सम्पूर्ण महाभारत
उद्योग पर्व (संजययान पर्व)
इकतालीसवाँ अध्याय
(सम्पूर्ण महाभारत (उद्योग पर्व) एकचत्वारिंश अध्याय के श्लोक 1-12 का हिन्दी अनुवाद)
“विदुरजी के द्वारा स्मरण करने पर आये हुए सनत्सुजात ऋषि से धृतराष्ट्र को उपदेश देने के लिये उनकी प्रार्थना”
धृतराष्ट्र बोले ;- विदुर! यदि तुम्हारी वाणी से कुछ और कहना शेष रह गया हो तो कहो, मुझे उसे सुनने की बड़ी इच्छा है; क्योंकि तुम्हारे कहने का ढंग विलक्षण है।
विदुर ने कहा ;- भरतवंशी धृतराष्ट्र! कुमार ‘सनत्सुजात’ नाम से विख्यात जो परम प्राचीन सनातन ऋषि हैं, उन्होंने कहा था- ‘मृत्यु है ही नहीं।' महाराज! वे समस्त बुद्धिमानों में श्रेष्ठ हैं, वे ही आपके हृदय में स्थित व्यक्त और अव्यक्त सभी प्रकार के प्रश्नों का उत्तर देंगे।
धृतराष्ट्र ने कहा ;- विदुर! क्या तुम उस तत्त्व को नहीं जानते, जिसे अब पुन: सनातन ऋषि मुझे बतायेंगे? यदि तुम्हारी बुद्धि कुछ भी काम देती हो तो तुम्हीं मुझे उपदेश करो।
विदुर बोले ;- राजन! मेरा जन्म शूद्रा स्त्री के गर्भ से हुआ है, अत: इसके अतिरिक्त और कोई उपदेश देने का मैं साहस नहीं कर सकता, किंतु कुमार सनत्सुजात की बुद्धि सनातन है, मैं उसे जानता हूँ। ब्राह्मणयोनि में जिसका जन्म हुआ है, वह यदि गोपनीय तत्त्व का प्रतिपादन कर दे तो देवताओं की निन्दा का पात्र नहीं बनता। इसी कारण मैं आपको ऐसा कह रहा हूँ।
धृतराष्ट्र ने कहा ;- विदुर! उन परम प्राचीन सनातन ऋषि का पता मुझे बताओ। भला, इसी देह से यहाँ ही उनका समागम कैसे हो सकता है?
वैशम्पायनजी कहते हैं ;- राजन! तदनन्तर विदुरजी ने उत्तम व्रत वाले उन सनातन ऋषि का स्मरण किया। उन्होंने भी यह जानकर कि विदुर मेरा स्मरण कर रहे हैं, प्रत्यक्ष दर्शन दिया। विदुर ने शास्त्रोक्त विधि से पाद्य, अर्घ्य एवं मधुपर्क आदि अर्पण करके उनका स्वागत किया। इसके बाद जब वे सुखपूर्वक बैठकर विश्राम करने लगे, तब विदुर ने उनसे कहा।
‘भगवन! धृतराष्ट्र के हृदय में कुछ संशय है, जिसका समाधान मेरे द्वारा किया जाना उचित नहीं है। आप ही इस विषय का निरूपण करने योग्य हैं।
जिसे सुनकर ये नरेश सब दु:खों से पार हो जायं और लाभ-हानि, प्रिय-अप्रिय, जन्म-मृत्यु, भय-अमर्ष, भूख-प्यास, मद-ऐश्र्वर्य, चिन्ता-आलस्य, काम-क्रोध तथा अवनति-उन्नति- ये इन्हें कष्ट न पहुँचा सकें।
(इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्व के अन्तर्गत सनत्सुजातपर्व में विदुरजी के द्वारा सनत्सुजात की प्रार्थनाविषयक इकतालीसवां अध्याय पूरा हुआ)
सम्पूर्ण महाभारत
उद्योग पर्व (सनत्सुजात पर्व)
बयालीसवाँ अध्याय
(सम्पूर्ण महाभारत (उद्योग पर्व) द्विचत्वारिंश अध्याय के श्लोक 1-11 का हिन्दी अनुवाद)
“सनत्सुजातजी के द्वारा धृतराष्ट्र के विविध प्रश्नों का उत्तर”
वैशम्पायनजी कहते हैं ;- जनमेजय! तदनन्तर बुद्धिमान एवं महामना राजा धृतराष्ट्र ने विदुर के कहे हुए उस वचन का भली-भाँति आदर करके उत्कृष्ट ज्ञान की इच्छा से एकान्त में सनत्सुजात मुनि से प्रश्न किया।
धृतराष्ट्र बोले ;- सनत्सुजातजी! मैं यह सुना करता हूँ कि मृत्यु है ही नहीं, ऐसा आपका सिद्धान्त है। साथ ही यह भी सुना है कि देवता और असुरों ने मृत्यु से बचने के लिये ब्रह्मचर्य का पालन किया था। इन दोनों में कौन-सी बात यथार्थ है?
सनत्सुजात ने कहा ;- राजन! इस विषय में दो पक्ष हैं मृत्यु है और
वह ब्रह्मचर्य पालनरूप कर्म से दूर होती है- यह एक पक्ष है और ‘मृत्यु है ही नहीं'- यह दूसरा पक्ष है। परंतु यह बात जैसी है, वह मैं तुम्हें बताता हूँ, सुनो और मेरे कथन में संदेह न करना।
क्षत्रिय! इस प्रश्न के उक्त दोनों ही पहलुओं को सत्य समझो। कुछ विद्वानों ने मोहवश इस मृत्यु की सत्ता स्वीकार की है; किंतु मेरा कहना तो यह है कि प्रमाद ही मृत्यु है और अप्रमाद ही अमृत है। प्रमाद के ही कारण असुरगण मृत्यु से पराजित हुए और अप्रमाद से ही देवगण ब्रह्मस्वरूप हुए। यह निश्चय है कि मृत्यु व्याघ्र के समान प्राणियों का भक्षण नहीं करती, क्योंकि उसका कोई रूप देखने में नहीं आता।
कुछ लोग इस प्रमाद से भिन्न ‘यम’ को मृत्यु कहते हैं और हृदय से दृढ़तापूर्वक पालन किये हुए ब्रह्मचर्य को ही अमृत मानते हैं। यमदेव पितृलोक में राज्य-शासन करते हैं। वे पुण्यात्माओं के लिये मंगलमय और पापियों के लिये अमंगलमय हैं। इन यम की आज्ञा से ही क्रोध, प्रमाद और लोभरूपी मृत्यु मनुष्यों के विनाश में प्रवृत्त होती हैं। अहंकार के वशीभूत होकर विपरीत मार्ग पर चलता हुआ कोई भी मनुष्य परमात्मा का साक्षात्कार नहीं कर पाता।
मनुष्य (क्रोध, प्रमाद और लोभ से) मोहित होकर अहंकार के अधीन हो इस लोक से जाकर पुन: पुन: जन्म-मरण के चक्कर में पड़ते हैं। मरने के बाद उनके मन, इन्द्रिय और प्राण भी साथ जाते हैं। शरीर से प्राणरूपी इन्द्रियों का वियोग होने के कारण मृत्यु ‘मरण’ संज्ञा को प्राप्त होती है। प्रारब्ध कर्म का उदय होने पर कर्म के फल में आसक्ति रखने वाले लोग परलोक का अनुगमन करते हैं; इसीलिये वे मृत्यु को पार नहीं कर पाते। देहाभिमानी जीव परमात्मा साक्षात्कार के उपाय को न जानने से विषयों के उपभोग के कारण सब ओर भटकता रहता है।
इस प्रकार विषयों का जो भोग है, वह अवश्य ही इन्द्रियों को महान मोह में डालने वाला है और इन झूठे विषयों में राग रखने वाले मनुष्य की उनकी ओर प्रवृत्ति होनी स्वाभाविक है। मिथ्या भोगों में आसक्ति होने से जिसके अन्त:करण की ज्ञान शक्ति नष्ट हो गयी है, वह सब ओर विषयों का ही चिन्तन करता हुआ मन-ही-मन उनका आस्वादन करता है।
पहले तो विषयों का चिन्तन ही लोगों को मारे डालता है। इसके बाद वह काम और क्रोध को साथ लेकर पुन: जल्दी ही प्रहार करता है। इस प्रकार ये विषय-चिन्तन (काम और क्रोध) ही विवेक हीन मनुष्यों को मृत्यु के निकट पहुँचाते हैं; परंतु जो स्थिर बुद्धि वाले पुरुष हैं, वे धैर्य से मृत्यु के पार हो जाते हैं।
(सम्पूर्ण महाभारत (उद्योग पर्व) द्विचत्वारिंश अध्याय के श्लोक 12-21 का हिन्दी अनुवाद)
अत: जो मृत्यु को जीतने की इच्छा रखता है, उसे चाहिये कि परमात्मा का ध्यान करके विषयों को तुच्छ मानकर उन्हें कुछ भी न गिनते हुए उनकी कामनाओं का उत्पन्न होते ही नष्ट कर डाले। इस प्रकार जो विद्वान विषयों की इच्छा को मिटा देता है, उसको साधारण प्राणियों की मृत्यु की भाँति मृत्यु नहीं मारती,
कामनाओं के पीछे चलने वाला मनुष्य कामनाओं के साथ ही नष्ट हो जाता है; परंतु ज्ञानी पुरुष कामनाओं का त्याग कर देने पर जो कुछ भी जन्म-मरण रूप दु:ख है, उन सबको वह नष्ट कर देता है।
काम ही समस्त प्राणियों के लिये मोहक होने के कारण तमोमय और अज्ञानरूप है तथा नरक के समान दु:खदायी देखा जाता है। जैसे मद्यपान से मोहित हुए पुरुष चलते-चलते गड्ढे़ की ओर दौड़ पड़ते हैं, वैसे ही कामी पुरुष भोगों में सुख मानकर उनकी ओर दौड़ते हैं।
जिसके चित्त की वृत्तियां विषय भोगों से मोहित नहीं हुई हैं, उस ज्ञानी पुरुष का इस लोक में तिनकों के बनाये हुए व्याघ्र के समान मृत्यु क्या बिगाड़ सकती है? इसलिये राजन! विषय भोगों के मूल कारणरूप अज्ञान को नष्ट करने की इच्छा से दूसरे किसी भी सांसारिक पदार्थ को कुछ भी न गिनकर उसका चिन्तन त्याग देना चाहिये।
यह जो तुम्हारे शरीर के भीतर अन्तरात्मा है, मोह के वशीभूत होकर यही क्रोध, लोभ और मृत्यु रूप हो जाता है। इस प्रकार मोह से होने वाली मृत्यु को जानकर जो ज्ञाननिष्ठ हो जाता है, वह इस लोक में मृत्यु से कभी नहीं डरता। उसके समीप आकर मृत्यु उसी प्रकार नष्ट हो जाती है, जैसे मृत्यु के अधिकार में आया हुआ मरण-धर्मा मनुष्य।
धृतराष्ट्र बोले ;- द्विजातियों के लिये यज्ञों द्वारा जिन पवित्रतम सनातन एवं श्रेष्ठ लोकों की प्राप्ति बतायी गयी हैं, यहाँ वेद उन्हीं को परम पुरुषार्थ कहते हैं। इस बात को जानने वाला विद्वान उत्तम कर्मों का आश्रय क्यों न लें?
सनत्सुजात ने कहा ;- राजन! अज्ञानी पुरुष इस प्रकार भिन्न-भिन्न लोकों में गमन करता है तथा वेद कर्म के बहुत से प्रयोजन भी बताते हैं; परंतु जो निष्काम पुरुष है, वह ज्ञान मार्ग के द्वारा अन्य सभी मार्गों का बाध करके परमात्मा स्वरूप होता हुआ ही परमात्मा को प्राप्त होता है।
धृतराष्ट्र बोले ;- विद्वन! यदि वह परमात्मा ही क्रमश: इस सम्पूर्ण जगत के रूप में प्रकट होता है तो उस अजन्मा और पुरातन पुरुष पर कौन शासन करता है? अथवा उसे इस रूप में आने की क्या आवश्यकता है और क्या सुख मिलता है? यह सब मुझे ठीक-ठीक बताइये।
(सम्पूर्ण महाभारत (उद्योग पर्व) द्विचत्वारिंश अध्याय के श्लोक 22-34 का हिन्दी अनुवाद)
धृतराष्ट्र बोले ;- इस जगत में कुछ लोग ऐसे हैं, जो धर्म का आचरण नहीं करते तथा कुछ लोग उसका आचरण करते हैं, अत: धर्म पाप के द्वारा नष्ट होता है या धर्म ही पाप को नष्ट कर देता है।
सनत्सुजात ने कहा ;- राजन! धर्म और पाप दोनों के पृथक-पृथक फल होते हैं और उन दोनों का उपभोग करना पड़ता है।
किंतु परमात्मा में स्थित होने पर विद्वान पुरुष उस ज्ञान के द्वारा अपने पूर्वकृत पाप और पुण्य दोनों का नाश कर देता है; यह बात सदा प्रसिद्ध है। यदि ऐसी स्थिति नहीं हुई तो देहाभिमानी मनुष्य कभी पुण्यफल को प्राप्त करता है और कभी क्रमश: प्राप्त हुए पूर्वोपार्जित पाप के फल का अनुभव करता है। इस प्रकार पुण्य और पाप के जो स्वर्ग-नरक दो अस्थिर फल हैं, उनका भोग करके वह पुन: तदनुसार कर्मों में लग जाता है; किंतु कर्मों के तत्व को जानने वाला पुरुष निष्काम धर्मरूप कर्म के द्वारा अपने पूर्व पाप का यहाँ ही नाश कर देता है। इस प्रकार धर्म ही अत्यंत बलवान यहाँ ही नाश कर देता है। इस प्रकार धर्म ही अत्यंत बलवान है। इसलिये निष्काम भाव से धर्माचरण करने वालों को समयानुसार अवश्य सिद्धि प्राप्त होती है।
धृतराष्ट्र बोले ;- विद्वन! पुण्य कर्म करने वाले द्विजातियों को अपने-अपने धर्म के फलस्वरूप जिन सनातन लोकों की प्राप्ति बतायी गयी है, उनका क्रम बतालाइये तथा उनसे भिन्न जो अन्याय लोक है, उनका भी निरूपण कीजिये। अब मैं सकाम कर्म की बात नहीं जानना चाहता।
सनत्सुजात ने कहा ;- जैसे दो बलवान वीरों में अपना बल बढ़ाने के निमित्त एक दूसरे से स्पर्धा रहती है, उसी प्रकार जो निष्कामभाव से यम-नियमादि के पालन में दूसरों से बढ़ने का प्रयास करते हैं, वे ब्राह्मण यहाँ से मरकर जाने के बाद ब्रह्मलोक में अपना प्रकाश फैलाते हैं। जिनकी धर्म के पालन में स्पर्धा है, उनके लिये वह ज्ञान का साधन है; किंतु वे ब्राह्मण तो मृत्यु के पश्चात यहाँ से देवताओं के निवास स्थान स्वर्ग में जाते हैं। ब्राह्मण के सम्यक आचार की वेदवेत्ता पुरुष प्रशंसा करते हैं,किंतु जो धर्म पालन में बहिर्मुख है, उसे अधिक महत्त्व नहीं देना चाहिये। जो निष्कामभावपूर्वक धर्म का पालन करने से अन्तर्मुख हो गया है, ऐसे पुरुष को श्रेष्ठ समझना चाहिये। जैसे वर्षा ऋतु में तृण-घास आदि की बहुतायत होती है, उसी प्रकार जहाँ ब्राह्मण के योग्य अन्न-पान आदि की अधिकता मालूम पड़े, उसी देश में रहकर वह जीवन निर्वाह करे। भूख-प्यास से अपने को कष्ट नहीं पहुँचावे।
किंतु जहाँ अपना माहात्म्य प्रकाशित न करने पर भय और अमंगल प्राप्त हो, वहाँ रहकर भी जो अपनी विशेषता प्रकट नहीं करता, वही श्रेष्ठ पुरुष है; दूसरा नहीं। जो किसी को आत्मप्रशंसा करते देख जलता नहीं तथा ब्राह्मण के स्वत्व का उपभोग नहीं करता, उसके अन्न को स्वीकार करने में सत्पुरुषों की सम्मति है।
जैसे कुत्ता अपना वमन किया हुआ भी खा लेता है, उसी प्रकार जो अपने ब्राह्मणत्व के प्रभाव का प्रदर्शन करके जीविका चलाते हैं, वे ब्राह्मण वमन का भोजन करने वाले हैं और इससे उनकी सदा ही अवनति होती है।
जो कुटुम्बीजनों के बीच में रहकर भी अपनी साधना को उनसे सदा गुप्त रखने का प्रयत्न करता है, ऐसे ब्राह्मणों को ही विद्वान पुरुष ब्राह्मण मानते हैं।
(सम्पूर्ण महाभारत (उद्योग पर्व) द्विचत्वारिंश अध्याय के श्लोक 35-46 का हिन्दी अनुवाद)
इस प्रकार जो भेदशून्य, चिह्नरहित, अविचल, शुद्ध एवं सब प्रकार के द्वैत से रहित आत्मा है, उसके स्वरूप को जानने वाला कौन ब्रह्मवेत्ता पुरुष उसका हनन करना चाहेगा? इसलिये उपर्युक्त रूप से जीवन बिताने वाला क्षत्रिय भी ब्रह्म के स्वरूप का अनुभव करता है तथा ब्रह्म को प्राप्त होता है।
जो उक्त प्रकार से वर्तमान आत्मा को उसके विपरीत रूप से समझता है, आत्मा का अपहरण करने वाले उस चोर ने कौन-सा पाप नहीं किया? जो कर्तव्य-पालन में कभी थकता नहीं, दान नहीं लेता, सत्पुरुषों में सम्मानित और उपद्रवरहित है तथा शिष्ट होकर भी शिष्टता का विज्ञापन नहीं करता, वही ब्राह्मण ब्रह्मवेत्ता एवं विद्वान है। जो लौकिक धन की दृष्टि से निर्धन होकर भी दैवी सम्पत्ति तथा यज्ञ-उपासना आदि से सम्पन्न हैं, वे दुर्धर्ष हैं और किसी भी विषय से चलायमान नहीं होते। उन्हें ब्रह्म की साक्षात मूर्ति समझना चाहिये।
यदि कोई इस लोक में अभीष्ट सिद्ध करने वाले सम्पूर्ण देवताओं को जान ले, तो भी वह ब्रह्मवेत्ता के समान नहीं होता; क्योंकि वह तो अभीष्ट फल की सिद्धि के लिये ही प्रयत्न कर रहा है।
जो दूसरों से सम्मान पाकर भी अभिमान न करे और सम्माननीय पुरुष को देखकर जले नहीं तथा प्रयत्न न करने पर भी विद्वान लोग जिसे आदर दें, वही वास्तव में सम्मानित है। जगत में जब विद्वान पुरुष आदर दें, तब सम्मानित व्यक्ति को ऐसा मानना चाहिये कि आँखों को खोलने-मीचने के समान अच्छे लोगों की यह स्वाभाविक वृत्ति है, जो आदर देते हैं। किंतु इस संसार में जो अधर्म में निपुण, छल-कपट में चतुर और माननीय पुरुषों का अपमान करने वाले मूढ़ मनुष्य हैं, वे आदरणीय व्यक्तियों का भी आदर नहीं करते।
यह निश्चित है कि मान और मौन सदा एक साथ नहीं रहते; क्योंकि मान से इस लोक में सुख मिलता है और मौन से परलोक में। ज्ञानी जन इस बात को जानते हैं। राजन! लोक में ऐश्वर्यरूपा लक्ष्मी सुख का घर मानी गयी है, पर वह भी कल्याण मार्ग में लुटेरों की भाँति विघ्न डालने वाली है; किंतु ब्रह्मज्ञानमयी लक्ष्मी प्रज्ञाहीन मनुष्य के लिये सर्वथा दुर्लभ है।
संत पुरुष यहाँ उस ब्रह्मज्ञानमयी लक्ष्मी की प्राप्ति के अनेकों द्वार बतलाते हैं, जो कि मोह को जगाने वाले नहीं हैं तथा जिनको कठिनता से धारण किया जाता है। उनके नाम हैं- सत्य, सरलता, लज्जा, दम, शौच और विद्या।
(इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्व के अन्तर्गतसनत्सुजातपर्व में बयालीसवां अध्याय पूरा हुआ)
सम्पूर्ण महाभारत
उद्योग पर्व (सनत्सुजात पर्व)
तिरयालिसवाँ अध्याय
(सम्पूर्ण महाभारत (उद्योग पर्व) त्रिचत्वारिंश अध्याय के श्लोक 1-12 का हिन्दी अनुवाद)
“ब्रह्मज्ञान में उपयोगी मौन, तप, त्याग, अप्रमाद एवं दम आदिके लक्षण तथा मदादि दोषांका निरूपण”
धृतराष्ट्र बोले ;- विद्वन! यह मौन किसका नाम है? इन दोनों में से कौन-सा मौन है? यहाँ मौन भाव का वर्णन कीजिये। क्या विद्वान पुरुष मौन के द्वारा मोनरूप परमात्मा को प्राप्त होता है? मुने! संसार में लोग मौन का आचरण किस प्रकार करते हैं?
सनत्सुजात ने कहा ;- राजन! जहाँ मन के सहित वाणीरूप वेद नहीं पहुँच पाते; उस परमात्मा का ही नाम मौन है; इसलिये वही मौनस्वरूप है। वैदिक तथा लौकिक शब्दों का जहाँ से प्रादुर्भाव हुआ है, वे परमेश्रवर तन्मयतापूर्वक ध्यान करने से प्रकाश में आते हैं।
धृतराष्ट्र बोले ;- विद्वन! जो ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद को जानता है तथा पाप करता है, वह उस पाप से लिप्त होता है या नहीं?
सनत्सुजात ने कहा ;- राजन! मैं तुमसे असत्य नहीं कहता, ॠक, साम अथवा यजुर्वेद कोई भी पाप करने वाले अज्ञानी की उसके पाप कर्म से रक्षा नहीं करते। जो कपटपूर्वक धर्म का आचरण करता है, उस मिथ्याचारी का वेद पापों से उद्धार नहीं करते। जैसे पंख निकल आने पर पक्षी अपना घोंसला छोड़ देते हैं, उसी प्रकार अंत काल में वेद भी उसका परित्याग कर देते हैं।
धृतराष्ट्र बोले ;- विद्वन! यदि धर्म के बिना वेद रक्षा करने में समर्थ नहीं हैं, तो वेदवेत्ता ब्राह्मणों के पवित्र होने का प्रलाप चिरकाल से क्यों चला आता है?
सनत्सुजात ने कहा ;- महानुभाव! परब्रह्म परमात्मा के ही नाम आदि विशेष रूपों से इस जगत की प्रतीत होती है। यह बात वेद अच्छी तरह निर्देश करके कहते हैं। किंतु वास्तव में उसका स्वरूप इस विश्वसे विलक्षण बताया जाता है। उसी की प्राप्ति के लिये वेद में तप और यज्ञों का प्रतिपादन किया गया है। इन तप और यज्ञों के द्वारा उस श्रोत्रिय विद्वान पुरुष को पुण्य की प्राप्ति होती है। फिर उस निष्काम कर्मरूप पुण्य से पाप को नष्ट कर देने के पश्चात उसका अंतकरण ज्ञान से प्रकाशित हो जाता है।
तब वह विद्वान पुरुष ज्ञान से परमात्मा को प्राप्त होता है; किंतु इसके विपरीत जो भोगाभिलाषी पुरुष धर्म, अर्थ और कामरूप त्रिवर्गफल की इच्छा रखते हैं, वे इस लोक में किये हुए सभी कर्मों को साथ ले जाकर उन्हें परलोक में भोगते हैं तथा भोग समाप्त होने पर पुन: इस संसार मार्ग में लौट आते हैं। इस लोक में जो तपस्या की जाती है, उसका फल परलोक में भोगा जाता है; परंतु जो ब्रह्मोपासक इस लोक में निष्कामभाव से गुरुतर तपस्या करते हैं, वे इसी लोक में तत्त्व ज्ञानरूप फल प्राप्त करते हैं और मुक्त हो जाते हैं। इस प्रकार एक ही तपस्या ऋद्ध और समृद्ध के भेद से दो प्रकार की है।
धृतराष्ट्र ने पूछा ;- सनत्सुजातजी! विशुद्ध भावयुक्त केवल तप ऐसा प्रभावशाली बढ़ा-चढ़ा कैसे हो जाता है? यह इस प्रकार कहिये, जिससे हम उसे समझ लें।
सनत्सुजात ने कहा ;- राजन! यह तप सब प्रकार से निर्दोष होता है। इसमें भोग वासनारूप दोष नहीं रहता। इसलिये यह विशुद्ध कहा जाता है और इसीलिये यह विशुद्ध तप सकाम तप की अपेक्षा फल की दृष्टि से भी बहुत बढ़ा-चढ़ा होता है।
(सम्पूर्ण महाभारत (उद्योग पर्व) त्रिचत्वारिंश अध्याय के श्लोक 13-29 का हिन्दी अनुवाद)
राजन! तुम जिस तपस्या के विषय में मुझसे पूछ रहे हो, यह तपस्या ही सारे जगत का मूल है; वेदवेत्ता विद्वान इस निष्काम तप से ही परम अमृत मोक्ष को प्राप्त होते हैं।
धृतराष्ट्र बोले ;- सनत्सुजातजी मैंने दोष रहित तपस्या का महत्व सुना। अब तपस्या के जो दोष हैं, उन्हें बताइये, जिससे मैं इस सनातन गोपनीय ब्रह्मतत्त्व को जान सकूं।
सनत्सुजात ने कहा ;- राजन! तपस्या के क्रोध आदि बारह दोष हैं तथा तेरह प्रकार के नृशंस मनुष्य होते हैं। मन्वादि शास्त्रों में कथित ब्राह्मणों के धर्म आदि बारह गुण प्रसिद्ध हैं। काम, क्रोध, लोभ, मोह, चिकीर्षा, निर्दयता, असूया, अभिमान, शोक, स्पृहा, ईर्ष्या और निंदा-मनुष्यों में रहने वाले ये बारह दोष मनुष्यों के लिये सदा ही त्याग देने योग्य हैं।
नरश्रेष्ठ! जैसे व्याघा मृगों को मारने का छिद्र देखता हुआ उनकी टोह में लगा रहता है, उसी प्रकार इनमें से एक-एक दोष मनुष्यों का छिद्र देखकर उन पर आक्रमण करता है।
अपनी बहुत बड़ाई करने वाले, लोलुप, तनिक से भी अपमान को सहन न करने वाले, निरंतर क्रोधी,चंचल और आश्रितों की रक्षा नहीं करने वाले- ये छ: प्रकार के मनुष्य पापी हैं। महान संकट में पड़ने पर भी ये निडर होकर इन पाप-कर्मों का आचरण करते हैं।
सम्भोग में ही मन लगाने वाले, विषमता रखने वाले, अत्यंत मानी, दान देकर पश्चाताप करने वाले, अत्यंत कृपण, अर्थ और काम की प्रशंसा करने वाले तथा स्त्रियों के द्वेषी- ये सात और पहले के छ: कुल तेरह प्रकार के मनुष्य नृशंसवर्ग कहे गये हैं।
धर्म, सत्य, इन्द्रियनिग्रह तप, मत्सरता का अभाव, लज्जा, सहनशीलता, किसी के दोष न देखना, यज्ञ करना, दान देना, धैर्य और शास्त्रज्ञान- ये ब्राह्मण के बारह व्रत हैं।
जो इन बारह व्रतों पर अपना प्रभुत्व रखता है, वह इस सम्पूर्ण पृथ्वी के मनुष्यों को अपने अधीन कर सकता है। इनमें से तीन, दो या एक गुण से भी जो युक्त हो, उसके पास सभी प्रकार का धन है, ऐसा समझना चाहिये।
दम, त्याग और अप्रमाद -इन तीन गुणों में अमृत का वास है। जो मनीषी बुद्धिमान ब्राह्मण हैं, वे कहते हैं कि इन गुणों का मुख सत्यस्वरूप परमात्मा की ओर है।
दम अठारह गुणों वाला है। निम्नांकित अठारह दोषों के त्याग को ही अठारह गुण समझना चाहिये- कर्तव्य-अकर्तव्य के विषय में विपरीत धारणा, असत्य भाषण, गुणों में दोषदृष्टि, स्त्री-विषयक-कामना, सदा धनोपार्जन में ही लगे रहना, भोगेच्छा, क्रोध, शोक, तृष्णा, लोभ, चुगली करने की आदत, डाह, हिंसा, संताप, शास्त्र में अरति, कर्तव्य की विस्मृत, अधिक बकवाद और अपने को बड़ा समझना- इन दोषों से जो मुक्त है, उसी को सत्पुरुष दांत कहते हैं।
मद में अठारह दोष हैं; ऊपर जो दम के विपर्यय सूचित किये गये हैं, वे ही मद के दोष बताये गये हैं। त्याग छ: प्रकार का होता है, वह छहों प्रकार का त्याग अत्यंत उत्तम है; किंतु इनमें तीसरा अर्थात कामत्याग बहुत ही कठिन है, इसके द्वारा मनुष्य त्रिविध दु:खों को निश्चय ही पार कर जाता है। काम का त्याग कर देने पर सब कुछ जीत लिया जाता है।
राजेन्द्र! छ: प्रकार का जो सर्वश्रेष्ठ त्याग है, उसे बताते हैं। लक्ष्मी को पाकर हर्षित न होना- यह प्रथम त्याग है; यज्ञ-होमादि में तथा कुएं, तालाब और बगीचे आदि बनाने में धन खर्च करना- दूसरा त्याग है और सदा वैराग्य से युक्त रहकर काम का त्याग करना- यह तीसरा त्याग कहा गया है। महर्षि लोग इसे अनिर्वचनीय मोक्ष का उपाय कहते हैं। अत: यह तीसरा त्याग विशेष गुण माना गया है।
(सम्पूर्ण महाभारत (उद्योग पर्व) त्रिचत्वारिंश अध्याय के श्लोक 30-45 का हिन्दी अनुवाद)
वैराग्यपूर्वक पदार्थों के त्याग से जो निष्कामता आती है, वह स्वेच्छापूर्वक उनका उपभोग करने से नहीं आती। अधिक धन-सम्पति के संग्रह से निष्कामता नहीं सिद्ध होती तथा कामनापूर्वक के लिये उसका उपभोग करने से भी काम का त्याग नहीं होता। जो पुरुष सब गुणों से युक्त और धनवान हों, यदि उसके किये हुए कर्म सिद्ध न हों तो उनके लिये दु:ख एवं ग्लानि न करें।
कोई अप्रिय घटना हो जाय तो कभी व्यथा को न प्राप्त हो यह चोथा त्याग है। अपने अभीष्ठ पदार्थ स्त्री व पुत्रादि की कभी याचना न करे यह पाँचवां त्याग है। सुयोग्य याचक के आ जाने पर उसे दान करे यह छठा त्याग है। इन सबसे कल्याण होता है। इन त्यागमय गुणों से मनुष्य अप्रमादी होता है। उस अप्रमाद के भी आठ गुण माने गये हैं- सत्य, ध्यान, अध्यात्मविषयक विचार, समाधान, वैराग्य, चौरी न करना, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह।
ये आठ गुण त्याग और अप्रमाद दोनों के ही समझने चाहिये। इसी प्रकार जो मद के अठारह दोष पहले बताये गये हैं, उनका सर्वथा त्याग करना चाहिये। प्रमाद के आठ दोष हैं, उन्हें भी त्याग देना चाहिये।
भारत! पांच इन्द्रियां और छठा मन- इनकी अपने-अपने विषयों में जो भोगबुद्धि से प्रवृत्ति होती हैं, छ: तो ये ही प्रमाद विषयक दोष हैं और भूतकाल की चिन्ता तथा भविष्य की आशा- दो दोष ये हैं। इन आठ दोषों से मुक्त पुरुष सुखी होता है।
राजेन्द्र! तुम सत्यस्वरूप हो जाओ, सत्य में ही सम्पूर्ण लोक प्रतिष्ठित हैं। वे दम, त्याग और अप्रमाद आदि गुण भी सत्यस्वरूप परमात्मा की प्राप्ति कराने वाले हैं; सत्य में ही अमृत की प्रतिष्ठा है।
दोषों को निवृत्त करके ही यहाँ तप और व्रत का आचरण करना चाहिये, यह विधाता का बनाया हुआ नियम है। सत्य ही श्रेष्ठ पुरुषों का व्रत है। मनुष्य को उपर्युक्त दोषों से रहित और गुणों से युक्त होना चाहिये। ऐसे पुरुष का ही विशुद्ध तप अत्यन्त समृद्ध होता है। राजन! तुमने जो मुझसे पूछा है, वह मैंने संक्षेप से बता दिया। यह तप जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्था के कष्ट को दूर करने वाला, पापहारी तथा परम पवित्र है।
धृतराष्ट्र ने कहा ;- मुने! इतिहास पुराण जिनमें पाँचवां है, उन सम्पूर्ण वेदों के द्वारा कुछ लोगों का विशेष रूप से नाम लिया जाता है अर्थात वे पंचवेदी कहलाते हैं, दूसरे लोग चतुर्वेदी और त्रिवेदी कहे जाते हैं।
इसी प्रकार कुछ लोग द्विवेदी, एकवेदी तथा अनृच कहलाते हैं। इनमें से कौन-से ऐसे हैं, जिन्हें मैं निश्चित रूप से ब्राह्मण समझूं?
सनत्सुजात ने कहा ;- राजन! सृष्टि के आदि में वेद एक ही थे, परंतु न समझने के कारण बहुत-से विभाग कर दिये गये हैं। उस सत्यस्वरूप एक वेद के सारतत्त्व परमात्मा में तो कोई बिरला ही स्थित होता है। इस प्रकार वेद के तत्त्व को न जानकर भी कुछ लोग ‘मैं विद्वान हूँ’ ऐसा मानने लगते हैं; फिर उनकी दान, अध्ययन और यज्ञादि कर्मों में लोभ से प्रवृत्ति होती है। वास्तव में जो सत्यस्वरूप परमात्मा से च्युत हो गये हैं, उन्हीं का वैसा संकल्प होता है। फिर सत्यरूप वेद के प्रामाण्य का निश्चय करके ही उनके द्वारा यज्ञों का विस्तार किया जाता है।
(सम्पूर्ण महाभारत (उद्योग पर्व) त्रिचत्वारिंश अध्याय के श्लोक 46-55 का हिन्दी अनुवाद)
किसी का यज्ञ मन से, किसी का वाणी से तथा किसी का क्रिया के द्वारा सम्पादित होता है। सत्यसंकल्प पुरुष संकल्प के अनुसार ही लोकों को प्राप्त होता है। किंतु जब तक संकल्प सिद्ध न हो, तब तक दीक्षित व्रत का आचरण अर्थात यज्ञादि कर्म करते रहना चाहिये। यह दीक्षित नाम ‘दीक्ष व्रतादेशे’ इस धातु से बना है। सत्पुरुषों के सत्यस्वरूप परमात्मा ही सबसे बढ़कर हैं। क्योंकि परमात्मा के ज्ञान का फल प्रत्यक्ष है और तप का फल परोक्ष है इसलिये ज्ञान का ही आश्रय लेना चाहिये। बहुत पढ़ने वाले ब्राह्मण को केवल बहुपाठी समझना चाहिये।
इसलिये महाराज! केवल बातें बनाने से ही किसी को ब्राह्मण न मान लेना। जो सत्यस्वरूप परमात्मा से कभी पृथक नहीं होता, उसी को तुम ब्राह्मण समझो। राजन! अथर्वा मुनि एवं महर्षिसमुदाय ने पूर्वकाल में जिनका गान किया है, वे ही छन्द हैं। किंतु सम्पूर्ण वेद पढ़ लेने पर भी जो वेदों के द्वारा जानने योग्य परमात्मा के तत्त्व को नहीं जानते, वे वास्तव में वेद के विद्वान नहीं हैं।
नरश्रेष्ठ! छन्द (वेद) उस परमात्मा में स्वच्छन्द सम्बन्ध से स्थित स्वत:प्रमाण हैं। इसलिये उनका अध्ययन करके ही वेदवेत्ता आर्यजन वेद्यरूप परमात्मा के तत्त्व को प्राप्त हुए हैं।
राजन! वास्तव में वेद के तत्त्व को जानने वाला कोई नहीं है अथवा यों समझो कि कोई बिरला ही उनका रहस्य जान पाता है। जो केवल वेद के वाक्यों को जानता है, वह वेदों के द्वारा जानने योग्य परमात्मा को नहीं जानता; किंतु जो सत्य में स्थित है, वह वेदवेद्य परमात्मा को जानता है।
जानने वालों में से कोई भी वेदों को अर्थात उनके रहस्य को जानने वाला नहीं है; क्योंकि जानने में आने वाले मन-बुद्धि आदि के द्वारा न तो कोई वेद के रहस्य को जान पाता है और न जानने योग्य परमात्मतत्त्व को ही। जो मनुष्य केवल कर्म विधायक वेद को जानता है; वह तो बुद्धि द्वारा जानने में आने वाले पदार्थों को ही जानता है; किंतु जो बुद्धि द्वारा जानने योग्य पदार्थों को जानता है, वह सकामी पुरुष वास्तविक तत्त्व परब्रह्म परमात्मा को नहीं जानता।
जो महापुरुष वेदों के रहस्य को जानता है, वह अपने योग्य परमात्मा को भी जानता है; परंतु उस जानने वाले को न तो वेदों के शब्दों को जानने वाला जानता है और न वेद ही जानते हैं। तथापि वेद के रहस्य को जानने वाले जो ब्रह्मवेत्ता महापुरुष है, वे उस वेद के द्वारा ही वेद के रहस्य को जान लेते हैं अर्थात वेदों का कथन इतना गुप्त है कि केवल शब्द ज्ञान से उसका रहस्य एवं उसमें वर्णित परमात्मा तत्त्व समझ में नही आता। अन्त:करण शुद्ध होने पर सद्गुरु या प्रभु की कृपा से ही साधक उसे समझ पाता है।
द्वितीया के चन्द्रमा की सूक्ष्म कला को बताने के लिये जैसे वृक्ष की शाखा की ओर संकेत किया जाता है, उसी प्रकार उस सत्य स्वरूप परमात्मा का ज्ञान कराने के लिये ही वेदों का भी उपयोग किया जाता है; ऐसा विद्वान पुरुष मानते हैं।
(सम्पूर्ण महाभारत (उद्योग पर्व) त्रिचत्वारिंश अध्याय के श्लोक 55-63 का हिन्दी अनुवाद)
मैं तो उसी को ब्राह्मण समझता हूँ, जो परमात्मा के तत्त्व को जानने वाला और वेदों की यथार्थ व्याख्या करने वाला हो, जिसके अपने संदेह मिट गये हों और जो दूसरों के भी सम्पूर्ण संशयों को मिटा सके।
इस आत्मा की खोज करने के लिये पूर्व,पश्चिम, उत्तर या दक्षिण की ओर जाने की आवश्यकता नहीं हैं; फिर आग्नेय आदि कोणों की तो बात ही क्या है? इसी प्रकार दिग्विभाग से रहित प्रदेश में भी उसे नहीं ढूँढ़ना चाहिये। आत्मा का अनुसंधान अनात्मपदार्थों में तो किसी तरह करे ही नहीं, वेद के वाक्यों में भी न ढ़ूढ़कर केवल तप के द्वारा उस प्रभु का साक्षात्कार करे। वागादि इन्द्रियों की सब प्रकार की चेष्टा से रहित होकर परमात्मा की उपासना करे, मन से भी कोई चेष्टा न करे। राजन! तुम भी अपने हृदयाकाश में स्थित उस विख्यात परमेश्र्वर की बुद्धिपूर्वक उपासना करो। मौन रहने अथवा जंगल में निवास करने मात्र से कोई मुनि नहीं होता। जो अपने आत्मा के स्वरूप को जानता है, वही श्रेष्ठ मुनि कहलाता है।
सम्पूर्ण अर्थों को व्याकृत करने के कारण ज्ञानी पुरुष ‘वैयाकरण’ कहलाता है। यह समस्त अर्थों का प्रकटीकरण मूलभूत ब्रह्म से ही होता है, अत: वही मुख्य वैयाकरण है; विद्वान पुरुष भी इसी प्रकार अर्थों को व्याकृत करता है, इसलिये वह भी वैयाकरण है।
जो योगी सम्पूर्ण लोकों को प्रत्यक्ष देख लेता है, वह मनुष्य उन सब लोकों का द्रष्टा कहलाता है; परंतु जो एकमात्र सत्यस्वरूप ब्रह्म में ही स्थित है, वही ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण सर्वज्ञ होता है।
राजन! पूर्वोक्त धर्म आदि में स्थित होने से तथा वेदों का क्रम से अध्ययन करने से भी मनुष्य इसी प्रकार परमात्मा का साक्षात्कार करता है। यह बात अपनी बुद्धि द्वारा निश्चय करके मैं तुम्हें बता रहा हूँ।
(इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्व के अन्तर्गत सनत्सुजातपर्व में सनत्सुजातवाक्यविषयक तैंतालीसवां अध्याय पूरा हुआ)
सम्पूर्ण महाभारत
उद्योग पर्व (सनत्सुजात पर्व)
चवालीसवाँ अध्याय
(सम्पूर्ण महाभारत (उद्योग पर्व) चतुश्चत्वारिंश अध्याय के श्लोक 1-12 का हिन्दी अनुवाद)
“ब्रह्मचर्य तथा ब्रह्म का निरूपण”
धृतराष्ट्र ने कहा ;- सनत्सुजातजी! आप जिस सर्वोत्तम और सर्वरूपा ब्रह्म सम्बन्धिनी विद्या का उपदेश कर रहे हैं, कामी पुरुषों के लिये वह अत्यन्त दुर्लभ है। कुमार! मेरा तो यह कहना है कि आप इस उत्कृष्ट विषय का पुन: प्रतिपादन करें।
सनत्सुजात ने कहा ;- राजन! तुम जो मुझसे बारंबार प्रश्न करते समय अत्यन्त हर्षित हो उठते हो, सो इस प्रकार जल्दबाजी करने से ब्रह्म की उपलब्धि नहीं होती। बुद्धि में मन के लय हो जाने पर सब वृत्तियों का विरोध करने वाली जो स्थिति है, उसका नाम है ब्रह्मविद्या और वह ब्रह्मचर्य का पालन करने से ही उपलब्ध होती है।
धृतराष्ट्र ने कहा ;- जो कर्मों द्वारा आरम्भ होने योग्य नहीं है तथा कार्य के समय में भी जो इस आत्मा में ही रहती है, उस अनन्त ब्रह्म से सम्बन्ध रखने वाली इस सनातन विद्या को यदि आप ब्रह्मचर्य से ही प्राप्त होने योग्य बता रहे हैं तो मुझ जैसे लोग ब्रह्म सम्बन्धी अमृतत्त्व को कैसे पा सकते हैं?
सनत्सुजातजी बोले ;- अब मैं अव्यक्त ब्रह्म से सम्बन्ध रखने वाली उस पुरातन विद्या का वर्णन करूंगा, जो मनुष्यों को बुद्धि और ब्रह्मचर्य के द्वारा प्राप्त होती है, जिसे पाकर विद्वान पुरुष इस मरणधर्मा शरीर को सदा के लिये त्याग देते हैं तथा जो वृद्ध गुरुजनों में नित्य विद्यमान रहती है।
धृतराष्ट्र ने कहा ;- ब्रह्मन! यदि वह ब्रह्मविद्या ब्रह्मचर्य के द्वारा ही सुगमता से जानी जा सकती है तो पहले मुझे यही बताइये कि ब्रह्मचर्य का पालन कैसे होता है?
सनत्सुजातजी बोले ;- जो लोग आचार्य के आश्रम में प्रवेश कर अपनी सेवा से उनके अन्तरंग भक्त हो ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, वे यहाँ शास्त्राकार हो जाते हैं और देह-त्याग के पश्चात परम योगरूप परमात्मा को प्राप्त होते हैं। इस जगत में जो लोग वर्तमान स्थिति में रहते हुए ही सम्पूर्ण कामनाओं को जीत लेते हैं और ब्राह्मी स्थिति प्राप्त करने के लिये ही नाना प्रकार के द्वन्द्वों को सहन करते हैं, वे सत्त्वगुण में स्थित हो यहाँ ही मूंज से सींक की भाँति इस देह से आत्मा को (विवेक द्वारा) पृथक कर लेते हैं।
भारत! यद्यपि माता और पिता- ये ही दोनों इस शरीर को जन्म देते हैं, तथापि आचार्य के उपदेश से जो जन्म प्राप्त होता है, वह परम पवित्र और अजर-अमर है। जो परमार्थ तत्त्व के उपदेश से सत्य को प्रकट करके अमरत्व प्रदान करते हुए ब्राह्मणादि वर्णों की रक्षा करते हैं, उन आचार्य को पिता-माता ही समझना चाहिये तथा उनके किये हुए उपकार का स्मरण करके कभी उनसे द्रोह नहीं करना चाहिये।
ब्रह्मचारी शिष्य को चाहिये कि वह नित्य गुरु को प्रणाम करे, बाहर-भीतर से पवित्र हो प्रमाद छोड़कर स्वाध्याय में मन लगावे, अभिमान न करे, मन में क्रोध को स्थान न दे। यह ब्रह्मचर्य का पहला चरण है।
जो शिष्य की वृत्ति के क्रम से ही जीवन-निर्वाह करता हुआ पवित्र हो विद्या प्राप्त करता है, उसका यह नियम भी ब्रह्मचर्य व्रत का पहला ही पाद कहलाता है। अपने प्राण और धन लगाकर भी मन, वाणी तथा कर्म से आचार्य का प्रिय करे, यह दूसरा पाद कहलाता है।
(सम्पूर्ण महाभारत (उद्योग पर्व) चतुश्चत्वारिंश अध्याय के श्लोक 13-24 का हिन्दी अनुवाद)
गुरु के प्रति शिष्य का जैसा श्रद्धा और सम्मानपूर्ण बर्ताव हो, वैसा ही गुरु की पत्नी और पुत्र के साथ भी होना चाहिये। यह भी ब्रह्मचर्य का द्वितीय पाद ही कहलाता है। आचार्य ने जो अपना उपकार किया, उसे ध्यान में रखकर तथा उससे जो प्रयोजन सिद्ध हुआ, उसका भी विचार करके मन-ही-मन प्रसन्न होकर शिष्य आचार्य के प्रति जो ऐसा भाव रखता है कि इन्होंने मुझे बड़ी उन्नत अवस्था में पहुँचा दिया- यह ब्रह्मचर्य का तीसरा पाद है।
आचार्य के उपकार का बदला चुकाये बिना अर्थात गुरुदक्षिणा आदि के द्वारा उन्हें संतुष्ट किये बिना विद्वान शिष्य वहाँ से अन्यत्र न जाय। दक्षिणा देकर या गुरु की सेवा करके कभी मन में ऐसा विचार न लावे कि मैं गुरु का उपकार कर रहा हूँ तथा मुँह से भी कभी ऐसी बात न निकाले। यह ब्रह्मचर्य का चौथा पाद है।
सनातनी विद्या के कुछ अंश को तथा उसके मर्म को तो मनुष्य समय के योग से प्राप्त करता है, कुछ अंश को गुरु के सम्बन्ध से तथा कुछ अंश को अपने उत्साह के सम्बन्ध से और कुछ अंश को परस्पर शास्त्र के विचार से प्राप्त करता है।
पूर्वोक्त धर्मादि बारह गुण जिसके स्परूप है तथा और भी जो धर्म के अंग एवं सामर्थ्य हैं, वे भी जिसके स्वरूप हैं, वह ब्रह्मचर्य आचार्य के सम्बन्ध से प्राप्त वेदार्थ के ज्ञान से सफल होता है, ऐसा कहा जाता है।
इस तरह ब्रह्मचर्य पालन में प्रवृत्त हुए ब्रह्मचारी को चाहिये कि जो कुछ भी धन भिक्षा में प्राप्त हो, उसे आचार्य को अर्पण कर दे। ऐसा करने से वह शिष्य सत्पुरुषों के अनेक गुणों से युक्त आचार-को प्राप्त होता है। गुरु पुत्र के प्रति भी उसकी यही भावना रहनी चाहिये। ऐसी वृत्ति से गुरु गृह में रहने वाले शिष्य की इस संसार में सब प्रकार से उन्नति होती है। वह गृहस्थाश्रम में प्रवेश करके बहुत से पुत्र और प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। सम्पूर्ण दिशा-विदिशाएं उसके लिये सुख की वर्षा करती हैं तथा उसके निकट बहुत-से दूसरे लोग ब्रह्मचर्य पालन के लिये निवास करते हैं।
इस ब्रह्मचर्य के पालन से ही देवताओं ने देवत्व प्राप्त किया और महान सौभाग्यशाली मनीषी ऋषियों ने ब्रह्मलोक को प्राप्त किया। इसी के प्रभाव से गन्धर्वों और अप्सराओं को दिव्य रूप प्राप्त हुआ। इस ब्रह्मचर्य के ही प्रताप से सूर्यदेव समस्त लोकों को प्रकाशित करने में समर्थ होते हैं।
रस भेदरूप चिन्तामणि से याचना करने वालों को जैसे उनके अभीष्ट अर्थ की प्राप्ति होती है, उसी प्रकार ब्रह्मचर्य भी मनोवाञ्छित वस्तु प्रदान करने वाला है। ऐसा समझकर ये ऋषि-देवता आदि ब्रह्मचर्य के पालन से वैसे भाव को प्राप्त हुए।
राजन! जो इस ब्रह्मचर्य का आश्रय लेता है, वह ब्रह्मचारी यम-नियमादि तप का आचरण करता हुआ अपने सम्पूर्ण शरीर को भी पवित्र बना लेता है तथा इससे विद्वान पुरुष निश्चय ही अबोध बालक की भाँति राग-द्वेष से शून्य हो जाता है और अन्त समय में वह मृत्यु को भी जीत लेता है।
राजन! सकाम पुरुष अपने पुण्य कर्मों के द्वारा नाशवान लोकों को ही प्राप्त करते हैं; किंतु जो ब्रह्म को जानने वाला विद्वान है, वही उस ज्ञान के द्वारा सर्वरूप परमात्मा को प्राप्त होता है। मोक्ष के लिये ज्ञान के सिवा दूसरा कोई मार्ग नहीं है।
(सम्पूर्ण महाभारत (उद्योग पर्व) चतुश्चत्वारिंश अध्याय के श्लोक 25-31 का हिन्दी अनुवाद)
धृतराष्ट्र बोले ;- विद्वान् पुरुष यहाँ सत्य स्वरूप परमात्मा के जिस अमृत एवं अविनाशी परमपद का साक्षात्कार करते हैं, उसका रूप कैसा है? क्या वह सफेद-सा, लाल-सा, काजल-सा, काला या सुवर्ण जैसे पीले रंग का प्रतीत होता है?
सनत्सुजात ने कहा ;- यद्यपि श्वेत, लाल, कालें, लोहे के सहश अथवा सूर्य के समान प्रकाशमान अनेकों प्रकार के रूप प्रतीत होते है, तथापि ब्रह्म का वास्तविक रूप न पृथ्वी में है, न आकाश में। समुद्र का जल भी उस रूप को नहीं धारण करता। इस ब्रह्म का वह रूप न तारों में है, न बिजली के आश्रित है और न बादलों में ही दिखायी देता है। इसी प्रकार वायु, देवगण, चन्द्रमा और सूर्य में भी वह नहीं देखा जाता। राजन्! ॠग्वेद की ॠचाओं में, यजुर्वेद के मन्त्रों में, अथर्ववेद के सूक्तों में तथा विशुद्ध सामवेद में भी वह नहीं दृष्टिगोचर होता। रथन्तर और बार्हद्रथ नामक साम में तथा महान् व्रत में भी उसका दर्शन नहीं होता; क्योंकि वह ब्रह्म नित्यहै। ब्रह्म के उस स्वरूप का कोई पार नहीं पा सकता। वह अज्ञान रूप अन्धकार से सर्वथा अतीत हैं।
महाप्रलय में सबका अन्त करने वाला काल भी उसी में लीन हो जाता है। वह रूप अस्तुरे की धार के समान अत्यन्त सूक्ष्म और पर्वतों से भी महान् है (अर्थात् वह सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर और महान-से भी महान् है) वही सबका आधार है, वही अमृत है, वही लोक, वही यश तथा वही ब्रह्म है। सम्पूर्ण भूत उसी से प्रकट हुए और उसी में लीन होते हैं। विद्वान् कहते है, कार्यरूप जगत् वाणी का विकार-मात्र है; किंतु जिसमें यह सम्पूर्ण जगत् प्रतिष्ठित है, वह ब्रह्म रोग, शोक और पाप से रहित है और उसका महान् यश सर्वत्र फैला हुआ है। उन नित्य कारणस्वरूप ब्रह्म को जो जानते हैं, वे अमर हो जाते हैं अर्थात् मुक्त हो जाते हैं।
(इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्व के अन्तर्गत सनत्सुजातपर्व में सनत्सुजातवाक्यविषयक चौवालीसवां अध्याय पूरा हुआ)
सम्पूर्ण महाभारत
उद्योग पर्व (सनत्सुजात पर्व)
पैतालीसवाँ अध्याय
(सम्पूर्ण महाभारत (उद्योग पर्व) पंचचत्वारिंश अध्याय के श्लोक 1-13 का हिन्दी अनुवाद)
“गुण-दोषों के लक्षणों का वर्णन और ब्रह्मविद्या का प्रतिपादन”
सनत्सुजातजी कहते हैं ;- राजन! शोक, क्रोध, लोभ, काम, मान, अत्यन्त निद्रा, ईर्ष्या, मोह, तृष्णा, कायरता, गुणों में दोष देखना और निन्दा करना- ये बारह महान दोष मनुष्यों के प्राणनाशक हैं। राजेन्द्र! क्रमश: एक के पीछे दूसरा आकर ये सभी दोष मनुष्यों को प्राप्त होते जाते हैं, जिनके वश में होकर मूढ़-बुद्धि मानव पाप कर्म करने लगता है।
लोलुप, क्रूर, कठोरभाषी, कृपण, मन-ही-मन क्रोध करने वाले और अधिक आत्मप्रशंसा करने वाले- ये छ: प्रकार के मनुष्य निश्चय ही क्रूर कर्म करने वाले होते हैं। ये प्राप्त हुई सम्पत्ति का उचित उपयोग नहीं करते।
सम्भोग में मन लगाने वाले, विषमता रखने वाले, अत्यन्त अभिमानी, दान देकर आत्मश्लाघा करने वाले, कृपण, असमर्थ होकर भी अपनी बहुत बड़ाई करने वाले और सम्मान्य पुरुषों से सदा द्वैष रखने वाले- ये सात प्रकार के मनुष्य ही पापी और क्रूर कहे गये हैं।
धर्म, सत्य, तप, इन्द्रियसंयम, डाह न करना, लज्जा, सहनशीलता, किसी के दोष न देखना, दान, शास्त्रज्ञान, धैर्य और क्षमा- ये ब्राह्मण के बारह महान व्रत हैं।
जो इन बारह व्रतों से कभी च्युत नहीं होता, वह इस सम्पूर्ण पृथ्वी पर शासन कर सकता है। इनमें से तीन, दो या एक गुण से भी जो युक्त है, उसका अपना कुछ भी नहीं होता- ऐसा समझना चाहिये अर्थात उसकी किसी भी वस्तु में ममता नहीं होती। इन्द्रियनिग्रह, त्याग और अप्रमाद- इनमें अमृत की स्थिति है। ब्रह्म ही जिनका प्रधान लक्ष्य है, उन बुद्धिमान ब्राह्मणों के ये ही मुख्य साधन हैं। सच्ची हो या झूठी, दूसरों की निन्दा करना ब्राह्मण को शोभा नहीं देता। जो लोग दूसरों की निन्दा करते हैं, वे अवश्य ही नरक में पड़ते हैं।
मद के अठारह दोष हैं, जो पहले सूचित करके भी स्पष्टरूप से नहीं बताये गये थे- लोक विरोधी कार्य करना, शास्त्र के प्रतिकुल आचरण करना, गुणियों पर दोषारोपण, असत्य भाषण। काम, क्रोध, पराधीनता, दूसरों के दोष बताना, चुगली करना, धन का दुरुपयोग से नाश, कलह, डाह, प्राणियों को कष्ट पहुँचाना।
ईर्ष्या, हर्ष, बहुत बकवाद, विवेकशून्यता तथा गुणों में दोष देखने का स्वभाव। इसलिये विद्वान पुरुष को मद के वशीभूत नहीं होना चाहिये; क्योंकि सत्पुरुषों ने इस मद को सदा ही निन्दित बताया है।
सोहार्द के छ: गुण हैं, जो अवश्य ही जानने योग्य हैं। सुहृद का प्रिय होने पर हर्षित होना और अप्रिय होने पर कष्ट का अनुभव करना- ये दो गुण हैं। तीसरा गुण यह है कि अपना जो कुछ चिरसंचित धन हैं, उसे मित्र के मांगने पर दे डाले। मित्र के लिये अयाच्य वस्तु भी अवश्य देने योग्य हो जाती है और तो क्या, सुहृद के मांगने पर वह शुद्ध भाव से अपने प्रिय पुत्र, वैभव तथा पत्नी को भी उसके हित के लिये निछावर कर देता है।
मित्र को धन देकर उसके यहाँ प्रत्युपकार पाने की कामना से निवासन करे- यह चौथा गुण है। अपने परिश्रम से उपार्जित धन का उपभोग करे - यह पाँचवां गुण है तथा मित्र की भलाई के लिये अपने भले की परवा न करे- यह छठा गुण है।
(सम्पूर्ण महाभारत (उद्योग पर्व) पंचचत्वारिंश अध्याय के श्लोक 14-21 का हिन्दी अनुवाद)
जो धनी गृहस्थ इस प्रकार गुणवान, त्यागी और सात्त्विक होता है, वह अपनी पाँचों इन्द्रियों से पाँचों विषयों को हटा देता है। जो वैराग्य की कमी के कारण सत्त्व से भ्रष्ट हो गये हैं, ऐसे मनुष्यों के दिव्य लोकों की प्राप्ति के संकल्प से संचित किया हुआ यह इन्द्रिय निग्रहरूप तप समुद्र होने पर भी केवल ऊर्ध्व लोकों की प्राप्ति का कारण होता है मुक्ति का नहीं।
क्योंकि सत्यस्वरूप ब्रह्म का बोध न होने से ही इन सकाम यज्ञों की वृद्धि होती है। किसी का यज्ञ मन से, किसी का वाणी से और किसी का क्रिया के द्वारा सम्पन्न होता है।
संकल्प सिद्ध अर्थात सकाम पुरुष से संकल्प रहित यानि निषकाम पुरुष की स्थिति ऊँची होती है; किंतु ब्रह्मवेत्ता की स्थिति उससे भी विशिष्ट है। इसके सिवा एक बात और बताता हूँ, सुनो। यह महत्त्वपूर्ण शास्त्र परम यशरूप परमात्मा की प्राप्ति कराने वाला है, इसे शिष्यों को अवश्य पढा़ना चाहिये। परमात्मा से भिन्न यह सारा दृश्य-प्रपंच वाणी का विकार मात्र है- ऐसा विद्वान लोग कहते हैं। इस योगशास्त्र में यह परमात्म विषयक सम्पूर्ण ज्ञान प्रतिष्ठित है; इसे जो जान लेते हैं, वे अमर हो जाते हैं अर्थात जन्म-मरण से मुक्त हो जाते हैं।
राजन! निष्काम भाव के बिना किये हुए केवल पुण्य कर्म के द्वारा सत्यस्वरूप ब्रह्म को नहीं जीता जा सकता। अथवा जो हवन या यज्ञ किया जाता है, उससे भी अज्ञानी पुरुष अमरत्व मुक्ति को नहीं पा सकता तथा अन्त-काल में उसे शान्ति भी नहीं मिलती।
इसलिये सब प्रकार की चेष्टा से रहित होकर एकान्त में उपासना करे, मन से भी कोई चेष्टा न होने दे तथा स्तुति में राग और निन्दा में द्वेष न करे। राजन! उपर्युक्त साधन करने से मनुष्य यहाँ ही ब्रह्म का साक्षात्कार करके उसमें विलीन हो जाता हैं। विद्वन! वेदों में क्रमश: विचार करके जो मैंने जाना है, वही तुम्हें बता रहा हूँ।
(इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्व के अन्तर्गत सनत्सुजातपर्व में सनत्सुजातवाक्यविषयक पैंतालीसवां अध्याय पूरा हुआ)
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