सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासन पर्व) का एक सौ बयालीसवाँ अध्याय व एक सौ तैंतालीसवाँ (the 142 chapter the and 143 chapter entire Mahabharata (anushashn Parva)

सम्पूर्ण महाभारत

अनुशासनपर्व (दानधर्मपर्व)

एक सौ बयालीसवाँ अध्याय

(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) एक सौ बयालीसवाँ अध्याय के श्लोक 1-96½ का हिन्दी अनुवाद) 

“उमा-महेश्वर-संवाद, वानप्रस्थ-धर्म तथा उसके पालनकी विधि और महिमा”

पार्वतीने कहा--भगवन्‌! नियमपूर्वक व्रतका पालन करनेवाले एकाग्रचित्त वानप्रस्थी महात्मा नदियोंके रमणीय तटप्रदेशोंमें, झरनोंमें, सरिताओंके तटवर्ती निकुंजोंमें, पर्वतोंपर, वनोंमें और फल-मूलसे सम्पन्न पवित्र स्थानोंमें निवास करते हैं ।। १-२ ।।

कल्याणकारी देवेश्वर! वानप्रस्थी महात्मा अपने शरीरको ही कष्ट पहुँचाकर जीवननिर्वाह करते हैं; अतः उनके पालन करनेयोग्य जो पवित्र कर्तव्य या नियम है, उसीको मैं सुनना चाहती हूँ ।। ३ ।।

भगवान्‌ _महेश्वरने कहा--देवि! (गृहस्थ एवं) वानप्रस्थोंका जो धर्म है, उसको मुझसे एकाग्रचित्त होकर सुनो और सुनकर एकचित्त हो अपनी बुद्धिको धर्ममें लगाओ ।। ४ 

नियमोंका पालन करके सिद्ध हुए वनवासी साधु वानप्रस्थोंको यह कर्म करना चाहिये। कैसा कर्म? यह बताता हूँ, सुनो || ५ ।।

मनुष्य पहले गृहस्थ होकर पुत्रोंके उत्पादन-द्वारा पितरोंक ऋणसे उऋण हो पत्नीसे सम्पन्न होनेवाले कार्यकी पूर्ति करके धर्मसम्पादनके लिये गृहका परित्याग कर दे ।।

मनको धैर्यपूर्वक स्थिर करके मनुष्य दृढ़ निश्चयके साथ निर्द्धनद्ध (एकाकी) होकर अथवा स्त्रीको साथ रखकर वनवासके लिये प्रस्थान करे ।।

नदी और वनसे युक्त जो परम पुण्यमय प्रदेश हैं, वे प्रायः अज्ञानसे मुक्त और तीर्थों तथा देवस्थानोंसे सुशोभित हैं। उनमें जाकर विधिका ज्ञान प्राप्त करके क्रमश: ऋषिधर्मकी दीक्षा ग्रहण करे और दीक्षित होनेके पश्चात्‌ एकचित्त हो परिचर्या आरम्भ करे ।।

सबेरे उठना, शौचाचारका पालन करना, सब देवताओंको मस्तक झुकाना, शरीरमें गायका गोबर लगाकर नहाना, दोष और प्रमादका त्याग करना, सायंकाल और प्रात:काल स्नान एवं विधिवत्‌ अग्निहोत्र करना, ठीक समयपर शौचाचारका पालन करना, सिरपर जटा और कटिप्रदेशमें वल्कल धारण करना, समिधा और पुष्पका संग्रह करनेके लिये सदा वनमें विचरना, समयपर नीवारसे आग्रयण कर्म (नवशस्येष्टि यज्ञका सम्पादन) करना, साग और मूलका संकलन करना तथा सदा अपने घरको शुद्ध रखना--आदि कार्य वानप्रस्थ मुनिके लिये अभीष्ट है। इनसे उसके धर्मकी सिद्धि होती है ।।

पहले अतिथियोंके सम्मुख जाय, फिर सदा उनकी सेवामें तत्पर रहे। पाद्य और आसन आदिके द्वारा उनकी पूजा करके उन्हें भोजनके लिये बुलावे। समयपर ऐसी वस्तुओंसे रसोई बनावे, जो गाँवमें पैदा न हुई हों। उस रसोईके द्वारा पहले देवताओं और पितरोंका पूजन करे। तत्पश्चात्‌ अतिथिको सत्कारपूर्वक भोजन करावे। ऐसा करनेवाले वानप्रस्थको सनातन धर्मकी सिद्धि प्राप्त होती है ।।

धर्मासनपर बैठे हुए शिष्ट पुरुषोंद्वारा उसे धर्मार्थयुक्त कथाएँ सुननी चाहिये। उसे अपने लिये पृथक्‌ आश्रम बना लेना चाहिये। वह पृथ्वी अथवा प्रस्तरकी शय्यापर सोये ।।

वानप्रस्थ मुनि व्रत और उपवासमें तत्पर रहे, दूसरोंपर क्षमाका भाव रखे, अपनी इन्द्रियोंको वशमें करे। दिन-रात यथासम्भव शौचाचारका पालन करके धर्मका चिन्तन करे ।।

उन्हें दिनमें तीन बार स्नान, पितरों और देवताओंका पूजन, अग्निहोत्र तथा विधिवत्‌ यज्ञ करने चाहिये ।।

वानप्रस्थको जीविकाके लिये नीवार (तिन्नीका चावल) और फल-मूलका सेवन करना चाहिये तथा शरीरमें स्निग्धता लाने या तेलसे होनेवाले कार्योंके निर्वाहके लिये इंगुद और रेड़ीके तेलका सेवन करना उचित है | ७ ।।

उन्हें योगका अभ्यास करके उसमें सिद्धि प्राप्त करनी चाहिये। काम और क्रोधको त्याग देना चाहिये। वीरासनसे बैठकर वीरस्थान (विशाल और घने जंगल) में निवास करने चाहिये ।। ८ ।।

मनको एकाग्र रखकर योगसाधनमें तत्पर रहना चाहिये। श्रेष्ठ वानप्रस्थको गर्मीमें पंचाग्नि सेवन करना चाहिये। हठयोगशास्त्रमें प्रसिद्ध मण्डूकयोगके अभ्यासमें नियमपूर्वक लगे रहना चाहिये। किसी भी वस्तुका न्यायानुकूल सेवन करना चाहिये ।। ९ ।।

सदा वीरासनसे बैठना और वेदी या चबूतरेपर सोना चाहिये। धर्ममें बुद्धि रखनेवाले वानस्थ मुनियोंकों शीततोयाग्नियोगका आचरण करना चाहिये अर्थात्‌ उन्हें सर्दीकी मौसममें रातको जलके भीतर बैठना या खड़े रहना, बरसातमें खुले मैदानमें सोना और ग्रीष्म-ऋतुमें पंचाग्निका सेवन करना चाहिये || १० ।।

वे वायु अथवा जल पीकर रहें। सेवारका भोजन करें। पत्थरसे अन्न या फलको कूँचकर खायाँ अथवा दाँतोंसे चबाकर ही भक्षण करें। सम्प्रक्षालके नियमसे रहें अर्थात्‌ दूसरे दिनके लिये आहार संग्रह करके न रखें ।।

अधोवस्त्रकी जगह चीर और वल्कल पहनें, उत्तरीयके स्थानमें मृगछालेसे ही अपने अंगोंको आच्छादित करें। उन्हें समयके अनुसार धर्मके उद्देश्यसे विधिपूर्वक तीर्थ आदि स्थानोंकी ही यात्रा करनी चाहिये ।। १२ ।।

वानप्रस्थको सदा वनमें ही रहना, वनमें ही विचरना, वनमें ही ठहरना, वनके ही मार्गपर चलना और गुरुकी भाँति वनकी शरण लेकर वनमें ही जीवन-निर्वाह करना चाहिये ।। १३ ।।

प्रतिदिन अग्निहोत्र और पंचमहायज्ञोंका सेवन वानप्रस्थोंका धर्म है। उन्हें विभागपूर्वक वेदोक्त पंच-यज्ञोंका निरन्तर पालन करना चाहिये ।। १४ ।।

अष्टमी तिथिको होनेवाले अष्टका श्राद्धरूप यज्ञमें तत्पर रहना, चातुर्मास्य व्रतका सेवन करना, पौर्णमास और दर्शादि यज्ञ तथा नित्ययज्ञका अनुष्ठान करना वानप्रस्थ मुनिका धर्म है ।। १५ ||

वानप्रस्थ मुनि स्त्री-समागम, सब प्रकारके संकर तथा सम्पूर्ण पापोंसे दूर रहकर वनमें विचरते रहते हैं || १६ ।।

खुक्‌-सुवा आदि यज्ञपात्र ही उनके लिये उत्तम उपकरण हैं। वे सदा आहवनीय आदि त्रिविध अग्नियोंकी शरण लेकर सदा उन्हींकी परिचर्यामें लगे रहते हैं और नित्य सन्मार्गपर चलते हैं। इस प्रकार अपने धर्ममें तत्पर रहनेवाले वे श्रेष्ठ पुरुष परमगतिको प्राप्त होते हैं ।। १७ ।।

वे मुनि सत्यधर्मका आश्रय लेनेवाले और सिद्ध होते हैं, अतः महान्‌ पुण्यमय ब्रह्मलोक तथा सनातन सोमलोकमें जाते हैं ।। १८ ।।

देवि! यह मैंने तुम्हारे निकट विस्तारयुक्त एवं मंगलमय वानप्रस्थधर्मका स्थूलभावसे वर्णन किया है ।।

उमादेवी बोलीं--भगवन्‌! सर्वभूतेश्वर! समस्त प्राणियोंद्वारा वन्दित महेश्वर! ज्ञानगोष्ठियोंमें मुनि-समुदायका जो धर्म निश्चित किया गया है, उसे बताइये ।।

ज्ञानगोष्ठियोंमें जो सम्यक्‌ सिद्ध बताये गये हैं, वे वनवासी मुनि कोई तो एकाकी ही स्वच्छन्द विचरते हैं, कोई पत्नीके साथ रहते हैं। उनका धर्म कैसा माना गया है? ।। 21

श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! सभी वानप्रस्थ तपस्यामें संलग्न रहते हैं, उनमेंसे कुछ तो स्वच्छन्द विचरनेवाले होते हैं (स्त्रीको साथ नहीं रखते) और कुछ अपनी-अपनी स्त्रीके साथ रहते हैं। स्वच्छन्द विचरनेवाले मुनि सिर मुड़ाकर गेरुए वस्त्र पहनते हैं; (उनका कोई एक स्थान नहीं होता) किंतु जो स्त्रीके साथ रहते हैं, वे रात्रिको अपने आश्रममें ही ठहरते हैं ।। २२ ।।

दोनों प्रकारके ही ऋषियोंका यह महान्‌ कर्तव्य है कि वे प्रतिदिन तीनों समय जलनमें स्नान करें और अग्निमें आहुति डालें। समाधि लगावें, सन्मार्गपर चलें और शास्त्रोक्त कर्मोका अनुष्ठान करें || २३ ।।

पहले जो तुम्हारे समक्ष वनवासियोंके धर्म बताये गये हैं, उन सबका यदि वे पालन करते हैं तो उन्हें अपनी तपस्याका पूर्ण फल मिलता है ।। २४ ।।

जो गृहस्थ दाम्पत्य धर्मका पालन करते हुए स्त्रीको अपने साथ रखते हैं, उसके साथ ही इन्द्रियसंयम-पूर्वक वेदविहित धर्मका आचरण करते हैं और केवल ऋतुकालनमें ही स्त्रीसमागम करते हैं, उन धर्मात्माओंको ऋषियोंके बताये हुए धर्मोके पालन करनेका फल मिलता है। धर्मदर्शी पुरुषोंको कामनावश किसी भोगका सेवन नहीं करना चाहिये || २५-२६ ।।

जो हिंसादोषसे मुक्त होकर सम्पूर्ण प्राणियोंको अभयदान कर देता है, उसीको धर्मका फल प्राप्त होता है ।। २७ ।।

जो सम्पूर्ण प्राणियोंपर दया करता है, सबके साथ सरलताका बर्ताव करता और समस्त भूतोंको आत्मभावसे देखता है, वही धर्मके फलसे युक्त होता है || २८ ।।

चारों वेदोंमें निष्णात होना और सब जीवोंके प्रति सरलताका बर्ताव करना--ये दोनों एक समान समझे जाते हैं अथवा सरलताका ही महत्त्व अधिक माना जाता है ।।

सरलताको धर्म कहते हैं और कुटिलताको अधर्म। सरलभावसे युक्त मनुष्य ही यहाँ धर्मके फलका भागी होता है ।। ३० ।।

जो सदा सरल बर्तावमें तत्पर रहता है, वह देवताओंके समीप निवास करता है। इसलिये जो अपने धर्मका फल पाना चाहता हो, उसे सरलतापूर्ण बर्तावसे युक्त होना चाहिये ।। ३१ ।।

क्षमाशील, जितेन्द्रिय, क्रोधविजयी, धर्मनिष्ठ, अहिंसक और सदा धर्मपरायण मनुष्य ही धर्मके फलका भागी होता है ।। ३२ ।।

जो पुरुष आलस्यरहित, धर्मात्मा, शक्तिके अनुसार श्रेष्ठ मार्गपपर चलनेवाला, सच्चरित्र और ज्ञानी होता है, वह ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है ।। ३३ ।।

उमादेवी बोलीं--सबको मान देनेवाले महेश्वर! मैं यायावरोंके धर्मको सुनना चाहती हूँ, आप महान्‌ अनुग्रह करके मुझे यह बताइये ।।

श्रीमहेश्वरने कहा--भामिनि! तुम तत्पर होकर यायावरोंके धर्म सुनो। व्रत और उपवाससे उनके अंग-प्रत्यंग शुद्ध हो जाते हैं तथा वे तीर्थ-स्नानमें तत्पर रहते हैं ।।

उनमें धैर्य और क्षमाका भाव होता है। वे सत्यव्रत-परायण होकर एक-एक पक्ष और एक-एक मासका उपवास करके अत्यन्त दुर्बल हो जाते हैं। उनकी दृष्टि सदा धर्मपर ही रहती है ।।

पवित्र मुसकानवाली देवि! वे सर्दी, गर्मी और वर्षाका कष्ट सहन करते हुए बड़ी भारी तपस्या करते हैं और कालयोगसे मृत्युको प्राप्त होकर स्वर्गलोकमें जाते हैं ।।

वहाँ भी नाना प्रकारके भोगोंसे संयुक्त और दिव्यगन्धसे सम्पन्न हो दिव्य आभूषण धारण करके सुन्दर विमानोंपर बैठते और दिव्यांगनाओंके साथ इच्छानुसार विहार करते हैं। देवि! यह सब यायावरोंका धर्म मैंने तुम्हें बताया। अब और क्या सुनना चाहती हो? ।।

उमाने कहा--प्रभो! वानप्रस्थ ऋषियोंमें जो चक्रचर (छकड़ेसे यात्रा करनेवाले) हैं उनके धर्मको मैं जानना चाहती हूँ ।।

श्रीमहेश्वरने कहा--शुभे! यह मैं तुम्हें बता रहा हूँ। चक्रचारी या शाकटिक मुनियोंका धर्म सुनो ।।

वे अपनी स्त्रियोंक साथ सदा छकड़ोंके बोझ ढोते हुए यथासमय छकड़ोंद्वारा ही जाकर भिक्षाकी याचना करते हैं। सदा तपस्याके उपार्जनमें लगे रहते हैं। वे धीर मुनि तपस्याद्वारा अपने सारे पापोंका नाश कर डालते हैं तथा काम और क्रोधसे रहित हो सम्पूर्ण दिशाओंमें पर्यटन करते हैं ।।

शोभने! उसी जीवनचर्यासे रहित हुए वे कालयोगसे मृत्युको प्राप्त होकर स्वर्गमें जाते हैं और वहाँ दिव्य भोगोंसे आनन्दित हो अपने मौजसे घूमते-फिरते हैं। देवि! तुम्हारे इस प्रश्नचका भी उत्तर दे दिया, अब और क्या सुनना चाहती हो ।।

उमाने कहा--प्रभो! अब मैं वैखानसोंका धर्म सुनना चाहती हूँ ।।

श्रीमहेश्वरने कहा--शुभेक्षणे! वे जो वैखानस नामवाले वानप्रस्थ हैं, बड़ी कठोर तपस्यामें संलग्न रहते हैं। अपने तेजसे देदीप्यमान होते हैं। सत्यव्रत-परायण और धीर होते हैं। उनकी तपस्यामें पापका लेश भी नहीं होता है ।।

उनमेंसे कुछ लोग अभश्मकुट्ट (पत्थरसे ही अन्न या फलको कूँचकर खानेवाले) होते हैं। दूसरे दाँतोंस ही ओखलीका काम लेते हैं, तीसरे सूखे पत्ते चबाकर रहते हैं, चौथे उज्छवृत्तिसे जीविका चलानेवाले होते हैं। कुछ कापोती वृत्तिका आश्रय लेकर कबूतरोंके समान अन्नके एक-एक दाने बीनते हैं। कुछ लोग पशुचर्याको अपनाकर पशुओंके साथ ही चलते और उन्हींकी भाँति तृण खाकर रहते हैं। दूसरे लोग फेन चाटकर रहते हैं तथा अन्य बहुतेरे वैखानस मृगचर्याका आश्रय लेकर मृगोंके समान उन्हींके साथ विचरते हैं ।।

कुछ लोग जल पीकर रहते, कुछ लोग हवा खाकर निर्वाह करते और कितने ही निराहार रह जाते हैं। कुछ लोग भगवान्‌ विष्णुके चरणारविन्दोंका उत्तम रीतिसे पूजन करते हैं।।

वे रोग और मृत्युसे रहित हो घोर तपस्या करते हैं और अपनी ही शक्तिसे प्रतिदिन मृत्युको डराया करते हैं। उनके लिये इन्द्रलोकमें ढेर-के-ढेर भोग संचित रहते हैं। वे देवतुल्य भोगोंसे सम्पन्न हो देवताओंकी समानता प्राप्त कर लेते हैं ।।

सती साध्वी देवि! वे चिरकालतक श्रेष्ठ अप्सराजोंके साथ रहकर सुखका अनुभव करते हैं। यह तुमसे वैखानसोंका धर्म बताया गया, अब और क्या सुनना चाहती हो? 

उमाने कहा--भगवन्‌! अब मैं तपस्याके धनी वालखिल्योंका परिचय सुनना चाहती हूँ ।।

श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! वालखिल्योंकी धर्मचर्याका वर्णन सुनो। वे मृगछाला पहनते हैं, शीत-उष्ण आदि द्वन्द्*ोंका उनपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। तपस्या ही उनका धन है। सुश्रोणि! उनके शरीरकी लम्बाई एक अंगूठेके बराबर है, उन्हीं शरीरोंमें वे सब एक साथ रहते हैं ।।

वे प्रतिदिन नाना प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा निरन्तर उगते हुए सूर्यकी स्तुति करते हुए सहसा आगे बढ़ते जाते हैं और अपनी सूर्यतुल्य किरणोंसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित करते रहते हैं। वे सब-के-सब धर्मज्ञ और सत्यवादी हैं ।।

उन्हींमें लोकरक्षाके लिये निर्मल सत्य प्रतिष्ठित है। देवि! उन वालखिल्योंके ही तपोबलसे यह सारा जगत्‌ टिका हुआ है। पवित्र मुसकानवाली महाभागे! उन्हीं महात्माओंकी तपस्या, सत्य और क्षमाके प्रभावसे सम्पूर्ण भूतोंकी स्थिति बनी हुई है, ऐसा मनीषी पुरुष मानते हैं ।।

महान्‌ पुरुष समस्त प्रजावर्ग तथा सम्पूर्ण लोकोंके हितके लिये तपस्या करते हैं। तपस्यासे सब कुछ प्राप्त होता है। तपस्यासे अभीष्ट फलकी प्राप्ति होती है। लोकमें जो दुर्लभ वस्तु है, वह भी तपस्यासे सुलभ हो जाती है ।।

उमाने पूछा--देव! जो तपस्याके धनी तपस्वी अपने आश्रमधर्ममें ही रम रहे हैं, वे किस आचरणसे तपस्वी होते हैं? || ३४ ।।

भगवन्‌! जो राजा या राजकुमार हैं अथवा जो निर्धन या महाधनी हैं, वे किस कर्मके प्रभावसे महान्‌ फलके भागी होते हैं? ।। ३५ ।।

देव! वनवासी मुनि किस कर्मसे दिव्य स्थानको पाकर दिव्य चन्दनसे विभूषित होते हैं? । ३६ ।।

देव! त्रिपुरनाशन त्रिलोचन! तपस्याके आश्रित शुभ फलके विषयमें मेरा यही संदेह है। इस सारे संदेहका उत्तर आप पूर्णरूपसे प्रदान करें ।। ३७ ।।

श्रीमहेश्वरने कहा--जो उपवास व्रतसे सम्पन्न, जितेन्द्रिय, हिंसारहित और सत्यवादी होकर सिद्धिको प्राप्त हो चुके हैं, वे मृत्युके पश्चात्‌ रोग-शोकसे रहित हो गन्धर्वोके साथ रहकर आनन्द भोगते हैं ।। ३८ ।।

जो धर्मात्मा पुरुष न्यायानुसार विधिपूर्वक हठयोग-प्रसिद्ध मण्डूकयोगके अनुसार शयन करता और यज्ञकी दीक्षा लेता है, वह नागलोकमें नागोंके साथ सुख भोगता है ।। ३९ ||

जो मृगचर्या-व्रतकी दीक्षा ले मृगोंके मुखसे उच्छिष्ट हुई घासको प्रसन्नतापूर्वक उन्हींके साथ रहकर भक्षण करता है, वह मृत्युके पश्चात्‌ अमरावतीपुरीमें जाता है ।।

जो व्रतधारी वानप्रस्थ मुनि सेवार अथवा जीर्ण-शीर्ण पत्तेका आहार करता तथा जाड़ेमें प्रतेदिन शीतका कष्ट सहन करता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है ।। ४१ 

जो वायु, जल, फल अथवा मूल खाकर रहता है, वह यक्षोंपर अपना प्रभुत्व स्थापित करके अप्सराओंके साथ आनन्द भोगता है ।। ४२ ।।

जो गर्मीमें शास्त्रोक्त विधिके अनुसार पंचाग्नि सेवन करता है, वह बारह वर्षोतक उक्त व्रतका पालन करके जन्मान्तरमें भूमण्डलका राजा होता है || ४३ ।।

जो मुनि बारह वर्षोतक आहारका संयम करता हुआ यत्नपूर्वक मरु-साधना करके अर्थात्‌ जलको भी त्यागकर तप करता है, वह भी इस पृथ्वीका राजा होता है || ४४।।

जो वानप्रस्थ अपने चारों ओर विशुद्ध आकाशको ग्रहण करता हुआ खुले मैदानमें वेदीपर सोता और बारह वर्षोके लिये प्रसन्नतापूर्वक व्रतकी दीक्षा ले उपवास करके अपना शरीर त्याग देता है, वह स्वर्गलोकमें सुख भोगता है || ४५६ ।।

भामिनि! वेदीपर शयन करनेसे प्राप्त होनेवाले फल इस प्रकार बताये गये हैं--सवारी, शय्या और चन्द्रमाके समान उज्ज्वल बहुमूल्य गृह ।। ४६३ ।।

जो केवल अपने ही सहारे जीवन-यापन करता हुआ नियमपूर्वक रहता है और नियमित भोजन करता है अथवा अनशन व्रतका आश्रय ले शरीरको त्याग देता है, वह स्वर्गका सुख भोगता है || ४७३ ।।

जो अपने ही सहारे जीवन-यापन करता हुआ बारह वर्षोकी दीक्षा ले महासागरमें अपने शरीरका त्याग कर देता है, वह वरुणलोकमें सुख भोगता है ।। ४८ $ ।।

जो अपने ही सहारे जीवन-यापन करता हुआ निर्द्धनद्ध और परिग्रहशून्य हो बारह वर्षोके लिये व्रतकी दीक्षा ले अन्तमें पत्थरसे अपने पैरोंको विदीर्ण करके स्वयं ही अपने शरीरको त्याग देता है, वह गुह्कलोकमें आनन्द भोगता है ।। ४९-५० ।।

जो बारह वर्षोतक इस मनोगत दीक्षाका पालन करता है, वह स्वर्गलोकमें जाता और देवताओंके साथ आनन्द भोगता है ।। ५१ ।।

जो बारह वर्षोके लिये व्रत-पालनकी दीक्षा ले अपने ही सहारे जीवन-यापन करता हुआ अपने शरीरको अग्निमें होम देता है, वह अग्निलोकमें प्रतिष्ठित होता है || ५२ 

देवि! जो ब्राह्मण नियमपूर्वक रहकर यथोचित रीतिसे वनवास-व्रतकी दीक्षा ले अपने मनको परमात्मचिन्तनमें लगाकर ममताशून्य और धर्मका अभिलाषी होकर बारह वर्षोतक इस मनोगत दीक्षाका पालन करके अरणी-सहित अग्निको वृक्षकी डालीमें बाँधकर अर्थात्‌ अग्निका परित्याग करके अनावृत भावसे यात्रा करता है, सदा वीर मार्गसे चलता है, वीरासनपर बैठता है और वीरकी भाँति खड़ा होता है, वह वीरगतिको प्राप्त होता है ।।

वह इन्द्रलोकमें जाकर सदा सम्पूर्ण कामनाओंसे सम्पन्न होता है। उसके ऊपर दिव्य पुष्पोंकी वर्षा होती है तथा वह दिव्य चन्दनसे विभूषित होता है ।। ५६ ।।

वह धर्मात्मा देवलोकमें देवताओंके साथ सुख-पूर्वक निवास करता है और निरन्तर वीरलोकमें रहकर वीरोंके साथ संयुक्त होता है || ५७ ।।

जो सब कुछ त्यागकर वनवासकी दीक्षा ले सत्त्वगुणमें स्थित नियमपरायण एवं पवित्र हो वीरपथका आश्रय लेता है, उसे सनातन लोक प्राप्त होते हैं || ५८ ।।

वह इन्द्रलोकमें जाकर नीरोग और दिव्य शोभासे सम्पन्न हो आनन्द भोगता है और इच्छानुसार चलनेवाले विमानके द्वारा स्वच्छन्द विचरता रहता है || ५९ ।।

(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें उमामहेश्वरसंवादाविषयक एक सौ बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ)

 (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३७½ श्लोक मिलाकर कुल ९६½ “लोक हैं)

सम्पूर्ण महाभारत

अनुशासनपर्व (दानधर्मपर्व)

एक सौ  तैंतालीसवाँ अध्याय

(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) एक सौ तैंतालीसवाँ अध्याय के श्लोक 1-59 का हिन्दी अनुवाद) 

“ब्राह्मणादि वर्णोकी प्राप्तिमें मनुष्य के शुभाशुभ कर्मोंकी प्रधानताका प्रतिपादन”

पार्वतीजीने पूछा--भगदेवताकी आँख फोड़कर पूषाके दाँत तोड़ डालनेवाले दक्षयज्ञविध्वंसी भगवान्‌ त्रिलोचन! मेरे मनमें यह एक महान्‌ संशय है ।। १ ।।

भगवान्‌ ब्रह्माजीने पूर्वकालमें जिन चार वर्णोंकी सृष्टि की है, उनमेंसे वैश्य किस कर्मके परिणामसे शूद्रत्वको प्राप्त हो जाता है? |। २ ।।

अथवा क्षत्रिय किस कर्मसे वैश्य होता है और ब्राह्मण किस कर्मसे क्षत्रिय हो जाता है? देव! प्रतिलोम धर्मको कैसे निवृत्त किया जा सकता है? ।। ३ ।।

प्रभो! कौन-सा कर्म करनेसे ब्राह्मण शूद्र-योनिमें जन्म लेता है अथवा किस कर्मसे क्षत्रिय शूद्र हो जाता है? ।। ४ ।।

देव! पापरहित भूतनाथ! मेरे इस संशयका समाधान कीजिये। शूद्र, वैश्य और क्षत्रिय --इन तीन वर्णोंके लोग किस प्रकार स्वभावतः ब्राह्मणत्वको प्राप्त हो सकते हैं? || ५ ।।

श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! ब्राह्मणत्व दुर्लभ है। शुभे! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शाद्र --ये चारों वर्ण मेरे विचारसे नैसर्गिक (प्राकृतिक या स्वभावसिद्ध) हैं, ऐसा मेरा विचार है ।। ६ |।

इतना अवश्य है कि यहाँ पापकर्म करनेसे द्विज अपने स्थानसे-अपनी महत्तासे नीचे गिर जाता है। अत: द्विजको उत्तम वर्णमें जन्म पाकर अपनी मर्यादाकी रक्षा करनी चाहिये ।। ७ |।

यदि क्षत्रिय अथवा वैश्य ब्राह्मण-धर्मका पालन करते हुए ब्राह्मणत्वका सहारा लेता है तो वह ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है ।। ८ ।।

जो ब्राह्मण ब्राह्मणत्वका त्याग करके क्षत्रिय-धर्मका सेवन करता है, वह अपने धर्मसे भ्रष्ट होकर क्षत्रिय योनिमें जन्म लेता है ।। ९ |।

जो विप्र दुर्लभ ब्राह्मणत्वको पाकर लोभ और मोहके वशीभूत हो अपनी मन्दबुद्धिताके कारण वैश्यका कर्म करता है, वह वैश्ययोनिमें जन्म लेता है। अथवा यदि वैश्य शूद्रके कर्मको अपनाता है, तो वह भी शाूद्रत्वको प्राप्त होता है। शूद्रोचित कर्म करके अपने धर्मसे भ्रष्ट हुआ ब्राह्मण शूद्रत्वको प्राप्त हो जाता है ।। १०-११ ।।

ब्राह्मण-जातिका पुरुष शूद्र-कर्म करनेके कारण अपने वर्णसे भ्रष्ट होकर जातिसे बहिष्कृत हो जाता है और मृत्युके पश्चात्‌ वह ब्रह्मलोककी प्राप्तिसे वंचित होकर नरकमें पड़ता है। इसके बाद वह शूद्रकी योनिमें जन्म ग्रहण करता है ।। १२ ।।

महाभागे! धर्मचारिणि! क्षत्रिय अथवा वैश्य भी अपने-अपने कर्मोंको छोड़कर यदि शूद्रका काम करने लगता है तो वह अपनी जातिसे भ्रष्ट होकर वर्णसंकर हो जाता है और दूसरे जन्ममें शूद्रकी योनिमें जन्म पाता है। ऐसा व्यक्ति ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य कोई भी क्यों न हो, वह शूद्रभावको प्राप्त होता है ।। १३-१४ ।।

जो पुरुष अपने वर्णधर्मका पालन करते हुए बोध प्राप्त करता है और ज्ञान-विज्ञानसे सम्पन्न, पवित्र तथा धर्मज्ञ होकर धर्ममें ही लगा रहता है, वही धर्मके वास्तविक फलका उपभोग करता है ।। १५ ||

देवि! ब्रह्माजीनी यह एक बात और बतायी है--धर्मकी इच्छा रखनेवाले सत्पुरुषोंको आजीवन अध्यात्म-तत्त्वका ही सेवन करना चाहिये ।। १६ ।।

देवि! उग्रस्वभावके मनुष्यका अन्न निन्दित माना गया है। किसी समुदायका, श्राद्धका, जननाशौचका, दुष्ट पुरुषका और शूद्रका अन्न भी निषिद्ध है--उसे कभी नहीं खाना चाहिये ।। १७ ।।

देवताओं और महात्मा पुरुषोंने शूद्रके अन्नकी सदा ही निन्‍्दा की है। इस विषयमें पितामह ब्रह्माजीके श्रीमुखका वचन प्रमाण है, ऐसा मेरा विश्वास है ।। १८ ।।

जो ब्राह्मण पेटमें शूद्रका अन्न लिये मर जाता है, वह अग्निहोत्री अथवा यज्ञ करनेवाला ही क्‍यों न रहा हो, उसे शूद्रकी योनिमें जन्म लेना पड़ता है ।। १९ ।।

उदरमें शूद्रात्नका शेषभाग स्थित होनेके कारण ब्राह्मण ब्रह्मलोकसे वंचित हो शूद्रभावको प्राप्त होता है; इसमें कोई अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है || २० ।।

उदरमें जिसके अन्नका अवशेष लेकर जो ब्राह्मण मृत्युको प्राप्त होता है, वह उसीकी योनिमें जाता है। जिसके अन्नसे जीवन-निर्वाह करता है, उसीकी योनिमें जन्म ग्रहण करता है।।

जो शुभ एवं दुर्लभ ब्राह्मणत्वको पाकर उसकी अवहेलना करता है और नहीं खानेयोग्य अन्न खाता है, वह निश्चय ही ब्राह्मणत्वसे गिर जाता है || २२ ।।

शराबी, ब्रह्महत्यारा, नीच, चोर, व्रतभंग करनेवाला, अपवित्र, स्वाध्यायहीन, पापी, लोभी, कपटी, शठ, व्रतका पालन न करनेवाला, शूद्रजातिकी स्त्रीका स्वामी, कुण्डाशी (पतिके जीते-जी उत्पन्न किये हुए जारज पुत्रके घरमें खानेवाला अथवा पाकपात्रमें ही भोजन करनेवाला), सोमरस बेचनेवाला और नीचसेवी ब्राह्मण ब्राह्मणकी योनिसे भ्रष्ट हो जाता है || २३-२४ ।।

जो गुरुकी शैय्यापर सोनेवाला, गुरुद्रोही और गुरुनिन्दामें अनुरक्त है, वह ब्राह्मण वेदवेत्ता होनेपर भी ब्रह्मयोनिसे नीचे गिर जाता है || २५ ।।

देवि! इन्हीं शुभ कर्मों और आचरणोंसे शूद्र ब्राह्मणत्वको प्राप्त होता है और वैश्य क्षत्रियत्वको ।।

शूद्र अपने सभी कर्मोको न्यायानुसार विधिपूर्वक सम्पन्न करे। अपनेसे ज्येष्ठ वर्णकी सेवा और परिचर्यामें प्रयत्नपूर्वक लगा रहे। अपने कर्तव्यपालनसे कभी ऊबे नहीं। सदा सन्मार्गपर स्थित रहे। देवताओं और द्विजोंका सत्कार करे। सबके आतिथ्यका व्रत लिये रहे। ऋतुकालमें ही स्त्रीके साथ समागम करे। नियमपूर्वक रहकर नियमित भोजन करे। स्वयं शुद्ध रहकर शुद्ध पुरुषोंका ही अन्वेषण करे। अतिथि-सत्कार और कुट॒म्बीजनोंके भोजनसे बचे हुए अन्नका ही आहार करे और मांस न खाय। इस नियमसे रहनेवाला शूद्र (मृत्युके पश्चात्‌ पुण्यकर्मोंका फल भोगकर) वैश्ययोनिमें जन्म लेता है ।।

वैश्य सत्यवादी, अहंकारशून्य, निर्द्धन्द्ध, शान्तिके साधनोंका ज्ञाता, स्वाध्यायपरायण और पवित्र होकर नित्य यज्ञोंद्वारा यजन करे। जितेन्द्रिय होकर ब्राह्म॒णोंका सत्कार करते हुए समस्त वर्णोकी उन्नति चाहे। गृहस्थके व्रतका पालन करते हुए प्रतिदिन दो ही समय भोजन करे। यज्ञशेष अन्नका ही आहार करे। आहारपर काबू रखे। सम्पूर्ण कामनाओंको त्याग दे। अहंकारशून्य होकर विधिपूर्वक आहुति देते हुए अग्निहोत्र कर्मका सम्पादन करे। सबका आतिथ्य-सत्कार करके अवशिष्ट अन्नका स्वयं भोजन करे। त्रिविध अग्नियोंकी मन्त्रोच्चारणपूर्वक परिचर्या करे। ऐसा करनेवाला वैश्य द्विज होता है। वह वैश्य पवित्र एवं महान क्षत्रियकुलमें जन्म लेता है ।। ३०--३४ ।।

क्षत्रियकुलमें उत्पन्न हुआ वह वैश्य जन्मसे ही क्षत्रियोचित संस्कारसे सम्पन्न हो उपनयनके पश्चात्‌ ब्रह्मचर्यव्रतके पालनमें तत्पर हो सर्वसम्मानित द्विज होता है। वह दान देता है, पर्याप्त दक्षिणावाले समृद्धिशाली यज्ञोंद्वारा भगवानका यजन करता है, वेदोंका अध्ययन करके स्वर्गकी इच्छा रखकर सदा त्रिविध अग्नियोंकी शरण ले उनकी आराधना करता है, दुःखी एवं पीड़ित मनुष्योंको हाथका सहारा देता है, प्रतिदिन प्रजाका धर्मपूर्वक पालन करता है, स्वयं सत्यपरायण होकर सत्यपूर्ण व्यवहार करता है तथा दर्शनसे ही सबके लिये सुखद होता है, वही श्रेष्ठ क्षत्रिय अथवा राजा है || ३५--३७ ।।

धर्मानुसार अपराधीको दण्ड दे। दण्डका त्याग न करे। प्रजाको धर्मकार्यका उपदेश दे। राजकार्य करनेके लिये नियम और विधानसे बँधा रहे। प्रजासे उसकी आयका छठा भाग करके रूपमें ग्रहण करे ।। ३८ ।।

कार्यकुशल धर्मात्मा क्षत्रिय स्वच्छन्दतापूर्वक ग्राम्य धर्म (मैथुन) का सेवन न करे। केवल ऋतुकालमें ही सदा पत्नीके निकट शयन करे ।। ३९ ।।

सदा उपवास करे अर्थात्‌ एकादशी आदिके दिन उपवास करे और दूसरे दिन भी सदा दो ही समय भोजन करे। बीचमें कुछ न खाय। नियमपूर्वक रहे, वेद-शास्त्रोंके स्वाध्यायमें तत्पर रहे, पवित्र हो प्रतिदिन अग्निशालामें कुशकी चटाईपर शयन करे ।। ४० ।।

क्षत्रिय सदा प्रसन्नतापूर्वक सबका आतिथ्य-सत्कार करते हुए धर्म, अर्थ और कामका सेवन करें। शूद्र भी यदि अन्नकी इच्छा रखकर उसके लिये प्रार्थना करे तो क्षत्रिय उनके लिये सदा यही उत्तर दे कि तुम्हारे लिये भोजन तैयार है, चलो कर लो || ४१ ।।

वह स्वार्थ या कामनावश किसी वस्तुका प्रदर्शन न करे। जो पितरों, देवताओं तथा अतिथियोंकी सेवाके लिये चेष्टा करता है, वही श्रेष्ठ क्षत्रिय है ।। ४२ ।।

क्षत्रिय अपने ही घरमें न्‍्यायपूर्वक भिक्षा (भोजन) करे। तीनों समय विधिवत्‌ अग्निहोत्र करता रहे ।। ४३ ।।

वह धर्ममें स्थित हो त्रिविध अग्नियोंकी मन्त्रपूर्वक परिचर्यासे पवित्रचित्त हो यदि गौओं तथा ब्राह्मणोंके हितके लिये समरमें शत्रुका सामना करते हुए मारा जाय तो दूसरे जन्ममें ब्राह्मण होता है || ४४ ।।

इस प्रकार धर्मात्मा क्षत्रिय अपने कर्मसे जन्मान्तरमें ज्ञानविज्ञानसम्पन्न, संस्कारयुक्त तथा वेदोंका पारंगत विद्वान ब्राह्मण होता है || ४५ ।।

देवि! इन कर्मफलोंके प्रभावसे नीच जाति एवं हीन कुलमें उत्पन्न हुआ शूद्र भी जन्मान्तरमें शास्त्रज्ञान-सम्पन्न और संस्कारयुक्त ब्राह्मण होता है ।। ४६ ।।

ब्राह्मण भी यदि दुराचारी होकर सम्पूर्ण संकर जातियोंके घर भोजन करने लगे तो वह ब्राह्मणत्वका परित्याग करके वैसा ही शूद्र बन जाता है || ४७ ।।

देवि! शूद्र भी यदि जितेन्द्रिय होकर पवित्र कर्मोके अनुष्ठानसे अपने अन्तःकरणको शुद्ध बना लेता है, वह द्विजकी ही भाँति सेव्य होता है--यह साक्षात्‌ ब्रह्माजीका कथन है || ४८ ।।

मेरा तो ऐसा विचार है कि यदि शूद्रके स्वभाव और कर्म दोनों ही उत्तम हों तो वह द्विजातिसे भी बढ़कर माननेयोग्य है ।। ४९ ।।

ब्राह्मणत्वकी प्राप्तिमें न तो केवल योनि, न संस्कार, न शास्त्रज्ञान और न संतति ही कारण है। ब्राह्मणत्वका प्रधान हेतु तो सदाचार ही है || ५० ।।

लोकमें यह सारा ब्राह्मणसमुदाय सदाचारसे ही अपने पदपर बना हुआ है। सदाचारमें स्थित रहनेवाला शाद्र भी ब्राह्मणत्वको प्राप्त हो सकता है ।। ५१ ।।

सुश्रोणि! ब्रह्मका स्वभाव सर्वत्र समान है। जिसके भीतर उस निर्गुण और निर्मल ब्रह्मका ज्ञान है, वही वास्तवमें ब्राह्मण है, ऐसा मेरा विचार है || ५२ ।।

देवि! ये जो चारों वर्णोंके स्थान और विभाग बतलाये गये हैं, ये उस-उस जातिमें जन्म ग्रहण करनेके फल हैं। प्रजाकी सृष्टि करते समय वरदाता ब्रह्माजीने स्वयं ही यह बात कही है ।। ५३ ।।

भामिनि! ब्राह्मण संसारमें एक महान क्षेत्र है। दूसरे क्षेत्रोंकी अपेक्षा इसमें विशेषता इतनी ही है कि यह पैरोंसे युक्त चलता-फिरता खेत है। इस क्षेत्रमें जो बीज डाला जाता है, वह परलोकके लिये जीविकाकी साधनरूप खेतीके रूपमें परिणत हो जाता है || ५४ 

अपना कल्याण चाहनेवाले ब्राह्मणको उचित है कि वह सज्जनोंके मार्गका अवलम्बन करके सदा अतिथि और पोष्यवर्गको भोजन करानेके बाद अन्न ग्रहण करे, वेदोक्त पथका आश्रय लेकर उत्तम बर्ताव करे || ५५ ||

गृहस्थ ब्राह्मण घरमें रहकर प्रतिदिन संहिताका पाठ और शास्त्रोंका स्वाध्याय करे। अध्ययनको जीविकाका साधन न बनावे ।। ५६ ।।

इस प्रकार जो ब्राह्मण सन्मार्गपर स्थित हो सत्पथका ही अनुसरण करता है तथा अन्निहोत्र एवं स्वाध्यायपूर्वक जीवन बिताता है, वह ब्रह्मभावको प्राप्त होता है ।। ५७ ।।

देवि! शुचिस्मिते! मनुष्यको चाहिये कि वह ब्राह्मणत्वको पाकर मन और इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए योनि, प्रतिग्रह और दानकी शुद्धि एवं सत्कर्मोंद्वारा उसकी रक्षा करे ।। ५८ ।।

गिरिराजकुमारी! शूद्र धर्माचरण करनेसे जिस प्रकार ब्राह्मणत्वको प्राप्त करता है तथा ब्राह्मण स्वधर्मका त्याग करके जातिसे भ्रष्ट होकर जिस प्रकार शूद्र हो जाता है, यह गूढ़ रहस्यकी बात मैंने तुम्हें बतला दी ॥५९॥

(इस प्रकार  श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें उमामहेश्वरसंवादाविषयक एक सौ तैतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ)

टीका टिप्पणी - उपर्युक्त कर्मोका निष्कामभावसे आचरण करनेवाले पुरुषको परमात्मपदकी प्राप्ति हो जाती है।

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