुला का अपने पुत्र के प्रति उपदेश, युद्ध का उद्योग, सैन्य निर्याण तथा विश्वोपाख्यान- इनका क्रमशः उल्लेख हुआ है। इसी प्रसंग में महात्मा कर्ण का विवाद पर्व है। तदनन्तर कौरव एवं पाण्डव-सेना का निर्याण-पर्व है। तत्पश्चात रथातिरथ संख्या पर्व और उसके बाद क्रोध की आग प्रज्वलित करने वाला उलूकदूतागमन पर्व है। इसके बाद ही अम्बोपाख्यान पर्व है तत्पश्चात अदभुत भीष्माभिषेचन पर्व कहा गया है। इसके आगे जम्बूखण्ड-विनिर्माण-पर्व है। तदनन्तर भूमि पर्व कहा गया है, जिसमें द्वीपों के विस्तार का कीर्तन किया गया है। इसके बाद क्रमशः भगवद्गीता, भीष्म वध, द्रोणाभिषेक तथा संशप्तकवध पर्व हैं। इसके बाद अभिमन्युवध पर्व प्रतिज्ञापर्व जयद्रथवध पर्व और घटोत्कचवध पर्व हैं। फिर रोंगटे खड़े कर देने वाला द्रोणवध पर्व जानना चाहिये। तदनन्तर नारायणास्त्र मोक्षपर्व कहा गया है। फिर कर्ण पर्व और उसके बाद शल्य पर्व है। इसी पर्व में ह्नद-प्रवेश और गदायुद्ध-पर्व भी है। तदनन्तर सारस्वत पर्व है, जिसमे तीर्थों और वंशो का वर्णन किया गया है। इसके बाद है अत्यन्त वीभत्स सौप्तिक पर्व।

(सम्पूर्ण महाभारत (आदि पर्व) द्वितीय अध्याय के श्लोक 73-101 का हिन्दी अनुवाद)

इसके बाद अत्यन्त दारुण ऐषीक पर्व की कथा है। फिर जलप्रदानिक और स्त्रीविलाप-पर्व आते हैं। तत्पश्चात श्राद्ध पर्व है, जिसमें मृत कौरवों की अन्त्येष्टि क्रिया का वर्णन है। उसके बाद ब्राह्मण-वेषधारी राक्षस चार्वाक के निग्रह का पर्व है। तदनन्तर धर्मबुद्धि सम्पन्न धर्मराज युधिष्ठिर के अभिषेक का पर्व है तथा इसके पश्चात गृह प्रविभाग पर्व है। इसके बाद शान्ति पर्व प्रारम्भ होता हैः जिसमें राजधर्मनुशासन, आपद्धर्म और मोक्ष-धर्म पर्व हैं। फिर शुकप्रश्नाभिगमन, ब्राह्मप्रश्नानुशासन, दुर्वासा का प्रादुर्भाव और माया-संवाद पर्व हैं। इसके बाद धर्माधर्म का अनुशासन करने वाला अनुशासनिक पर्व है, तदनन्तर बुद्धिमान, भीष्म जी का स्वर्गारोहण पर्व है। अब आता है आश्वमेधिक पर्व, जो सम्पूर्ण पापों का नाशक है। उसी में अनुगीता पर्व है, जिसमें अध्यात्मज्ञान का सुन्दर निरूपण हुआ है। इसके बाद आश्रमवासिक, पुत्र दर्शन और तदनन्तर नारदागमन पर्व कहे गये हैं।

   इसके बाद है अत्यन्त भयानक एवं दारुण मौसल-पर्व तत्पश्चात महाप्रस्थानपर्व और स्वर्गारोहण पर्व आते हैं। इसके बाद हरिवंश पर्व है, जिसे खिल (परिशिष्ट) पुराण भी कहते हैं, इसमें विष्णु पर्व, श्रीकृष्ण की बाल लीला एवं कंसवध का वर्णन है। इस खिलपर्व मे भविष्य पर्व भी कहा गया है, जो महान अद्भुत है। महात्मा श्रीव्यास जी ने इस प्रकार पूरे सौ पर्वों की रचना की है। सूतवंशशिरोमणि लोमहर्षण के पुत्र उग्रश्रवा जी व्यास जी की रचना पूर्ण हो जाने पर नैमिपारण्य-क्षेत्र में इन्हीं सौ पर्वों को अठारह पर्वों के रूप में सुव्यवस्थित करके ऋषियों के सामने कहा। इस प्रकार यहाँ संक्षेप से महाभारत के पर्वों का संग्रह बताया गया है। पौष्य, पौलोम, आस्तीक, आदि अंशावतरण, सम्भव, लाक्षागृह, हिडिम्ब-वध, बक-वध, चैत्ररथ, देवी द्रौपदी का स्वयंवर, क्षत्रिय धर्म से राजाओं पर विजयप्राप्तिपूर्वक वैवाहिक विधि, विदुरागमन, राजलम्भ, अर्जुन का वनवास, सुभद्रा का हरण, हरणाहरण, खाण्डवदाह तथा मय दानव से मिलने का प्रसंग- यहाँ तक की कथा आदि पर्व में कही गयी है।

   पौष्य-पर्व में उत्तंक के माहात्मय का वर्णन है। पौलोमपर्व में भृगुवंश के विस्तार का वर्णन है। आस्तीकपर्व में सब नागों तथा गरुड़ की उत्पत्ति की कथा है। इसी पर्व में क्षीर सागर के मन्थन और उच्चै:श्रवा घोड़े के जन्म की भी कथा है। परीक्षितनन्दन राजा जनमेजय के सर्प यज्ञ में न भरतवंशी महात्मा राजाओं की कथा कही गयी है। सम्भव पर्व में राजाओं के भिन्न-भिन्न प्रकार के जन्म सम्बन्धी वृत्तान्तों का वर्णन है। इसी में दूसरे शूरवीरों तथा महर्षि द्वैपायन के जन्म की कथा भी है। यहीं देवताओं के अंशावतरण की कथा कही गयी है। इसी पर्व में अत्यन्त प्रभावशाली दैत्य, दानव, यक्ष, नाग, सर्प, गन्धर्व और पक्षियों तथा अन्य विविध प्रकार के प्राणियों की उत्पत्ति का वर्णन है। परमतपस्वी महर्षि कण्व के आश्रम में दुष्यन्त के द्वारा शकुन्तला के गर्भ से भरत के जन्म की कथा भी इसी में है। उन्हीं महात्मा भरत के नाम से यह भरतवंश संसार मे प्रसिद्ध हुआ है।

   इसके बाद महाराज शान्तनु के गृह में भागीरथी गंगा के गर्भ से महात्मा वसुओं की उत्पत्ति एवं फिर से उनके स्वर्ग में जाने का वर्णन किया गया है। इसी पर्व में वसुओं के तेज के अंशभृत भीष्म के जन्म की कथा भी है। उनकी राज्यभोग से निवृत्ति, आजीवन, ब्रह्मचर्यव्रत में स्थित रहने की प्रतिज्ञा, प्रतिज्ञापालन, चित्रांगद की रक्षा और चित्रागंद की मृत्यु हो जाने पर छोटे भाई विचित्रवीर्य की रक्षा, उन्हें राज्य सर्म्पण, अणीमाण्डव्य के शाप से भगवान धर्म की विदुर के रूप में मनुष्यों में उत्पत्ति, श्रीकृष्ण द्वैपायन के वरदान के कारण धृतराष्ट्र एवं पाण्डु का जन्म और इसी प्रसंग में पाण्डवों की उत्पत्ति-कथा भी है।

(सम्पूर्ण महाभारत (आदि पर्व) द्वितीय अध्याय के श्लोक 102-124 का हिन्दी अनुवाद)

   लाक्षागृहदाह पर्व में पाण्डवों की वारणावत-यात्रा के प्रसंग में दुर्योधन के गुप्त षड्यन्त्र का वर्णन है। उसका पाण्डवों के पास कूटनीतिज्ञ पुरोचन को भेजने का भी प्रसंग है। मार्ग में विदुर जी ने बुद्धिमान युधिष्ठिर के हित के लिए म्लेच्छभाषा में जो हितोपदेश किया, उसका भी वर्णन है। फिर विदुर की बात मानकर सुरंग खुदवाने का कार्य आरम्भ किया गया। उसी लाक्षागृह में अपने पाँच पुत्रों के साथ सोती हुई एक भीलनी और पुरोचन भी जल मरे। यह सब कथा कही गयी है। हिडिम्बवध पर्व में घोर वन के मार्ग से यात्रा करते समय पाण्डवों को हिडिम्बा के दर्शन, महाबली भीमसेन के द्वारा हिडिम्बासुर के वध तथा घटोत्कच के जन्म की कथा कही गयी है। अमिततेजस्वी महर्षि व्यास का पाण्डवों से मिलना और उनकी एकचक्रा नगरी में ब्राह्मण के घर पाण्डवों के गुप्त निवास का वर्णन है। वहीं रहते समय उन्होंने बकासुर का वध किया, जिससे नागरिकों को बड़ा भारी आश्रर्य हुआ। इसके अनन्तर कृष्णा द्रौपदी और उसके भाई धृष्टद्युम्न की उत्पत्ति का वर्णन है। जब पाण्डवों को ब्राह्मण के मुख से यह संवाद मिला, तब वे महर्षि व्यास की आज्ञा से द्रौपदी की प्राप्ति के लिये कौतूहलपूर्ण चित्त से स्वयंवर देखने पांचाल देश की ओर चल पड़े।

   चैत्ररथ पर्व में गंगा के तट पर अर्जुन ने अंगारपर्ण गन्धर्व को जीतकर उससे मित्रता कर ली और उसी के मुख से तपती, वसिष्ठ और ओर्व के उत्तम आख्यान सुने। फिर अर्जुन ने वहाँ से अपने सभी भाईयों के साथ पांचाल नगर के बड़े-बड़े राजाओं से भरी सभा में लक्ष्य भेध करके द्रौपदी को प्राप्त किया। यह कथा भी इसी पर्व में है। वहीं भीमसेन और अर्जुन ने रणांगण में युद्ध के लिये संनद्ध क्रोधान्ध राजाओं तथा शल्य और कर्ण को भी अपने पराक्रम से पराजित कर दिया। महापति बलराम एवं भगवान श्रीकृष्ण ने जब भीमसेन एवं अर्जुन के अपरिमित और अतिमानुष बलवीर्य को देखा, तब उन्हे यह शंका हुई कि कहीं ये पाण्डव तो नहीं हैं। फिर वे दोनों उनसे मिलने के लिये कुम्हार के घर आये। इसके पश्चात द्रुपद ने ‘पाँचों पाण्डवों की एक ही पत्नी कैसे हो सकती है’ इस सम्बन्ध में विचार-विमर्श किया। इसी वैवाहिक-पर्व में पाँच इन्द्रों का अदभुत उपाख्यान और द्रौपदी के देव विहित तथा मनुष्य परम्परा के विपरीत विवाह का वर्णन हुआ है।

   इस के बाद धृतराष्ट्र ने पाण्डवों के पास विदुर जी को भेजा है, विदुर जी पाण्डवों से मिले हैं तथा उन्हें श्रीकृष्ण दशर्न हुआ है। इसके पश्चात धृतराष्ट्र का पाण्डवों को आधा राज्य देना, इन्द्रप्रस्थ में पाण्डवों का निवास करना एवं नारद जी की आज्ञा से द्रौपदी के पास आने जाने के सम्बन्ध में समय निर्धारण आदि विषयों का वर्णन है। इसी प्रसंग में सुन्द और उपसुन्द के उपाख्यान का भी वर्णन है। तदनन्तर एक दिन धर्मराज युधिष्ठिर द्रौपदी के साथ बैठे हुए थे। अर्जुन ने ब्राह्मण के लिये नियम तोड़कर वहाँ प्रवेश किया और अपने आयुध लेकर ब्राह्मण की वस्तु उसे प्राप्त कर दी और दृढ़ निश्चय करके वीरता के साथ मर्यादा पालन के लिये वन में चले गये। इसी प्रसंग में यह कथा भी कही गयी है कि वनवास के अवसर पर मार्ग में ही अर्जुन और उलूपी का मेल-मिलाप हो गया। इसके बाद अर्जुन ने पवित्र तीर्थों की यात्रा की है। इसी समय चित्रांगदा के गर्भ से बभ्रुवाहन का जन्म हुआ है और इसी यात्रा में उन्होंने पाँच शुभ अप्सराओं को मुक्तिदान किया, जो एक तपस्वी ब्राह्मण के शाप से ग्राह हो गयी थी। फिर प्रभास तीर्थ में श्रीकृष्ण और अर्जुन के मिलन का वर्णन है।

(सम्पूर्ण महाभारत (आदि पर्व) द्वितीय अध्याय के श्लोक 125-142 का हिन्दी अनुवाद)

   तत्पश्चात यह बताया गया है कि द्वारका में सुभद्रा और अर्जुन परस्पर एक दूसरे पर आसक्त हो गये, उसके बाद श्रीकृष्ण की अनुमति से अर्जुन ने सुभद्रा को हर लिया। तदनन्तर देवकीनन्दन भगवान श्रीकृष्ण के दहेज लेकर पाण्डवों के पास पहुँचने की और सुभद्रा के गर्भ से परमतेजस्वी वीर बालक अभिमन्यु के जन्म की कथा है। इसके पश्चात द्रौपदी के पुत्रों की उत्पत्ति की कथा है। तदनन्तर, जब श्रीकृष्ण और अर्जुन यमुना जी के तट पर विहार करने के लिये गये हुए थे, तब उन्हें जिस प्रकार चक्र और धनुष की प्राप्ति हुई, उसका वर्णन है। साथ ही खाण्डव वन के दाह, मय दानव के छुटकारे और अग्निकाण्ड से सर्प के सर्वथा बच जाने का वर्णन हुआ है। इसके बाद महर्षि मन्दपाल का शांर्गी पक्षी के गर्भ से पुत्र उत्पन्न करने की कथा है।

   इस प्रकार इस अत्यन्त विस्तृत आदिपर्व का सबसे प्रथम निरूपण हुआ है। परमर्षि एवं परमतेजस्वी महर्षि व्यास ने इस पर्व में दो सौ सत्ताईस (227) अध्यायों की रचना की है। महात्मा व्यास मुनि ने इन दो सौ सत्ताईस अध्यायों में आठ हजार आठ सौ चौरासी (8884) श्लोक कहे हैं। दूसरा सभा पर्व है। इसमें बहुत से वृत्तान्तों का वर्णन है। पाण्डवों का सभा निर्माण, किंकर नामक राक्षसों का दिखना, देवर्षि नारद द्वारा लोकपालों की सभा का वर्णन, राजसूय यज्ञ का आरम्भ एवं जरासन्ध वध, गिरिव्रज में बंदी राजाओं का श्रीकृष्ण के द्वारा छुड़ाया जाना और पाण्डवों की दिग्विजय का भी इसी सभापर्व में वर्णन किया गया है। राजसूय महायज्ञ में उपहार ले लेकर राजाओं के आगमन तथा पहले किसकी पूजा हो इस विषय को लेकर छिड़े हुए विवाद में शिशुपाल के वध का प्रसंग भी इसी सभा पर्व में आया है। यज्ञ में पाण्डवों का यह वैभव देखकर दुर्योधन दुःख और ईर्ष्‍या से मन-ही-मन में जलने लगा।

   इसी प्रसंग में सभा भवन के सामने समतल भूमि पर भीमसेन ने उसका उपहास किया। उसी उपहास के कारण दुर्योधन के हृदय में क्रोधग्नि जल उठी। जिसके कारण उसने जूए के खेल का षड्यन्त्र रचा। इसी जूए में कपटी शकुनि ने धर्मपुत्र युधिष्ठिर को जीत लिया। जैसे समुद्र में डूबी हुई नौका को कोई फिर से निकाल ले वैसे ही द्यूत के समुद्र में डूबी हुई परमदुःखिनी पुत्रवधू द्रौपदी को परमबुद्धिमान धृतराष्ट्र ने निकाल लिया। जब राजा दुर्योधन को जूए की विपत्ति से पाण्डवों के बच जाने का समाचार मिला, तब उसने पुनः उन्हें (पिता से आग्रह करके) जूए के लिये बुलवाया। दुर्योधन ने उन्हें जूए में जीतकर वनवास के लिये भेज दिया। महर्षि व्यास ने सभा पर्व से यही सब कथा कही है। श्रेष्ठ ब्राह्मणों! इस पर्व में अध्यायों की संख्या अठहत्तर (78) है और श्लोकों की संख्या दो हजार पाँच सौ ग्यारह (2511) बतायी गयी है। इसके पश्चात महत्त्वपूर्ण वन पर्व का आरम्भ होता है।

(सम्पूर्ण महाभारत (आदि पर्व) द्वितीय अध्याय के श्लोक 143-168 का हिन्दी अनुवाद)

   जिस समय महात्मा पाण्डव वनवास के लिये यात्रा कर रहे थे, उस समय बहुत से पुरवासी लोग बुद्धिमान धर्मराज युधिष्ठिर के पीछे-पीछे चलने लगे। महर्षि धौम्य के उपदेश से उन्हें सूर्य भगवान की कृपा प्राप्त हुई और अक्षय अन्न का पात्र मिला। उधर विदुर जी धृतराष्ट्र को हितकारी उपदेश कर रहे थे, परंतु धृतराष्ट्र ने उनका परित्याग कर दिया। धृतराष्ट्र के परित्याग पर विदुर जी पाण्डवों के पास चले गये और फिर धृतराष्ट्र का आदेश प्राप्त होने पर उनके पास लौट आये। धृतराष्ट्रनन्दन दुर्मति दुर्योधन ने कर्ण के प्रोत्साहन से वनवासी पाण्डवों को मार डालने का विचार किया। दुर्योधन के इस दूषित भाव को जानकर महर्षि व्यास झटपट यहाँ आ पहुँचे और उन्होंने दुर्योधन की यात्रा का निषेध कर दिया। इसी प्रसंग में सुरभि का आख्यान भी है। मैत्रेय ऋषि ने आकर राजा धृतराष्ट्र को उपदेश किया और उन्होंने ही राजा दुर्योधन को शाप दे दिया। इसी पर्व में यह कथा है कि युद्ध में भीमसेन ने किर्मीर को मार डाला। पाण्डवों के पास वृष्णिवंशी और पांचाल आये। पाण्डवों ने उन सबके साथ वार्तालाप किया।

   जब श्रीकृष्ण ने दुःखार्त द्रौपदी को आश्वासन दिया। यह सब कथा वनपर्व में है। इसी पर्व में महर्षि व्यास ने सौभवध की कथा कही है। श्रीकृष्ण सुभद्रा को पुत्र सहित द्वारका में ले गये। धृष्टद्युम्न द्रौपदी के पुत्रों को अपने साथ लिवा ले गये। तदनन्तर पाण्डवों ने परमरमणीय द्वैतवन में प्रवेश किया। इसी पर्व में युधिष्ठिर एवं द्रौपदी का संवाद तथा युधिष्ठिर और भीमसेन के संवाद का भली-भाँति वर्णन किया गया है। महर्षि व्यास पाण्डवों के पास आये और उन्होंने राजा युधिष्ठिर को प्रतिस्मृति नामक मन्त्र विद्या का उपदेश दिया। व्यास जी के चले जाने पर पाण्डवों ने काम्यकवन की यात्रा की। इसके बाद अमिततेजस्वी अर्जुन अस्त्र प्राप्त करने के लिये अपने भाईयों से अलग चले गये। वहीं किरात-वेशधारी महादेव जी के साथ अर्जुन का युद्ध हुआ, लोकपालों के दर्शन हुए और अस्त्र की प्राप्ति हुई। इसके बाद अर्जुन अस्त्र के लिये इन्द्रलोक में गये यह सुनकर धृतराष्ट्र को बड़ी चिन्ता हुई।

  इसके बाद धर्मराज युधिष्ठिर को शुद्ध हृदय महर्षि बृहदश्व का दर्शन हुआ। युधिष्ठिर ने आर्त होकर उन्हें अपनी दुःखगाथा सुनायी और विलाप किया। इसी प्रसंग में नलोपाख्यान आता है, जिसमें धर्मानिष्ठा का अनुपम आदर्श है और जिसे पढ़-सुनकर हृदय में करुणा की धारा बहने लगती है। दमयन्ती का दृढ़ धैर्य और नल का चरित्र यहीं पढ़ने को मिलते हैं। उन्हीं महर्षि से पाण्डवों को अक्ष-हृदय (जूए के रहस्य) की प्राप्ति हुई। यहीं स्वर्ग से महर्षि लोमश पाण्डवों के पास पधारे। लोमश ने ही वनवासी महात्मा पाण्डवों को यह बात बतलायी कि अर्जुन स्वर्ग में किस प्रकार अस्त्र विद्या सीख रहे हैं। इसी पर्व में अर्जुन का संदेश पाकर पाण्डवों ने तीर्थ यात्रा की। उन्हें तीर्थयात्रा का फल प्राप्त हुआ और कौन से तीर्थ कितने पुण्यप्रद होते हैं- इस बात का वर्णन हुआ है। इसके बाद महर्षि नारद ने पुलस्त्य तीर्थ की यात्रा करने की प्रेरणा दी और महात्मा पाण्डवों ने यहाँ की यात्रा की। यहीं इन्द्र के द्वारा कर्ण को कुण्डलों से वंचित करने का तथा राजा गय के यज्ञवैभव का वर्णन किया गया हैं। इसके बाद अगस्त्य-चरित्र है, जिसमें उनके बातापिभक्षण तथा संतान के लिये लोपामुद्रा के साथ समागम का वर्णन है। इसके पश्चात कौमार ब्रह्मचारी ऋष्यश्रृंग का चरित्र है। फिर परमतेजस्वी जमदग्निनन्दन परशुराम का चरित्र है।

(सम्पूर्ण महाभारत (आदि पर्व) द्वितीय अध्याय के श्लोक 169-192 का हिन्दी अनुवाद)

    इसी चरित्र में कार्तवीर्य अर्जुन तथा हैहयवंशी राजाओं के वध का वर्णन किया गया है। प्रभास तीर्थ में पाण्डवों एवं यादवों के मिलने की कथा भी इसी में है। इसके बाद सुकन्या का उपाख्यान है। इसी में यह कथा है कि भृगुनन्दन च्यवन ने शर्याति के यज्ञ में अश्विनीकुमारों को सोमपान का अधिकारी बना दिया। उन्हीं दोनों ने च्यवन मुनि को बूढ़े से जवान बना दिया। राजा मान्धाता की कथा भी इसी पर्व में कही गयी है। यहीं जन्तूपाख्यान है। इसमें राजा सोमक ने बहुत से पुत्र प्राप्त करने के लिये एक पुत्र से यजन किया और उसके फलस्वरूप सौ पुत्र प्राप्त किये। इसके बाद श्येन (बाज) और कपोत (कबूतर) का सर्वोत्तम उपाख्यान है। इसमें इन्द्र और अग्नि राजा शिबि के धर्म की परीक्षा लेने के लिये आये हैं।

  इसी पर्व में अष्टावक्र का चरित्र भी है। जिसमें बन्दी के साथ जनक के यज्ञ में ब्रह्मार्षि अष्टावक्र ने शास्त्रार्थ का वर्णन है। वह बन्दी वरुण का पुत्र था और नैयायिकों में प्रधान था। उसे महात्मा अष्टावक्र ने बन्दी को हराकर समुद्र में डाले हुए अपने पिता को प्राप्त कर लिया। इसके बाद यवक्रीत और महात्मा रैभ्य का उपाख्यान है। तदनन्तर पाण्डवों की गन्धमादन यात्रा और नारायण श्रम में निवास का वर्णन है। द्रौपदी ने सौगन्धिक कमल लाने के लिये भीमसेन को गन्धमादन पर्वत पर भेजा। यात्रा करते समय महाबाहु भीमसेन ने मार्ग में कदली-वन में महाबली पवननन्दन श्रीहनुमान जी का दर्शन किया। यहीं सौगन्धिक कमल के लिये भीमसेन ने सरोवर में घुसकर उसे मथ डाला। वहीं भीमसेन का राक्षसों एवं महाशक्तिशाली मणिमान आदि यक्षों के साथ घमासान युद्ध हुआ।

   तत्पश्चात भीमसेन के द्वारा जटासुर राक्षस का वध हुआ। फिर पाण्डव क्रमशः राजर्षि वृषपर्वा और आष्टिपेण के आश्रम पर गये और वहीं रहने लगे। यहीं द्रौपदी महात्मा भीमसेन को प्रोत्साहित करती रही। भीमसेन कैलास पर्वत पर चढ़ गये। यहीं अपनी शक्ति के नशे में चूर मणिमान आदि यक्षों के साथ उनका अत्यन्त घोर युद्ध हुआ। यहीं पाण्डवों का कुबेर के साथ समागम हुआ। इसी स्थान पर अर्जुन आकर अपने भाईयों से मिले। इधर सव्यसाची अर्जुन ने अपने बड़े भाई के लिये दिव्य अस्त्र प्राप्त कर लिये और हिरण्यपुरवासी निवातकवच दानवों के साथ उनका घोर युद्ध हुआ। वहाँ देवताओं के शत्रु भयंकर दानव निवातकवच, पौलोम और कालकेयों के साथ अर्जुन ने जैसा युद्ध किया और जिस प्रकार उन सबका वध हुआ था, वह सब बुद्धिमान अर्जुन ने धर्मराज युधिष्ठिर के पास अपने अस्त्र शस्त्रों का प्रदर्शन करना चाहा। इसी समय देवर्षि नारद ने आकर अर्जुन को अस्त्र प्रदर्शन से रोक दिया।

    अब पाण्डव गन्धमादन पर्वत से नीचे उतरने लगे। फिर एक बीहड़ वन में पर्वत के समान विशाल शरीरधारी बलवान अजगर ने भीमसेन को पकड़ लिया। धर्मराज युधिष्ठिर ने अजगर-वेशधारी नहुष के प्रश्नों का उत्तर देकर भीमसेन को छुड़ा लिय। इसके बाद महानुभाव पाण्डव पुनः काम्यकवन में आये। जब नरपुगंव पाण्डव काम्यक वन में निवास करने लगे, तब उनसे मिलने के लिये वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण उनके पास आये। यह कथा इसी प्रसंग में कही गयी है। पाण्डवों का महामुनि मार्कण्डेय के साथ समागम हुआ। वहाँ महर्षि ने बहुत से उपाख्यान सुनाये। उनमें वेनपुत्र पृथु का भी उपाख्यान है। इसी प्रसंग में प्रसिद्ध महात्मा महर्षि तार्क्ष्य और सरस्वती का संवाद है। तदनन्तर मत्स्योपाख्यान भी कहा गया है।

(सम्पूर्ण महाभारत (आदि पर्व) द्वितीय अध्याय के श्लोक 193-214 का हिन्दी अनुवाद)

   इसी मार्कण्डेय समागम में पुराणों की अनेक कथाएँ, राजा इन्द्रद्युम्न का उपाख्यान तथा धुन्धुमार की कथा भी है। पतिव्रता का और आंगिरस का उपाख्यान भी इसी प्रसंग में है। द्रौपदी का सत्यभामा के साथ संवाद भी इसी में हैं। तदनन्तर धर्मात्मा पाण्डव पुनः द्वैत-वन में आये। कौरवों ने घोषयात्रा की और गन्धर्वों ने दुर्योधन को बंदी बना लिया। वे मन्दमति दुर्योधन को कैद करके लिये जा रहे थे कि अर्जुन ने युद्ध करके उसे छुड़ा लिया। इसके बाद धर्मराज युधिष्ठिर को स्वप्न में हरिण के दर्शन हुए। इसके पश्चात पाण्डवगण काम्यक नामक श्रेष्ठ वन में फिर से गये। इसी प्रसंग में अत्यन्त विस्तार के साथ व्रीहिद्रौणिक उपाख्यान भी कहा गया है।

   इसी में दुर्वासा जी का उपाख्यान और जयद्रथ के द्वारा आश्रम से द्रौपदी के हरण की कथा भी कही गयी है। उस समय महाबली भयंकर भीमसेन ने वायुवेग से दौड़कर उसका पीछा किया था तथा जयद्रथ के सिर के सारे बाल मूँड़कर उसमें पाँच चोटियाँ रख दी थीं। वन पर्व में बड़े ही विस्तार के साथ रामायण का उपाख्यान है, जिसमें भगवान श्री रामचन्द्र जी ने युद्ध भूमि में अपने पराक्रम से रावण का वध किया है। इसके बाद ही सावित्री का उपाख्यान और इन्द्र के द्वारा कर्ण को कुण्डलों से वंचित कर देने की कथा है। इसी प्रसंग में इन्द्र ने प्रसन्न होकर कर्ण को एक शक्ति दी थी, जिससे कोई भी एक वीर मारा जा सकता था। इसके बाद है आरणेय उपाख्यान, जिसमें धर्मराज ने अपने पुत्र युधिष्ठिर को शिक्षा दी थी। और उनसे वरदान प्राप्त कर पाण्डवों ने पश्चिम दिशा की यात्रा की।

   यह तीसरे वनपर्व की सूची कही गयी। इस पर्व में गिनकर दो सौ उनहत्तर (269) अध्याय कहे गये हैं। ग्यारह हजार छः सौ चौंसठ (11664) श्लोक इस पर्व में हैं। इसके बाद विराट पर्व की विस्तृत सूची सुनो। पाण्डवों ने विराट नगर में जाकर श्मशान के पास एक विशाल शमी का वृक्ष देखा। उसी पर उन्होंने अपने सारे अस्त्र-शस्त्र रख दिये। तदनन्तर उन्होंने नगर में प्रवेश किया और छद्मवेश में वहाँ निवास करने लगे। कीचक स्वभाव से ही दुष्ट था। द्रौपदी को देखते ही उसका मन काम-बाण से घायल हो गया। वह द्रौपदी के पीछे पड़ गया। इसी अपराध में भीमसेन ने उसे मार डाला। यह कथा इसी पर्व में है। राजा दुर्योधन ने पाण्डवों का पता चलाने के लिये बहुत से निपुण गुप्तचर सब ओर भेजे। परंतु उन्हें महात्मा पाण्डवों की गतिविधि का कोई हाल-चाल न मिला।

   इन्हीं दिनों त्रिगर्तों ने राजा विराट की गौओं का प्रथम बार अपहरण कर लिया। राजा विराट ने त्रिगर्तों के साथ रोंगटे खड़े कर देने वाला घमासान युद्ध किया। त्रिगर्त विराट को पकड़कर लिये जा रहे थे, किंतु भीमसेन ने उन्हें छुड़ा लिया। साथ ही पाण्डवों ने उनके गोधन को भी त्रिगर्तों से छुड़ा लिया। इसके बाद ही कौरवों ने विराट नगर पर चढ़ाई करके उनकी उत्तर दिशा की गायों को लूटना प्रारम्भ कर दिया। इसी अवसर पर किरीटधारी अर्जुन ने अपना पराक्रम प्रकट करके संग्राम भूमि में सम्पूर्ण कौरवों को पराजित कर दिया और विराट के गोधन को लौटा लिया। (पाण्डवों के पहचाने जाने पर) राजा विराट ने अपनी पुत्री उत्तरा शत्रुघाती सुभद्रानन्दन अभिमन्यु से विवाह करने के लिये पुत्रवधू के रूप में अर्जुन को दे दी।

(सम्पूर्ण महाभारत (आदि पर्व) द्वितीय अध्याय के श्लोक 215-236 का हिन्दी अनुवाद)

   इस प्रकार इस चौथे विराट पर्व की सूची का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया। परमर्षि व्यास जी महाराज ने इस पर्व में गिनकर सड़सठ (67) अध्याय रखे हैं। अब तुम मुझसे श्लोकों की संख्या सुनो। इस पर्व में दो हजार पचास (2050) श्लोक वेदवेत्ता महर्षि वेदव्यास ने कहे हैं। इसके बाद पाँचवाँ उद्योगपर्व समझना चाहिये। अब तुम उसकी विषय-सूची सुनो। जब पाण्डव उपप्लव्य नगर में रहने लगे, तब दुर्योधन और अर्जुन विजय की आकांक्षा से भगवान श्रीकृष्ण के पास उपस्थित हुए। दोनों ने ही भगवान श्रीकृष्ण से प्रार्थना की, कि ‘आप इस युद्ध में हमारी सहायता कीजिये।’ इस पर महामना श्रीकृष्ण ने कहा। ‘दुर्योधन और अर्जुन! तुम दोनों ही श्रेष्ठ पुरुष हो। मैं स्वयं युद्ध न करके एक का मन्त्री बन जाऊँगा और दूसरे को एक अक्षौहिणी सेना दे दूँगा। अब तुम्हीं दोनों निश्चय करो कि किसे क्या दूँ।' अपने स्वार्थ के सम्बन्ध में अनजान एवं खोटी बुद्धि वाले दुर्योधन ने एक अक्षौहिणी सेना माँग ली और अर्जुन ने यह माँग की कि ‘श्रीकृष्ण युद्ध भले ही न करें, परंतु मेरे मन्त्री बन जायें’।

   मद्रदेश के अधिपति राजा शल्य पाण्डवों की ओर से युद्ध करने आ रहे थे, परन्तु दुर्योधन ने मार्ग में ही उपहारों से धोखे में डालकर उन्हें प्रसन्न कर लिया और उन वरदायक नरेश से यह वर माँगा कि ‘मेरी सहायता कीजिये।’ शल्य ने दुर्योधन से सहायता की प्रतिज्ञा कर ली। इसके बाद वे पाण्डवों के पास गये और बड़ी शान्ति के साथ सब कुछ समझा बुझाकर सब बात कह दी। राजा ने इसी प्रसंग में इन्द्र की विजय की कथा भी सुनायी। पाण्डवों ने अपने पुरोहित को कौरवों के पास भेजा। धृतराष्ट्र पाण्डवों के पुरोहित के इन्द्र-विजयविषयक वचन को सादर श्रवण करते हुए उनके आगमन के औचित्य को स्वीकार किया। तत्पश्चात परमप्रतापी महाराज धृतराष्ट्र ने भी शान्ति की इच्छा से दूत के रूप में संजय को पाण्डवों के पास भेजा। जब धृतराष्ट्र ने सुना कि पाण्डवों ने श्रीकृष्ण को अपना नेता चुन लिया है और वे उन्हें आगे करके युद्ध के लिये प्रस्थान कर रहे हैं, तब चिन्ता के कारण उनकी नींद भाग गयी। वे रात भर जागते रह गये। उस समय महात्मा विदुर ने मनीषी राजा धृतराष्ट्र को विविध प्रकार से अत्यन्त आश्चर्यजनक नीति का उपदेश किया है (वही विदुर नीति के नाम से प्रसिद्ध है)।

    उसी समय महर्षि सनत्सुजात ने खिन्नचित्त एवं शोक विहृल राजा धृतराष्ट्र सर्वोत्तम अध्यात्मशास्त्र का श्रवण कराया। प्रातःकाल राज सभा में संजय ने राजा धृतराष्ट्र से श्रीकृष्ण और अर्जुन के ऐकात्म्य अथवा मित्रता का भली-भाँति वर्णन किया। इसी प्रसंग में यह कथा भी है कि परमदयालु सर्वज्ञ भगवान श्रीकृष्ण दया-भाव से युक्त हो शान्ति-स्थापन के लिये सन्धि कराने के उद्देश्य से स्वयं हस्तिनापुर नामक नगर में पधारे। यद्यपि भगवान श्रीकृष्ण दोनों ही पक्षों का हित चाहते थे और शान्ति के लिये प्रार्थना कर रहे थे, परन्तु राजा दुर्योधन ने उनका विरोध कर दिया। इसी पर्व में दम्भोद्भव की कथा कही गयी है और साथ ही महात्मा मातलि का अपनी कन्या के लिये वर ढूँढ़ने का प्रसंग भी है। इसके बाद महर्षि गालव के चरित्र का वर्णन है। साथ ही विदुला ने अपने पुत्र को जो शिक्षा दी है, वह भी कही गयी है। भगवान श्रीकृष्ण ने कर्ण और दुर्योधन आदि की दूषित मन्त्रणा को जानकर राजाओं की भरी सभा में अपने योगैश्वर्य का प्रदर्शन किया। भगवान श्रीकृष्ण ने कर्ण को अपने रथ पर बैठाकर उसे (पाण्डवों के पक्ष में आने के लिये) अनेक युक्तियों से बहुत समझाया-बुझाया, परन्तु कर्ण ने अहंकारवश उनकी बात अस्वीकार कर दी।

(सम्पूर्ण महाभारत (आदि पर्व) द्वितीय अध्याय के श्लोक 237-260 का हिन्दी अनुवाद)

   शत्रुसूदन श्रीकृष्ण ने हस्तिनापुर से उपप्लव्य नगर आकर जैसा कुछ वहाँ हुआ था, सब पाण्डवों को कह सुनाया। शत्रुघाती पाण्डव उनके वचन सुनकर और क्या करने में हमारा हित है- यह परामर्श करके युद्ध सम्बन्धी सब सामग्री जुटाने में लग गये। इसके पश्चात हस्तिनापुर नामक नगर में युद्ध के लिये मनुष्य, घोड़े, रथ और हाथियों की चतुरंगिणी सेना ने कूच किया। इसी प्रसंग में सेना की गिनती की गयी। फिर यह कहा गया है कि शाक्तिशाली राजा दुर्योधन ने दूसरे दिन प्रातःकाल से होने वाले महायुद्ध के सम्बन्ध में उलूक को दूत बनाकर पाण्डवों के पास भेजा। इसके अनन्तर इस पर्व में रथी, अतिरथी आदि के स्वरूप का वर्णन तथा अम्बा का उपाख्यान आता है। इस प्रकार महाभारत में उद्योग पर्व पाँचवा पर्व है और इसमें बहुत से सुन्दर-सुन्दर वृत्तान्त हैं। इस उद्योग पर्व में श्रीकृष्ण के द्वारा सन्धि संदेश और उलूक के विग्रह संदेश का महत्त्वपूर्ण वर्णन हुआ है। तपोधन महर्षियों! विशाल बुद्धि महर्षि व्यास ने इस पर्व में एक सौ छियासी अध्याय रखे हैं और श्लोकों की संख्या छः हजार छः सौ अट्ठानवे (6698) बतायी है।

   इसके बाद विचित्र अर्थों से भरे भीष्म पर्व की विषय-सूची कही जाती है, जिसमें संजय ने जम्बूद्वीप की रचनासम्बंधी कथा कही है। इस पर्व में दस दिनों तक अत्यंत भयंकर घोर युद्ध होने का वर्णन आता है, जिसमें धर्मराज युधिष्ठिर की सेना के अत्यंत दु:खी होने की कथा है। इसी युद्ध के प्रारम्भ में महातेजस्वी भगवान वासुदेव ने मोक्षतत्त्व का ज्ञान कराने वाली युक्तियों द्वारा अर्जुन के मोहजनित शोक-संताप का नाश किया था (जो कि भगवद्गीता के नाम से प्रसिद्ध है)। इसी पर्व में यह कथा भी है कि युधिष्ठिर के हित में संलग्न रहने वाले निर्भय, उदार बुद्धि, अधोक्षज, भक्तवत्सल भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन की शिथिलता देख शीघ्र ही हाथ में चाबुक लेकर भीष्म को मारने के लिये स्वयं रथ से कूद पड़े और बड़े वेग से दौड़े। साथ ही सब शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ गाण्डीवधन्वा अर्जुन को युद्ध भूमि में भगवान श्रीकृष्ण ने व्यगंय वाक्य के चाबुक से मार्मिक चोट पहँचायी। तब महाधर्नुधर अर्जुन ने शिखण्डी को सामने करके तीखे बाणों से घायल करते हुए भीष्म पितामह को रथ से गिरा दिया। जब कि भीष्म पितामह शरशय्या पर शयन करने लगे। महाभारत में यह छठा पर्व विस्तारपूर्वक कहा गया है। वेद के मर्मज्ञ विद्वान श्रीकृष्ण द्वैपायन व्यास ने इस भीष्म पर्व में एक सौ सत्रह अध्याय रखे है। श्लोकों की संख्या पाँच हजार आठ सौ चौरासी (5884) कही गयी है।

   तदनन्तर अनेक वृत्तान्तों से पूर्ण अदभुत द्रोणपर्व की कथा आरम्भ होती है, जिसमें परमप्रतापी आचार्य द्रोण के सेनापति पद पर अभिषिक्त होने का वर्णन है। वहीं यह भी कहा गया है कि अस़्त्र-विद्या के परमाचार्य द्रोण ने दुर्योधन को प्रसन्न करने के लिये बुद्धिमान धर्मराज युधिष्ठिर को पकड़ने की प्रतिज्ञा कर ली। इसी पर्व में यह बताया गया है कि संशप्तक योद्धा अर्जुन को रणांगण से दूर हटा ले गये। वहीं यह कथा भी आयी है कि ऐरावतवंशीय सुप्रतीक नामक हाथी के साथ महाराज भगदत्त भी, जो युद्ध में इन्द्र के समान थे, किरीटधारी अर्जुन के द्वारा मौत के घाट उतार दिये गये। इसी पर्व में यह भी कहा गया है कि शूरवीर बालक अभिमन्यु को, जो कभी जवान भी नहीं हुआ था और अकेला था, जयद्रथ आदि बहुत से विख्यात महारथियों ने मार डाला। अभिमन्यु के वध से कुपित होकर अर्जुन ने रणभूमि में सात अक्षौहिणी सेनाओं का संहार करके राजा जयद्रथ को भी मार डाला। उसी अवसर पर महाबाहु भीमसेन और महारथी सात्यकि धर्मराज युधिष्ठिर की आज्ञा से अर्जुन को ढूँढ़ने के लिये कौरवों की उस सेना में घुस गये, जिसकी मोर्चेबन्दी बड़े-बड़े देवता भी नहीं तोड़ सकते थे।

(सम्पूर्ण महाभारत (आदि पर्व) द्वितीय अध्याय के श्लोक 261-282 का हिन्दी अनुवाद)

  अर्जुन ने, संशप्तकों में से जो बच रहे थे, उन्हें भी यु़द्ध भूमि में निःशेष कर दिया। महामना संशप्तक वीरों की संख्या नौ करोड़ थी, परन्तु किरीटधारी अर्जुन ने आक्रमण करके अकेले ही उन सबको यमलोक भेज दिया। धृतराष्ट्रपुत्र, बड़े-बड़े पाषाण खण्ड लेकर युद्ध करने वाले म्लेच्छ-सैनिक, समरांगण में युद्ध के विचित्र कला कौशल का परिचय देने वाले नारायण नामक गोप, अलम्बुप, श्रुतायु, पराक्रमी जलासन्ध, भूरिश्रवा, विराट, महारथी द्रुपद तथा घटोत्कच आदि जो बड़े-बड़े वीर मारे गये हैं, वह प्रसंग भी इसी पर्व में है। इसी पर्व में यह बात भी आयी है कि युद्ध में जब पिता द्रोणाचार्य मार गिराये गये, तब अश्वत्थामा ने भी शत्रुओं के प्रति अमर्ष में भरकर ‘नारायण’ नामक भयानक अस्त्र को प्रकट किया था। इसी में आग्नेयास्त्र तथा भगवान रुद्र के उत्तम माहात्म्य का वर्णन किया गया है।

   व्यास जी के आगमन तथा श्रीकृष्ण और अर्जुन के माहात्म्य की कथा भी इसी में है। महाभारत में यह सातवाँ महान पर्व बताया गया है। कौरव-पाण्डव युद्ध में जो नरश्रेष्ठ नरेश शूरवीर बताये गये हैं, उनमें से अधिकांश में मारे जाने का प्रसंग इस द्रोण पर्व में ही आया है। तत्त्वदर्शी पराशरनन्दन मुनिवर व्यास ने भली-भाँति सोच विचारकर द्रोण पर्व में एक सौ सत्तर अध्यायों और आठ हजार नौ सौ नौ (8909) श्लोकों की रचना एवं गणना की है। इसके बाद अत्यन्त अद्भुत कर्ण पर्व का परिचय दिया गया है। इसी में परम बुद्धिमान मद्रराज शल्य को कर्ण के सारथि बनाने का प्रसंग है, फिर त्रिपुर के संहार की पुराण प्रसिद्ध कथा आयी है। युद्ध के लिये जाते समय कर्ण और शल्य में जो कठोर संवाद हुआ है, उसका वर्णन भी इसी पर्व में है। तदनन्तर हंस और कौए का आक्षेपपूर्ण उपाख्यान है। उसके बाद महात्मा अश्वत्थामा के द्वारा राजा पाण्ड्य के वध की कथा है। फिर दण्डसेन और दण्ड के वध का प्रसंग है।

   इसी पर्व में कर्ण के साथ युधिष्ठिर द्वैरथ (द्वन्द्व) युद्ध का वर्णन है, जिसमें कर्ण ने सब धर्नुधर वीरों के देखते-देखते धर्मराज युधिष्ठिर के प्राणों को संकट में डाल दिया था। तत्पश्चात युधिष्ठिर और अर्जुन के एक दूसरे के प्रति क्रोधयुक्त उद्गार हैं, जहाँ भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझा-बुझाकर शान्त किया है। इसी पर्व में यह बात भी आयी है कि भीमसेन ने पहले की हुई प्रतिज्ञा के अनुसार दु:शासन का वक्षस्थल विदीर्ण करके रक्त पीया था। तदनन्तर द्वन्द्व युद्ध में अर्जुन ने महारथी कर्ण को जो मार गिराया, वह प्रसंग भी कर्णपर्व में ही है। महाभारत का विचार करने वाले विद्वानों ने इस कर्ण पर्व को आठवाँ पर्व कहा है। कर्ण पर्व में उनहत्तर अध्याय कहे गये हैं और चार हजार नौ सौ चौसठ (4964) श्लोकों का पाठ इस पर्व में किया गया है। तत्पश्चात विचित्र अर्थयुक्त विषयों से भरा हुआ शल्य पर्व कहा गया है। इसी में यह कथा आयी है कि जब कौरव सेना के सभी प्रमुख वीर मार दिये गये, तब मद्रराज शल्य सेनापति हुए। वहीं कुमार कार्तिकेय का उपाख्यान और अभिषेक-कर्म कहा गया है। साथ ही वहाँ रथियों के युद्ध का भी विभागपूर्वक वर्णन किया गया है। शल्यपर्व में ही कुरुकुल के प्रमुख वीरों के विनाश का तथा महात्मा धर्मराज द्वारा शल्य के वध का वर्णन किया गया है। इसी में सहदेव के द्वारा युद्ध में शकुनि के मारे जाने का प्रसंग है।

(सम्पूर्ण महाभारत (आदि पर्व) द्वितीय अध्याय के श्लोक 283-303 का हिन्दी अनुवाद)

    जब अधिक-से-अधिक कौरव सेना नष्ट हो गयी और थोड़ी-सी बच गयी, तब दुर्योधन सरोवर में प्रवेश करके पानी को स्तम्भित कर वहीं विश्राम के लिये बैठ गया। किन्तु व्याधों ने भीमसेन से दुर्योधन की यह चेष्टा बतला दी। तब बुद्धिमान धर्मराज के आक्षेपयुक्त वचनों से अत्यन्त अमर्ष में भरकर धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन सरोवर से बाहर निकला और उसने भीमसेन के साथ गदायुद्ध किया। ये सब प्रसंग शल्य पर्व में ही हैं। उसी में युद्ध के समय बलराम जी के आगमन की बात कही गयी है। इसी प्रसंग में सरस्वती के तटवर्ती तीर्थों के पावन माहात्म्य का परिचय दिया गया है। शल्य पर्व में ही भयंकर गदा युद्ध का वर्णन किया गया है। जिसमें युद्ध करते समय भीमसेन ने हठपूर्वक (युद्ध के नियम को भंग करके) अपनी भयानक वेगशालिनी गदा से राजा दुर्योधन की दोनों जाँघे तोड़ डालीं, अद्भुत अर्थ से युक्त नवम पर्व बताया गया है। इस पर्व में उनसठ (59) अध्याय कहे गये हैं, जिसमें बहुत से वृत्तान्तों का वर्णन आया है। अब इसकी श्लोक संख्या कही जाती है। कौरव-पाण्डवों के यश का पोषण करने वाले मुनिवर व्यास ने इस पर्व में तीन हजार दो सौ बीस (3220) श्लोकों की रचना की है। इसके पश्चात मैं अत्यन्त दारुण सौप्तिक पर्व की सूची बता रहा हूँ, जिसमें पाण्डवों के चले जाने पर अत्यन्त अमर्ष में भरे हुए टूटी जाँघ वाले राजा दुर्योधन के पास जो खून से लथपथ हुआ पड़ा था, सायंकाल के समय कृतवर्मा, कृपाचार्य और अश्वत्थामा- ये तीन महारथी आये। निकट आकर उन्होंने देखा, राजा दुर्योधन युद्ध के मुहाने पर इस दुर्दशा में पड़ा था। यह देखकर महारथी अश्वत्थामा को बड़ा क्रोध आया और उसने प्रतिज्ञा की कि ‘मैं धृष्टद्युम्न आदि सम्पूर्ण पांचालों और मन्त्रियों सहित समस्त पाण्डवों का वध किये बिना अपना कवच नहीं उतारूँगा’।

   सौप्तिक पर्व में राजा दुर्योधन से ऐसी बात कहकर वे तीनों महारथी वहाँ से चले गये और सूर्यास्त होते होते एक बहुत बड़े वन में जा पहुँचे। वहाँ तीनों एक बहुत बड़े बरगद के नीचे विश्राम के लिये बैठे। तदनन्तर वहाँ एक उल्लू ने आकर रात में बहुत से कौओं को मार डाला। यह देखकर क्रोध में भरे अश्वत्थामा ने अपने पिता के अन्यायपूर्वक मारे जाने की घटना को स्मरण करके सोते समय ही पांचालों के वध का निश्चय कर लिया। तत्पश्चात पाण्डवों के शिविर के द्वार पर पहुँचकर उसने देखा, एक बड़ा भयंकर राक्षस, जिसकी ओर देखना अत्यन्त कठिन है, वहाँ खड़ा है। उसने पृथ्वी से लेकर आकाश तक के प्रदेश को घेर रखा था। अश्वत्थामा जितने भी अस्त्र चलाता, उन सबको वह राक्षस नष्ट कर देता था। यह देखकर द्रोणकुमार ने तुरन्त ही भयंकर नेत्रों वाले भगवान रुद्र की आराधना करके उन्हें प्रसन्न किया। तत्पश्चात अश्वत्थामा ने रात में निःशंक सोये हुए धृष्टद्युम्न आदि पांचालों तथा द्रौपदीपुत्रों को कृतवर्मा और कृपाचार्य की सहायता से परिजनों सहित मार डाला। भगवान श्रीकृष्ण की शक्ति का आश्रय लेने से केवल पाँच पाण्डव और महान धनुर्धर सात्यकि बच गये, शेष सभी वीर मारे गये। यह सब प्रसंग सौप्तिकपर्व में वर्णित है। वहीं यह भी कहा गया है कि धृष्टद्युम्न के सारथि ने जब पाण्डवों को यह सूचित किया कि द्रोणपुत्र ने सोये हुए पांचालों का वध कर डाला है, तब द्रौपदी पुत्रशोक से पीड़ित तथा पिता और भाई की हत्या से व्यथित हो उठी।

(सम्पूर्ण महाभारत (आदि पर्व) द्वितीय अध्याय के श्लोक 304-324 का हिन्दी अनुवाद)

   वह पतियों को अश्वत्थामा से इसका बदला लेने के लिये उत्तेजित करती हुई आमरण अनशन का संकल्प लेकर अन्न-जल छोड़कर बैठ गयी। द्रौपदी के कहने से भयंकर पराक्रमी महाबली भीमसेन उसका अप्रिय करने की इच्छा से हाथ में गदा ले अत्यन्त क्रोध में भयंकर गुरुपुत्र अश्वत्थामा के पीछे दौड़े। तब भीमसेन के भय से घबराकर दैव की प्रेरणा से पाण्डवों के विनाश के लिये अश्वत्थामा ने रोषपूर्वक दिव्यास्त्र का प्रयोग किया। किन्तु भगवान श्रीकृष्ण ने अश्वत्थामा के रोषपूर्ण वचन को शान्त करते हुए कहा- ‘मैवम्’-‘पाण्डवों का विनाश न हो।’ साथ ही अर्जुन ने अपने दिव्यास्त्र द्वारा उसके अस्त्र को शान्त कर दिया। उस समय पापात्मा द्रोणपुत्र के द्रोहपूर्ण विचार को देखकर द्वैपायन व्यास एवं श्रीकृष्ण ने अश्वत्थामा को और अश्वत्थामा ने उन्हें शाप दिया। इस प्रकार दोनों ओर से एक दूसरे को शाप प्रदान किया गया। महारथी अश्वत्थामा से मणि छीन कर विजय से सुशोभित होने वाले पाण्डवों ने प्रसन्नतापूर्वक द्रौपदी को दे दी।

     इन सब वृत्तान्तों से युक्त सौप्तिक पर्व दसवाँ कहा गया है। महात्मा व्यास ने इसमें अठारह अध्याय कहे हैं। इसी प्रकार उन ब्रह्मवादी मुनि ने इस पर्व में श्लोकों की संख्या आठ सौ सत्तर (870) बतायी है। उत्तम तेजस्वी व्यास जी ने इस पर्व में सौप्तिक और ऐषीक दोनों की कथाएँ सम्बद्ध कर दी हैं। इसके बाद विद्वानों ने स्त्रीपर्व कहा है, जो करूण- रस की धारा बहाने वाला है। प्रज्ञाचक्षु राजा धृतराष्ट्र ने पुत्र शोक से संतप्त हो भीमसेन के प्रति द्रोह-बुद्धि कर ली और श्रीकृष्ण द्वारा अपने समीप लायी हुई लोहे की मजबूत प्रतिमा को भीमसेन समझकर भुजाओं में भर लिया तथा उसे दबाकर टूक-टूक कर डाला। उस समय पुत्र शोक से पीड़ित बुद्धिमान राजा धृतराष्ट्र को विदुर जी ने मोक्ष का साक्षात्कार कराने वाली युक्तियों तथा विवेकपूर्ण बुद्धि के द्वारा संसार की दुःखरूपता का प्रतिपादन करते हुए भली-भाँति समझा बुझाकर शान्त किया।

    इसी पर्व में शोकाकुल धृतराष्ट्र का अन्तःपुर की स्त्रियों के साथ कौरवों के युद्ध स्थान में जाने का वर्णन है। वहीं वीर पत्नियों के अत्यन्त करुणापूर्ण विलाप का कथन है। वहीं गान्धारी और धृतराष्ट्र के क्रोधावेश तथा मूर्च्छित होने का उल्लेख है। उस समय उन क्षत्राणियों ने युद्ध में पीठ न दिखाने वाले अपने शूरवीर पुत्रों, भाईयों और पिताओं को रणभूमि में मरा हुआ देखा। पुत्रों और पौत्रों के वध से पीड़ित गान्धारी के पास आकर भगवान श्रीकृष्ण ने उनके क्रोध को शान्त किया। इस प्रसंग का भी इसी पर्व में वर्णन किया गया है। वहीं यह भी कहा गया है कि परम बुद्धिमान और सम्पूर्ण धर्मात्माओं में श्रेष्ठ राजा युधिष्ठिर ने वहाँ मारे गये समस्त राजाओं के शरीरों का शास्त्र विधि से दाह-संस्कार किया और कराया। तदनन्तर राजाओं को जलांजलिदान के प्रसंग में उन सबके लिये तर्पण का आरम्भ होते ही कुन्ती द्वारा गुप्त रूप से उत्पन्न हुए अपने पुत्र कर्ण का गूढ़ वृत्तान्त प्रकट किया गया, यह प्रसंग आता है। महर्षि व्यास ने ये सब बातें स्त्रीपर्व में कही हैं। शोक और विकलता का संचार करने वाला यह ग्यारहवाँ पर्व श्रेष्ठ पुरुषों के चित्त को भी विह्वल करके उनके नेत्रों से आँसू की धारा प्रवाहित करा देता है। इस पर्व में सत्ताईस अध्याय कहे गये हैं। इसके श्लोकों की संख्या सात सौ पचहत्तर (775) कही गयी है। इस प्रकार परमबुद्धिमान व्यास जी ने महाभारत का यह उपाख्यान कहा है।

(सम्पूर्ण महाभारत (आदि पर्व) द्वितीय अध्याय के श्लोक 325-346 का हिन्दी अनुवाद)

   स्त्री पर्व के पश्चात बारहवाँ पर्व शान्ति पर्व के नाम से विख्यात है। यह बुद्धि और विवेक को बढ़ाने वाला है। इस पर्व में यह कहा गया है कि अपने पितृतुल्य गुरुजनों, भाईयों, पुत्रों सगे सम्बन्धी एवं मामा आदि को मरवाकर राजा युधिष्ठिर के मन में बड़ा निर्वेद (दुःख एवं वैराग्य) हुआ। शान्ति पर्व में बाण शय्या पर शयन करने वाले भीष्म जी के द्वारा उपदेश किये हुए धर्मों का वर्णन है। उत्तम ज्ञान की इच्छा रखने वाले राजाओं का उन्हें भली-भाँति जानना चाहिये। उसी पर्व में काल और कारण की अपेक्षा रखने वाले देश और काल के अनुसार व्यवहार में लाने योग्य आपद्धर्मों का भी निरूपण किया गया है, जिन्हें अच्छी तरह जान लेने पर मनुष्य सर्वज्ञ हो जाता है। शान्तिपर्व में विविध एवं अद्भुत मोक्षधर्मों का भी बड़े विस्तार के साथ प्रतिपादन किया गया है। इस प्रकार यह बारहवाँ पर्व कहा गया है, जो ज्ञानीजनों को अत्यन्त प्रिय है। इस पर्व में तीन सौ उन्तालीस (339) अध्याय हैं और तपोधनो! इसकी श्लोक संख्या चौदह हजार सात सौ बत्तीस (14732) है। इसके बाद उत्तम अनुशासन पर्व है, यह जानना चाहिये।

   जिसमें कुरुराज युधिष्ठिर गंगानन्दन भीष्म जी से धर्म का निश्चित सिद्धान्त सुनकर प्रकृतिस्थ हुए, यह बात कही गयी है। इसमें धर्म और अर्थ से सम्बन्ध रखने वाले हितकारी आचार-व्यवहार का निरूपण किया गया है। साथ ही नाना प्रकार के दानों के फल भी कहे गये हैं। दान के विशेष पात्र, दान की उत्तम विधि, आचार और उसका विधान, सत्यभाषण की पराकाष्ठा, गौओं और ब्राह्मणों का माहात्म्य, धर्मों का रहस्य तथा देश और काल (तीर्थ और पर्व) की महिमा- ये सब अनेक वृत्तान्त जिसमें वर्णित हैं, वह उत्तम अनुशासन पर्व है इसी में भीष्म को स्वर्ग की प्राप्ति कही गयी है। धर्म का निर्णय करने वाला यह पर्व तेरहवाँ है। इसमें एक सौ छियालीस (146) अध्याय हैं। और पूरे आठ हजार (8000) श्लोक कहे गये हैं। तदनन्तर चौदहवें आश्वमेधिक नामक पर्व की कथा है। जिसमें परम उत्तम योगी संवर्त तथा राजा मरुत्त का उपाख्यान है। युधिष्ठिर को सुवर्ण के खजाने की प्राप्ति और परीक्षित के जन्म का वर्णन है।

   पहले अश्वत्थामा के अस्‍त्र की अग्नि से दग्ध हुए बालक परीक्षित का पुनः श्रीकृष्ण के अनुग्रह से जीवित होना कहा गया है। सम्पूर्ण राष्ट्रों में घूमने के लिये छोड़े गये अश्वमेध सम्बन्धी अश्व के पीछे पाण्डुनन्दन अर्जुन के जाने और उन-उन देशों में कुपित राजकुमारों के साथ उनके युद्ध करने का वर्णन है। पुत्रिकाधर्म के अनुसार उत्पन्न हुए चित्रांगदाकुमार बभ्रुवाहन ने युद्ध में अर्जुन को प्राण संकट की स्थिति में डाल दिया था; यह कथा भी अश्वमेध पर्व में ही आयी है। वहीं अश्वमेध महायज्ञ में नकुलोपाख्यान आया है। इस प्रकार यह परम अद्भुत अश्वमेधिक पर्व कहा गया है। इसमें एक सौ तीन अध्याय पढ़े गये हैं। तत्त्वदर्शी व्यास जी ने इस पर्व में तीन हजार तीन सौ बीस (3320) श्लोकों की रचना की है। तदनन्तर आश्रमवासिक नामक पंद्रहवें पर्व का वर्णन है। जिसमें गान्धारी सहित राजा धृतराष्ट्र और विदुर के राज्य छोड़कर वन के आश्रम में जाने का उल्लेख हुआ है। उस समय धृतराष्ट्र को प्रस्थान करते देख सती साध्वी कुन्ती भी गुरुजनों की सेवा में अनुरक्त हो अपने पुत्र का राज्य छोड़कर उन्हीं के पीछे-पीछे चली गयीं।

(सम्पूर्ण महाभारत (आदि पर्व) द्वितीय अध्याय के श्लोक 347- 365 का हिन्दी अनुवाद)

  जहाँ राजा धृतराष्ट्र युद्ध में मरकर परलोक में गये हुए अपने वीर पुत्रों, पौत्रों तथा अन्य राजाओं को भी पुनः अपने पास आया हुआ देखा। महर्षि व्यास जी के प्रसाद से यह उत्तम आश्चर्य देखकर गान्धारी सहित धृतराष्ट्र ने शोक त्याग दिया और उत्तम सिद्धि प्राप्‍त कर ली। इसी पर्व में यह बात भी आयी है कि विदुर जी ने धर्म का आश्रय लेकर उत्तम गति प्राप्त की। साथ ही मन्त्रियों सहित जितेन्द्रिय विद्वान गवल्गण-पुत्र संजय ने भी उत्तम पद प्राप्त कर लिया। इसी पर्व में यह बात भी आयी है कि धर्मराज युधिष्ठिर को नारद जी का दर्शन हुआ। नारद जी से ही उन्होंने यदुवंशियों के महान संहार का समाचार सुना। यह अत्यन्त अदभुत आश्रमवासिक पर्व कहा गया है।

   इस पर्व में अध्यायों की संख्या बयालीस है। तत्त्वदर्शी व्यास जी ने इसमें एक हजार पाँच सौ छः (1506) श्लोक रखे हैं। इसके बाद मौसल पर्व की सूची सुनो- यह पर्व अत्यन्त दारुण है। इसी में यह बात आयी है कि श्रेष्ठ यदुवंशी वीर क्षार समुद्र के तट पर आपस के युद्ध में अस्त्र-शस्त्रों के स्पर्श मात्र से मारे गये। ब्राह्मणों के शाप ने उन्हें पहले ही पीस डाला था। उन सबने मधुपान के स्थान में जाकर खूब पीया और नशे से होश-हवास खो बैठे। फिर दैव से प्रेरित हो परस्पर संघर्ष करके उन्होंने एरकारूपी वज्र से एक-दूसरे को मार डाला। वहीं सबका संहार करके बलराम और श्रीकृष्ण दोनों भाईयों ने समर्थ होते हुए भी अपने ऊपर आये हुए सर्वसंहारकारी महान काल का उल्लंघन नहीं किया (महर्षियों की वाणी सत्य करने के लिये काल का आदेश स्वेच्छा से अंगीकार कर लिया)।

   वहीं यह प्रसंग भी है कि नरश्रेष्ठ अर्जुन द्वारका में आये और उसे वृष्णिवंशियों से सूनी देखकर विषाद में डूब गये उस समय उनके मन में बड़ी पीड़ा हुई। उन्होंने अपने मामा नरश्रेष्ठ वसुदेव जी का दाह-संस्कार करके आपानस्थान में जाकर यदुवंश वीरों के विकट विनाश का रोमांचकारी दृश्य देखा। वहाँ से भगवान श्रीकृष्ण, महात्मा बलराम तथा प्रधान वृष्णिवंशी वीरों के शरीरों को लेकर उन्होंने उनका संस्कार सम्पन्न किया। तदनन्तर अर्जुन ने द्वारका के बालक, वृद्ध तथा स्त्रियों को साथ ले वहाँ से प्रस्थान किया। परन्तु उस दुःखदायिनी विपत्ति में उन्होंने अपने गाण्डीव धनुष की अभूतपूर्व पराजय देखी। उनके सभी दिव्यास्त्र उस समय अप्रसन्न से होकर विस्मृत हो गये। वृष्णिकुल की स्त्रियों का देखते-देखते अपहरण हो जाता और अपने प्रभावों का स्थिर न रहना, यह सब देख कर अर्जुन को बड़ा निर्वेद (दुःख) हुआ। फिर उन्होंने व्यास जी के वचनों से प्रेरित हो धर्मराज युधिष्ठिर से मिलकर संन्यास में अभिरुचि दिखायी।

  इस प्रकार यह सोलहवाँ मौसल पर्व कहा गया है। इसमें तत्त्वज्ञानी व्यास ने गिनकर आठ अध्याय और तीन सौ बीस (320) श्लोक कहे हैं। इसके पश्चात सत्रहवाँ महाप्रस्थानिक पर्व कहा गया है। जिसमें नरश्रेष्ठ पाण्डव अपना राज्य छोड़कर द्रौपदी के साथ महाप्रस्थान के पथ पर आ गये।

(सम्पूर्ण महाभारत (आदि पर्व) द्वितीय अध्याय के श्लोक 366-390 का हिन्दी अनुवाद)

    उस यात्रा में उन्होंने लाल सागर के पास पहुँचकर साक्षात अग्निदेव को देखा और उन्हीं की प्रेरणा से पार्थ ने उन महात्मा को आदरपूर्वक अपना उत्तम एवं दिव्य गाण्डीव धनुष अर्पण कर दिया। उसी पर्व में यह भी कहा गया है कि राजा युधिष्ठिर ने मार्ग में गिरे हुए अपने भाईयों और द्रौपदी को देखकर भी उनकी क्या दशा हुई, यह जानने के लिये पीछे की ओर फिरकर नहीं देखा और उन सबको छोड़कर आगे बढ़ गये। यह सत्रहवाँ 'महाप्रस्थानिक पर्व' कहा गया है। इसमें तत्त्वज्ञानी व्यास जी ने तीन अध्याय और एक सौ तेईस श्लोक गिनकर कहे हैं। तदनन्तर स्वर्गारोहण पर्व जानना चाहिये। जो दिव्य वृत्तान्तों से युक्त और अलौकिक है। उसमें यह वर्णन आया है कि स्वर्ग से युधिष्ठिर को लेने के लिये एक दिव्य रथ आया किंतु महाज्ञानी धर्मराज युधिष्ठिर ने दयावश अपने साथ आये हुए कुत्ते को छोड़कर अकेले उस पर चढ़ना स्वीकार नहीं किया। महात्मा युधिष्ठिर की धर्म में इस प्रकार अविचल स्थिति जानकर कुत्ते ने अपने मायामय स्वरूप को त्याग दिया और अब वह साक्षात धर्मराज के रूप में स्थित हो गया। धर्मराज के साथ युधिष्ठिर स्वर्ग में गये। वहाँ देवदूत ने व्याज से उन्हें नरक की विपुल यातनाओं का दर्शन कराया। वहीं धर्मात्मा युधिष्ठिर ने अपने भाईयों की करुणाजनक पुकार सुनी थी। वे सब वहीं नरक प्रदेश में यमराज की आज्ञा के अधीन रहकर यातना भोगते थे। तत्पश्चात धर्मराज तथा देवराज ने पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर को वास्तव में उनके भाईयों को जो सद्गति प्राप्त हुई थी, उसका दर्शन कराया।

      इसके बाद धर्मराज ने आकाशगंगा में गोता लगाकर मानव शरीर को त्याग दिया और स्वर्गलोक में अपने धर्म से उपार्जित उत्तम स्थान पाकर वे इन्द्रादि देवताओं के साथ उनसे सम्मानित हो आनन्दपूर्वक रहने लगे। इस प्रकार बुद्धिमान व्यास जी ने यह अठारहवाँ पर्व कहा है। तपोधनों! परमऋषि महात्मा व्यास जी ने इस पर्व में गिने-गिनाये पाँच अध्याय और दो सौ नौ (209) श्लोक कहे हैं। इस प्रकार ये कुल मिलाकर अठारह पर्व कहे गये हैं। खिल पर्वों में हरिवंश तथा भविष्य का वर्णन किया गया है। हरिवंश के खिलपर्वों में महर्षि व्यास ने गणनापूर्वक बारह हजार (12000) श्लोक रखे हैं। इस प्रकार महाभारत में यह सब पर्वों का संग्रह बताया गया है। कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से अठारह अक्षौहिणी सेनाएँ एकत्र हुई थीं और वह महाभयंकर युद्ध अठारह दिनों तक चलता रहा। जो द्विज अंगों और उपनिषदों सहित चारों वेदों को जानता है, परंतु इस महाभारत इतिहास को नहीं जानता, वह विशिष्ट विद्वान नहीं है। असीम बुद्धि वाले महात्मा व्यास ने यह अर्थशास्त्र कहा है। यह महान धर्मशास्त्र भी है, इसे कामशास्त्र भी कहा गया है (और मोक्षशास्त्र तो यह है ही)।

       इस उपाख्यान को सुन लेने पर और कुछ सुनना अच्छा नहीं लगता। कोकिल का कलरव सुनकर कौओं की कठोर ‘काँय-काँय’ किसे पसंद आयेगी? जैसे पाँच भूतों से त्रिविध (आध्यात्मिक, आदिदैविक और आधिभौतिक) लोकसृष्टियाँ प्रकट होती हैं, उसी प्रकार इस उत्तम इतिहास से कवियों का काव्यरचनाविषयक बुद्धियाँ प्राप्ति होती हैं। द्विजवरों! इस महाभारत इतिहास के भीतर ही अठारह पुराण स्थित हैं, ठीक उसी तरह, जैसे आकाश में ही चारों प्रकार की प्रजा (जरायुज, स्वेदज, अण्डज और उद्भिज्ज) विद्यमान हैं। जैसे विचित्र मानसिक क्रियाएँ ही समस्त इन्द्रियों की चेष्टाओं का आधार हैं उसी प्रकार सम्पूर्ण लौकिक-वैदिक कर्मो के उत्कृष्ट फल-साधनों का यह आख्यान ही आधार है। जैसे भोजन किये बिना शरीर नहीं रह सकता, वैसे ही इस पृथ्वी पर कोई भी ऐसी कथा नहीं है जो इस महाभारत का आश्रय लिये बिना प्रकट हुई हो। सभी श्रेष्ठ कवि इस महाभारत की कथा का आश्रय लेते है और लेंगे। ठीक वैसे उन्नति चाहने वाले सेवक श्रेष्ठ स्वामी का सहारा लेते हैं। जैसे शेष तीन आश्रम उत्तम गृहस्थ आश्रम से बढ़कर नहीं हो सकते, उसी प्रकार संसार के कवि इस महाभारत काव्य से बढ़कर काव्य रचना करने में समर्थ नहीं हो सकते।

(सम्पूर्ण महाभारत (आदि पर्व) द्वितीय अध्याय के श्लोक 391-395 का हिन्दी अनुवाद)

   तपस्वी महर्षियों! (तथा महाभारत के पाठकों)! आप सब लोग सदा सांसारिक आसक्तियों मे ऊँचे उठे और आपका मन सदा धर्म में लगा रहे, क्योंकि परलोक में गये हुए जीव का बंधु या सहायक एकमात्र धर्म ही है। चतुर मनुष्य भी धन और स्त्रियों का सेवन तो करते हैं, किंतु वे उनकी श्रेष्ठता पर विश्राम नहीं करते हैं और न उन्हें स्थिर ही मानते हैं। जो व्यास जी के मुख से निकले हुए इस अप्रमेय (अतुलनीय) पुण्यदायक, पवित्र, पापहारी और कल्याणमय महाभारत को दूसरों के मुख से सुनता है, उसे पुष्कर तीर्थ के जल में गोता लगाने की क्या आवश्यकता है? ब्राह्मण दिन में अपनी इन्द्रियों द्वारा जो पाप करता है, उससे सांयकाल महाभारत का पाठ करके मुक्त हो जाता है।

    इसी प्रकार वह मन, वाणी और क्रिया द्वारा रात में जो पाप करता है, उससे प्रातःकाल महाभारत का पाठ करके छूट जाता हैं। जो गौओं के सींग में सोना मढ़ाकर वेदवेत्ता एवं बहुज्ञ ब्रह्माण को प्रतिदिन सौ गायें दान देता है और जो केवल महाभारत कथा का श्रवण मात्र करता है, इन दोनों मे से प्रत्येक को बराबर ही फल मिलता है।

(इस प्रकार श्रीमहाभारत आदि पर्व के अंतर्गत पर्वसंग्रह पर्व का दूसरा अध्याय पूरा हुआ।)

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