सम्पूर्ण विष्णु पुराण (तृतीय अंश) का ग्यारहवाँ व बारहवाँ अध्याय

{{सम्पूर्ण विष्णु पुराण (तृतीय अंश) का ग्यारहवाँ व बारहवाँ अध्याय}} {Eleventh and twelfth chapters of the complete Vishnu Purana (third part)}

                           "सम्पूर्ण विष्णु पुराण " 

                          ॐ श्री मन्नारायणाय नम:
               ''नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम ।
               देवी सरस्वती व्याप्तं ततो जयमुदिरयेत"।।

                               श्री विष्णुपुराण
                                (तृतीय अंश)


                      "ग्यारहवाँ व बारहवाँ अध्याय"

"ग्रहस्थ सम्बन्धी सदाचार का वर्णन"
और्व बोले ;– गृहस्थ पुरुष को नित्यप्रति देवता, गौ, ब्राह्मण, सिद्धगण, वयोवृद्ध तथा आचार्य की पूजा करनी चाहिये और दोनों समय संध्यावन्दन तथा अग्निहोत्रादि कर्म करने चाहिये || १ || गृहस्थ पुरुष सदा ही संयमपूर्वक रहकर बिना कहींसे कटे हुए दो वस्त्र, उत्तम औषधियाँ और गारुड (मरकत आदि विष नष्ट करनेवाले) रत्न धारण करे || २ || वह केशों को स्वच्छ और चिकना रखे तथा सर्वदा सुगंधयुक्त सुंदर वेष और मनोहर श्वेतपुष्प धारण करें || ३ || किसीका थोडा-सा भी धन हरण न करें और थोडा-सा भी अप्रिय भाषण न करे | जो मिथ्या हो ऐसा प्रिय वचन भी कभी न बोले और न कभी दूसरों के दोषों को ही कहे || ४ || हे पुरुषश्रेष्ठ ! दूसरों की स्त्री अथवा दूसरों के साथ वैर करने में कभी रूचि न करे, निन्दित सवारी में कभी न चढ़े और नदीतीर की छाया का कभी आश्रय न ले || ५ || बुद्धिमान पुरुष लोकविदिष्ट, पतित, उन्मत्त और जिसके बहुत-से शत्रु हों ऐसे परपीडक पुरुषों के साथ तथा कुलटा, कुलटा के स्वामी, क्षुद्र, मिथ्यावादी अति व्ययशील, निंदापरायण और दुष्ट पुरुषों के साथ कभी मित्रता न करे और न कभी मार्ग में अकेला चले || ६ – ७ || हे नरेश्वर ! जलप्रवाह के वेग में सामने पड़कर स्नान न करे, जलते हुए घरमे प्रवेश न करे और वृक्ष की चोटीपर न चढ़े || ८ || दाँतो को परस्पर न घिसे, नाक को न कुरेदे तथा मुख को बंद लिये हुए जमुहाई न ले और न बंद मुखसे खाँसे या श्वास करते हुए अधोवायु न छोड़े; तथा नखों को न चबावे, तिनका न तोड़ें और पृथ्वीपर भी न लिखे || १० ||

हे प्रभो ! विचक्षण पुरुष मूँछ-दाढ़ी के बालों को न चबावे, दो ढेलों को परस्पर न रगड़े और अपवित्र एवं निन्दित नक्षत्रों को न देखे || ११ || नग्न परस्त्री को और उदय अथवा अस्त होते हुए सूर्य को न देखे तथा शव और शव – गंध से घृणा न करे, क्योंकि शव – गंध सोम का अंश है || १२ || चौराहा, चैत्यवृक्ष, श्मशान, उपवन और दुष्टा स्त्री की समीपता – इन सबका रात्रि के समय सर्वदा त्याग करे || १३ || बुद्धिमान पुरुष अपने पूजनीय देवता, ब्राह्मण और तेजोमय पदार्थों की छाया को कभी न लाँघे तथा शून्य वनखंडी और शून्य घरमें कभी अकेला न रहे || १४ || प्राज्ञ पुरुष को चाहिये कि अनार्य व्यक्ति का संग न करे, कुटिल पुरुष में आसक्त न हो, सर्प के पास न जाय और जग पड़नेपर अधिक देरतक लेटा न रहे || १३ || हे नरेश्वर ! बुद्धिमान पुरुष जागने, सोने, स्नान करने, बैठने, शय्यासेवन करने और व्यायाम करने में अधिक समय न लगावे || १७ || हे राजेन्द्र ! प्राज्ञ पुरुष दाँत और सींगवाले पशुओं को, ओस को तथा सामनेकी वायु और धूप को सर्वदा परित्याग करे ||१८ || नग्न होकर स्नान, शयन और आचमन न करे तथा केश खोलकर आचमन और देव-पूजन न करे || १९ || होम तथा देवार्चन आदि क्रियाओं में, आचमन में , पुण्याहवाचन में और जप में एक वस्त्र धारण करके प्रवृत्त न हो || २० || संशयशील व्यक्तियों के साथ कभी न रहे | सदाचारी पुरुषों का तो आधे क्षण का संग भी अति प्रशंसनीय होता है || २१ || बुद्धिमान पुरुष उत्तम अथवा अधम व्यक्तियों से विरोध न करे | हे राजन ! विवाह और विवाद सदा समान व्यक्तियों से ही होना चाहिये || २२ || प्राज्ञ पुरुष कलह न बढ़ावे तथा व्यर्थ वैर का भी त्याग करे | थोड़ी-सी हानि सह ले, किन्तु वैर से कुछ लाभ होता हो तो उसे भी छोड़ दे || २३ || स्नान करने के अनन्तर स्नान से भीगी हुई धोती अथवा हाथों से शरीर को न पोछे तथा खड़े-खड़े केशों को न झाडे और आचमन भी न करे || २४ || पैर के ऊपर पैर न रखे, गुरुजनों के सामने पैर न फैलावे और धृष्टतापूर्वक उनके सामने कभी उच्चासनपर न बैठे || २५ ||

देवालय, चौराहा, मांगलिक द्रव्य और पूज्य व्यक्ति – इन सबको बायीं ओर रखकर न निकले तथा इनके विपरीत वस्तुओं को दायीं ओर रखकर न जाय || २६ || चन्द्रमा, सूर्य, अग्नि, जल, वायु और पूज्य व्यक्तियों के सम्मुख पंडित पुरुष मल – मूत्र – त्याग न करे और न थूके ही || २७ || खड़े- खड़े अथवा मार्ग में मूत्र-त्याग न करे तथा श्लेष्मा (थूक), विष्ठा, मूत्र और रक्त को कभी न लाँघे || २८ || भोजन, देव-पूजा, मांगलिक कार्य और जप-होमादि के समय तथा महापुरुषों के सामने थूकना और छींकना उचित नहीं है || २९ || बुद्धिमान पुरुष स्त्रियों का अपमान न करे, उनका विश्वास भी न करे तथा उनसे ईर्ष्या और उनका तिरस्कार भी कभी न करे || ३० || सदाचार – परायण प्राज्ञ व्यक्तियों का अभिवादन किये बिना कभी अपने घरसे न निकले || ३१ || चौराहों को नमस्कार करे, यथासमय अग्निहोत्र करे, दीन-दु:खियों का उद्धार करे और बहुश्रुत साधू पुरुषों का सत्संग करे || ३२ ||

जो पुरुष देवता और ऋषियों की पूजा करता है, पितृगण को पिंडोदक देता है और अतिथि का सत्कार करता है वह पुण्यलोकों को जाता है || ३३ || जो व्यक्ति जितेन्द्रिय होकर समयानुसार हित, मित और प्रिय भाषण करता है, हे राजन ! वह आनंद के हेतुभूत अक्षय लोकों को प्राप्त होता है || ३४ || बुद्धिमान, लज्जावान, क्षमाशील, आस्तिक और विनयी पुरुष विद्वान और कुलीन पुरुषों के योग्य उत्तम लोकों में जाता है || ३५ || अकाल मेघगर्जना के समय, पर्व-दिनोंपर, अशौच काल में तथा चन्द्र और सूर्यग्रहण के समय बुद्धिमान पुरुष अध्ययन न करे || ३६ || जो व्यक्ति क्रोधित को शांत करता है, सबका बन्धु है, मत्सरशून्य है, भयभीत को सांत्वना देनेवाला है और साधू स्वभाव है उसके लिये स्वर्ग तो बहुत थोडा फल है || ३७ || जिसे शरीर-रक्षा की इच्छा हो वह पुरुष वर्षा और धुप में छाता लेकर निकले, रात्रि के समय और वन में दंड लेकर जाय तथा जहाँ कहीं जाना हो सर्वदा जूते पहनकर जाय || ३८ || बुद्धिमान पुरुष को कमर की ओर, इधर-उधर अथवा दूर के पदार्थों को देखते हुए नहीं चलना चाहिये, केवल युगमात्र (चार हाथ) पृथ्वी को देखता हुआ चले || ३९ ||

जो जितेन्द्रिय दोषके समस्त हेतुओं को त्याग देता है उसके धर्म, अर्थ और कामकी थोड़ी-सी भी हानि नहीं होती || ४० || जो विद्या-विनय-सम्पन्न, सदाचारी प्राज्ञ पुरुष पापी के प्रति पापमय व्यवहार नहीं करता, कुटिल पुरुषों से प्रिय भाषण करता हैं तथा जिसका अंत:करण मैत्री से द्रवीभूत रहता हैं, मुक्ति उसकी मुट्ठी में रहती है || ४१ || जो वीतरागमहापुरुष कभी काम, क्रोध और लोभादिके वशीभूत नहीं होते तथा सर्वदा सदाचार में स्थित रहते हैं उनके प्रभाव से ही पृथ्वी टिकी हुई है || ४२ || अत: प्राज्ञ पुरुष को वही सत्य कहना चाहिये जो दूसरों की प्रसन्नता का कारण हो | यदि किसी सत्य वाक्य के कहने से दूसरों को दुःख होता जाने तो मौन रहे || ४३ || यदि प्रिय वाक्य को भी अहितकर समझे तो उसे न कहे; उस अवस्था में तो हितकर वाक्य ही कहना अच्छा है, भले ही वह अत्यंत अप्रिय क्यों न हो || ४४ || जो कार्य इहलोक और परलोक में प्राणियों के हितका साधक हो मतिमान पुरुष मन, वचन और कर्म से उसीका आचरण करें || ४५  ||

"इति श्रीविष्णुपुराणे तृतीयेऽशे एकादशोऽध्यायः और द्वादशोऽध्यायः"

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