सम्पूर्ण विष्णु पुराण (प्रथम अंश) का पहला व दूसरा अध्याय

{{सम्पूर्ण विष्णु पुराण (प्रथम अंश) का पहला व दूसरा अध्याय}} (First and second chapters of the complete Vishnu Purana (first part))

                         "सम्पूर्ण विष्णु पुराण " 

                          ॐ श्री मन्नारायणाय नम:
                ''नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम ।
               देवी सरस्वती व्याप्तं ततो जयमुदिरयेत"।।

                               श्री विष्णुपुराण
                                 (प्रथम अंश)
                               "पहला अध्याय"

                      "ग्रन्थ का उपोदधात"
श्रीसूतजी बोले ;– मैत्रेयजी ने नित्यकर्मों से निवृत्त हुए मुनिवर पराशरजी को प्रणाम कर एवं उनके चरण छूकर पूछा ।
 ‘हे गुरुदेव ! मै आपही से सम्पूर्ण वेद, वेदांग और सकल धर्मशास्त्रों का क्रमश: अध्ययन किया है
 हे मुनिश्रेष्ठ ! आपकी कृपासे मेरे विपक्षी भी मेरे लिये यह नही कह सकेंगे कि ‘मैंने सम्पूर्ण शास्त्रों के अभ्यास में परिश्रम नही किया ‘
हे धर्मज्ञ ! हे महाभाग ! अब मैं आपके मुखारविन्द से यह सुनना चाहता हूँ कि यह जगत किसप्रकार उत्पन्न हुआ और आगे भी (दूसरे कल्प के आरम्भ में ) कैसे होगा ?
तथा हे ब्रह्मन ! इस संसार का उपादान-कारण क्या है ? यह सम्पूर्ण चराचर किससे उत्पन्न हुआ हैं ? यह पहले किस में लीन था और आगे किसमें लीन हो जायगा ? इसके अतिरिक्त (आकाश आदि) भूतों का परिमाण, समुद्र, पर्वत तथा देवता आदि की उत्पत्ति, पृथ्वी का अधिष्ठान और सूर्य आदिका परिमय तथा उनका आधार, देवता आदि के वंश, मनु, मन्वन्तर, (बार-बार आनेवाले) चारों युगों में विभक्त कल्प और कल्पों के विभाव, प्रलय का स्वरूप, युगों के पृथक-पृथक सम्पूर्ण धर्म, देवर्षि और राजर्षियों के चरित्र, श्रीव्यासजीकृत वैदिक शाखाओं की यथावत रचना तथा ब्राह्मणादि वर्ण और ब्रह्मचर्यादि आश्रमों के धर्म – ये सब, हे महामुनि शक्तिनंदन ! मैं आपसे सुनना चाहता हूँ ।
हे ब्रह्मन ! आप मेरे प्रति अपना चित्त प्रसादोंमुख कीजिये जिससे हे महामुने ! मैं आपकी कृपासे यह सब जान सकूँ “

श्रीपराशरजी बोले ;– ‘हे धर्मज्ञ मैत्रेय ! मेरे पिताजी के पिता श्रीवसिष्ठजी ने जिसका वर्णन किया था, उस पूर्व प्रसंग का तुमने मुझे अच्छा स्मरण कराया – (इसके लिये तुम धन्यवाद के पात्र हो ) हे मैत्रेय ! जब मैंने सुना कि पिताजी को विश्वामित्र की प्रेरणासे राक्षस ने खा लिया हैं, तो मुझको बड़ा भारी क्रोध हुआ । तब राक्षसों का ध्वंस करने के लिये मैंने यज्ञ करना आरम्भ किया , उस यज्ञ में सैकड़ों राक्षस जलकर भस्म हो गये ।
इसप्रकार उन राक्षसों को सर्वथा नष्ट होते देख मेरे महाभाग पितामह वसिष्ठजी मुझसे बोले –‘वे वत्स ! अत्यंत क्रोध करना ठीक नहीं, अब इसे शांत करो । राक्षसों का कुछ भी अपराध नहीं है, तुम्हारे पिता के लिये तो ऐसा ही होना था । क्रोध तो मुखों को ही हुआ करता है, विचारवानों को भला कैसे हो सकता हैं ? भैया ! भला कौन किसीको मारता हैं ? पुरुष स्वयं ही अपने किये का फल भोगता हैं।
हे प्रियवर ! यह क्रोध तो मनुष्य के अत्यंत कष्ट से संचित यश और तप का भी प्रबल नाशक है।
हे तात ! इस लोक और परलोक दोनों को बिगाड़नेवाले इस क्रोध का महर्षिगण सर्वदा त्याग करते हैं, इसलिये तू इसके वशीभूत मत हो।
अब इन बेचारे निरपराध राक्षसों को दग्ध करने से कोई लाभ नहीं; अपने इस यज्ञ को समाप्त करो , साधुओं का धन तो सदा क्षमा ही है ‘।
महात्मा दादाजी के इसप्रकार समझानेपर उनकी बातों के गौरव का विचार करके मैंने वह यज्ञ समाप्त कर दिया।
इससे मुनिश्रेष्ठ भगवान वसिष्ठजी बहुत प्रसन्न हुए ,  उसी समय ब्रह्माजी के पुत्र पुलस्त्यजी वहाँ आये ,,
हे मैत्रेय ! पितामह )वसिष्ठजी) ने उन्हें अर्घ्य दिया, तब वे महर्षि पुलह के ज्येष्ठ भ्राता महाभाग पुलस्त्यजी आसन ग्रहण करके मुझसे बोले ।

पुलस्त्यजी बोले ;– तुमने, चित्त में बड़ा वैरभाव रहनेपर भी अपने बड़े – बूढ़े वसिष्ठजी के कहने से क्षमा स्वीकार की है, इसलिये तुम सम्पूर्ण शास्त्रों के ज्ञाता होंगे !
हे महाभाग ! अत्यंत क्रोधित होनेपर भी तुमने मेरी सन्तान का सर्वथा मूलोच्छेद नही किया; अत” मैं तुम्हे एक और उत्तम वर देता हूँ ,
हे वत्स ! तुम पुराणसंहिता के वक्ता होंगे और देवताओं के यथार्थ स्वरूप को जानोंगे । तथा मेरे प्रसाद से तुम्हारी निर्मल बुद्धि प्रवुत्ति और निवृत्ति (भोग और मोक्ष ) के उत्पन्न करनेवाले कर्मों में नि:सन्देह हो जायगी (पुलस्त्यजी के इस तरह कहने के अनन्तर) फिर मेरे पितामह भगवान वसिष्ठजी बोले ‘पुलस्त्यजी ने जो कुछ कहा है, वह सभी सत्य होगा ‘ ।

हे मैत्रेय ! इसप्रकार पूर्वकाल में बुद्धिमान वसिष्ठजी और पुलस्त्यजी ने जो कुछ कहा था, वह सब तुम्हारे प्रश्न से मुझे स्मरण हो आया है।
अत: हे मैत्रेय ! तुम्हारे पूछने से मैं उस सम्पूर्ण पुराणसंहिता को तुम्हे सुनाता हूँ; तुम उसे भली प्रकार ध्यान देकर सुनो,
यह जगत विष्णु से उत्पन्न हुआ है, उन्हीं में स्थित हैं, वे ही इसकी स्थिति और लय के कर्ता हैं तथा यह जगत भी वे ही हैं ।।

           "इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमेऽशे प्रथमोऽध्यायः"


                           "सम्पूर्ण विष्णु पुराण " 

                       ॐ श्री मन्नारायणाय नम:
              ''नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम ।
              देवी सरस्वती व्याप्तं ततो जयमुदिरयेत"।।

                             श्री विष्णुपुराण
                               (प्रथम अंश)

                           "दूसरा अध्याय"

"चौबीस तत्त्वों के विचार के साथ जगत के उत्पत्तिक्रम का वर्णन और विष्णु की महिमा"

श्रीपराशरजी बोले ;– हो ब्रह्मा, विष्णु और शंकररूप से जगत की उत्पत्ति, स्थिति और संहार के कारण है तथा अपने भक्तों को संसार-सागर से तारनेवाले हैं, उन विकाररहित, शुद्ध, अविनाशी, परमात्मा, सर्वदा एकरस, सर्वविजयी भगवान वासुदेव विष्णु को नमस्कार हैं ।
जो एक होकर भी नाना रूपवाले हैं, स्थूल-सूक्ष्ममय है, अव्यक्त (कारण) एवं व्यक्त (कार्य) रूप है तथा अपने अनन्य भक्तों की मुक्ति के कारण है,  उन श्रीविष्णुभगवान् को नमस्कार है ।
जो विश्वरूप प्रभु विश्व की उत्पत्ति, स्थिति और संहार के मूल कारण हैं, उन परमात्मा विष्णुभगवान् को नमस्कार हैं ।
जो विश्व के अधिष्ठान है, अतिसूक्ष्म से भी सूक्ष्म है, सर्व प्राणियों में स्थित पुरुषोत्तम और अविनाशी है, जो परमार्थत: (वास्तव में) अति निर्मल ज्ञानस्वरूप है, किन्तु अज्ञानवश नाना पदार्थरूप से प्रतीत होते है, तथा जो (कालस्वरूप से ) जगत की उत्पत्ति और स्थिति में समर्थ एवं उसका संहार करनेवाले हैं, उन जगदीश्वर, अजन्मा, अक्षय और अव्यय भगवान विष्णु को प्रणाम करके तुम्हे वह सारा प्रसंग क्रमश: सुनाता हूँ जो दक्ष आदि मुनिश्रेष्ठों के पूछनेपर पितामह भगवान् ब्रह्माजी ने उनसे कहा था

वह प्रसंग दक्ष आदि मुनियों ने नर्मदा – तटपर राजा पुरुकुत्स को सुनाया था तथा पुरुकुत्स ने सारस्वत से और सारस्वत ने मुझसे कहा था । ‘जो पर से भी परे, परमश्रेष्ठ, अंतरात्मा में स्थित परमात्मा, रूप, वर्ण, नाम और विशेषण आदि से रहित है; जिसमें जन्म, वृद्धि, परिणाम, क्षय और नाश – इन छ: विकारों का सर्वथा अभाव है; जिसको सर्वदा केवल “ है “ इतना ही कह सकते हैं, तथा जिनके लिये यह प्रसिद्ध है कि ‘वे सर्वत्र हैं और उनमे समस्त विश्व बसा हुआ है – इसलिये ही विद्वान जिसको वासुदेव कहते हैं’ वही नित्य, अजन्मा, अक्षय, अव्यय, एकरस और हेब गुणों के अभाव के कारण निर्मल परब्रह्म है ।
     वही इन सब व्यक्त (कार्य) और अव्यक्त (कारण) जगत के रूपसे, तथा इसके साक्षी पुरुष और महाकारण काल के रूप से स्थित है ।
हे द्विज ! परब्रह्म का प्रथम रूप पुरुष है, अव्यक्त (प्रकृति)और व्यक्त (महदादि ) उसके अन्य रूप हैं तथा सबको क्षोभित करनेवाला होने से काल उसका परमरूप हैं।

इसप्रकार जो प्रधान, पुरुष, व्यक्त और काल – इन चारों से परे हैं तथा जिसे पंडितजन ही देख पाते हैं वही भगवान विष्णु का परमपद है।
प्रधान, पुरुष, व्यक्त और काल – ये भगवान विष्णु के रूप पृथक-पृथक संसार की उत्पत्ति, पालन और संहार के प्रकाश तथा उत्पादन में कारण है।
भगवान विष्णु जो व्यक्त, अव्यक्त, पुरुष और कालरूप से स्थित होते हैं, इसे उनकी बालव्रत क्रीडा ही समझो,

उनमें से अव्यक्त कारण को, जो सदसद्रूप कारण शक्तिविशिष्ट और नित्य सदा एकरस हैं, श्रेष्ठ मुनिजन प्रधान तथा सूक्ष्म प्रकृति कहते हैं।
वह क्षयरहित हैं, उसका कोई अन्य आधार भी नही हैं तथा अप्रमेय, अजर, निश्चल शब्द-स्पर्शीदिशून्य और रुपादिरहित हैं।
वह त्रिगुणमय और जगत का कारण है तथा स्वयं अनादि एवं उत्पत्ति और लय से रहित हैं।
यह सम्पूर्ण प्रपंच प्रलयकाल से लेकर सृष्टि के आदितक इसीसे व्याप्त था,
हे विद्वन ! श्रुति के मर्म को जाननेवाले, श्रुतिपरायण ब्रह्मवेत्ता महात्मागण इसी अर्थ को लक्ष्य करके प्रधान के प्रतिपादक इस श्लोक को कहा करते हैं ।

"नाहो न रात्रिर्न नभो न भूमिर्नासीत्तमोज्योतिरभूद्य नान्यत ।
श्रोत्रादिबुद्धयानुपलभ्यमेकं प्राधानिकं ब्रह्म पुमांस्तदासीत" ।।

‘उससमय (प्रलयकाल में) न दिन था, न रात्रि थी, न आकाश था, न पृथ्वी थी, न अन्धकार था, न प्रकाश था और न इनके अतिरिक्त कुछ और ही था । बस, श्रोत्रादि इन्दिर्यों और बुद्धि आदि का अविषय एक प्रधान ब्रह्म और पुरुष ही था’।।

हे विप्र ! विष्णु के परम (उपाधिरहित) स्वरूप से प्रधान और पुरुष – ये दो रूप हुए; उसी (विष्णु) के जिस अन्य रूप के द्वारा वे दोनों सृष्टि और प्रलयकाल में, संयुक्त और वियुक्त होते हैं, उस रूपान्तर का ही नाम ‘काल’ हैं।
बीते हुए प्रलयकाल में यह व्यक्त प्रपंच प्रकतिमें लीन था, इसलिये प्रंपच के इस प्रलय को प्राकृत प्रलय कहते हैं
हे द्विज ! कालरूप भगवान अनादि हैं, इनका अंत नही है इसलिये संसार की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय भी कभी नहीं सकते वे प्रवाहरूप से निरंतर होते रहते हैं ।

हे मैत्रेय ! प्रलयकाल में प्रधान (प्रकृति) के साम्यावस्था में स्थित हो जानेपर और पुरुष के प्रकृति से पृथक स्थित हो जानेपर विष्णुभगवान् का कालरूप प्रवृत्त होता है।
तदनंतर सर्गकाल उपस्थित होनेपर उन परब्रह्म परमात्मा विश्वरूप सर्वव्यापी सर्वभूतेश्वर सर्वात्मा परमेश्वर ने अपनी इच्छा से क्षोभित किया, जिसप्रकार क्रियाशील न होनेपर भी गंध अपनी सन्निधिमात्र से ही मनको क्षुभित कर देता हैं उसी प्रकार परमेश्वर अपनी सन्निधिमात्र से ही प्रधान और पुरुष को प्रेरित करते हैं।
हे ब्रह्मन ! वह पुरुषोत्तम ही इनको क्षोभित करनेवाले हैं और वे ही क्षुब्ध होते हैं तथा संकोच (साम्य) और विकास (क्षोभ) युक्त प्रधानरूप से बी वे ही स्थित हैं। ब्रह्मादि समस्त ईश्वरों के ईश्वर वे विष्णु ही समष्टि-व्यष्टिरूप, ब्रह्मादि जीवरूप तथा महत्तत्त्वरूप से स्थित हैं ।

हे द्विजश्रेष्ठ ! सर्गकाल के प्राप्त होनेपर गुणों की साम्यावस्थारूप प्रधान जब विष्णु के क्षेत्रज्ञरूप से अधिष्ठित हुआ तो उससे महत्तत्त्व की उत्पत्ति हुई , उत्पन्न हुए महान को प्रधानतत्त्व ने आवृत् किया; महत्तत्त्व सात्त्विक, राजस और तामस, भेद से तीन प्रकार का है।
किन्तु जिस प्रकार बीज छिलके से समभाव से ढँका रहता हैं वैसे ही यह त्रिविध महत्तत्त्व से ही वैकारिक (सात्त्विक) तेजस (राजस) और तामस भूतादि तीन प्रकार का अहंकार उत्पन्न हुआ।
 हे महामुने ! वह त्रिगुणात्मक होने से भूत और इन्द्रिय आदि का कारण है और प्रधान से जैसे महत्तत्त्व व्याप्त है, वैसे ही महत्तत्त्व से वह (अहंकार) व्याप्त है।
भूतादि नामक तामस अहंकार ने विकृत होकर शब्द-तन्मात्रा और उससे शब्द-गुणवाले आकाश की रचना की,  उस भूतादि तामस अहंकार ने शब्द-तन्मात्रारूप आकाश को व्याप्त किया ।
फिर शब्द तन्मात्रारूप आकाश ने विकृत होकर स्पर्श-तन्मात्रा को रचा, उस (स्पर्श-तन्मात्रा) से बलवान वायु हुआ, उसका गुण स्पर्श माना गया हैं। शब्द-तन्मात्रारूप आकाश ने स्पर्श-तन्मात्रावाले वायु को आवृत किया है। फिर स्पर्श-तन्मात्रारूप वायु ने विकृत होक रूप-तन्मात्रा की सृष्टि की, रूप-तन्मात्रायुक्त वायुसे तेज उत्पन्न हुआ है, उसका गुण रूप कहा जाता है।
 स्पर्श-तन्मात्रा वायु ने रूप – तन्मात्रावाले तेज को आवृत किया। फिर रूप – तन्मात्रामय तेज ने भी विकृत होकर रस-तन्मात्रा की रचना की , उस रस- तन्मात्रारूप से रस-गुणवाला जल हुआ , रस-तन्मात्रावाले जल को रूप-तन्मात्रामय तेज ने आवृत किया , रस- तन्मात्रारूप जलने विकार को प्राप्त होकर गंध-तन्मात्रा की सृष्टि की, उससे पृथ्वी उत्पन्न हुई है जिसका गुण गंध नाना जाता हैं। उन – उन आकाशादि भूतों ने तन्मात्रा हैं इसलिये वे तन्मात्रा (गुणरूप) ही कहे गये हैं।
तन्मात्राओं में विशेष भाव नहीं है इसलिये उनकी अविशेष संज्ञा हैं ,  वे अविशेष तन्मात्राएँ शांत, घोर अथवा मूढ़ नहीं हैं , अर्थात उनका सुख-दुःख या मोहरूप से अनुभव नही हो सकता  इसप्रकार तामस अहंकार से यह भूत-तन्मात्रारूप सर्ग हुआ है।

दस इन्द्रियाँ तेजस अर्थात राजस अहंकार से और उनके अधिष्ठाता देवता वैकारिक अर्थात सात्त्विक अहंकार से उत्पन्न हुए कहे जाते हैं। इसप्रकार इन्दिर्यों के अधिष्ठाता दस देवता और ग्यारहवाँ मन वैकारिक (सात्त्विक ) हैं ।
हे द्विज ! त्वक, चक्षु , नासिका, जिव्हा और श्रोत्र – ये पाँचों बुद्धिकी सहायता से शब्दादि विषयों को ग्रहण करनेवाली पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं।
हे मैत्रेय ! पायु (गुदा), उपरथ (लिंग), हस्त, पाद और वाक् – ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ है | इनके कर्म (मूल-मूत्र का ) त्याग, शिल्प, गति और वचन बतलाये जाते हैं , आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी – ये पाँचों भूत उत्तरोत्तर (क्रमश:) शब्द-स्पर्श आदि पाँच गुणों से युक्त है । ये पाँचों भूत शांत घोर और मूढ़ है अर्थात सुख, दुःख और मोहयुक्त है अत: ये विशेष कहलाते हैं।

इन भूतों में पृथक-पृथक नाना शक्तियाँ है । अत: वे परस्पर पूर्णतया मिले बिना संसार की रचना नहीं कर सके, इसलिये एक-दूसरे के आश्रय रहनेवाले और एक ही संघात की उत्पत्ति के लक्ष्यवाले महत्तत्त्व से लेकर विशेषपर्यन्त प्रकृति के इन सभी विकारों ने पुरुष से अधिष्ठित होने के कारण परस्पर मिलकर सर्वथा एक होकर प्रधानतत्त्व अनुग्रह से अंड की उत्पत्ति की,
हे महाबुद्धे ! जल के बुलबुले के समान क्रमश: भूतों से बढ़ा हुआ वह गोलाकार और जलपर स्थित महान अंड ब्रह्म ( हिरण्यगर्भ ) रूप विष्णु का अति उत्तम प्राकृत आधार हुआ , उसमें वे अव्यक्त-स्वरूप जगत्पति विष्णु व्यक्त हिरण्यगर्भरूप से स्वयं ही विराजमान हुए ।
उन महात्मा हिरण्यगर्भ का सुमेरु उल्ब (गर्भ को ढँकनेवाली झिल्ली), अन्य पर्वत, जरायु (गर्भाशय ) तथा समुद्र गर्भाशयस्थ रस था ,
हे विप्र ! उस अंड में ही पर्वत और द्विपादिके सहित समुद्र, ग्रह-गण के सहित सम्पूर्ण लोक तथा देव, असुर और मनुष्य आदि विविध प्राणिवर्ग प्रकट हुए, वह अंड पूर्व-पूर्व की अपेक्षा दस-दस गुण अधिक जल, अग्नि, वायु, आकाश और भूतादि अर्थात तामस-अहंकार से आवृत है तथा भूतादि महत्तत्त्व घिरा हुआ है।
और इन सबके सहित वह महत्तत्त्व भी अव्यक्त प्रधान से आवृत है, इसप्रकार जैसे नारियल के फल का भीतरी बीज बाहर से कितने ही छिलकों से ढँका रहता है वैसे ही यह अंड इन सात प्राकृत आवरणों से घिरा हुआ है।

उसमें स्थित हुए स्वयं विश्वेश्वर भगवान विष्णु ब्रह्मा होकर रजोगुण का आश्रय लेकर इस संसार की रचना में प्रवृत्त होते हैं।
 तथा रचना हो जानेपर सत्त्वगुण-विशिष्ट अतुल पराक्रमी भगवान विष्णु उसका कल्पांतपर्यन्त युग-युगमें पालन करते हैं।
हे मैत्रेय ! फिर कल्प का अंत होनेपर अति दारुण तम: प्रधान रुद्ररूप धारण कर वे जनार्दन विष्णु ही समस्त भूतों का भक्षण कर लेते हैं! इसप्रकार समस्त भूतों का भक्षण कर संसार को जलमय करके वे परमेश्वर शेष-शय्यापर शयन करते हैं। वह एक ही भगवान जनार्दन जगत की सृष्टि, स्थिति और संहार के लिये ब्रह्मा, विष्णु और शिव – इन तीन संज्ञाओं को धारण करते हैं।
वे प्रभु विष्णु स्रष्टा (ब्रह्मा) होकर अपनी ही सृष्टि करते हैं, पालक विष्णु होकर पाल्यरूप अपना ही पालन करते हैं और अंत में स्वयं ही संहारक (शिव) तथा स्वयं ही उपसंहत (लीन) होते हैं।
पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश तथा समस्त इन्द्रियाँ और अंत:करण आदि जितना जगत है सब पुरुषरूप है और क्योंकि वह अव्यय विष्णु ही विश्वरूप और सब भूतों के अंतरात्मा है, इसलिये ब्रह्मादि प्राणियों में स्थित सर्गादिक भी उन्हीं के उपकारक है।
वे सर्वस्वरूप, श्रेष्ठ, वरदायक और वरेण्य (प्रार्थना के योग्य) भगवान विष्णु ही ब्रह्मा आदि अवस्थाओंद्वारा रचनेवाले है, वे ही रचे जाते हैं, वे ही पालते हैं, वे ही पालित होते है तथा वे ही संहार करते हैं, और स्वयं ही संह्र्त होते है ।

        "इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमेऽशे द्वितीयोऽध्यायः"


(नोट :- सभी अंश  के सभी अध्याय की मशीनी टाइपिंग है, इसमें त्रुटियाँ संभव हैं, इसे पुस्तक का हिस्सा न माना जाये  ।। )

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