सम्पूर्ण महाभारत
अनुशासनपर्व (दानधर्मपर्व)
एक सौ पैतालीसवाँ अध्याय
(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) एक सौ पैंतालीसवाँ अध्याय के श्लोक संख्या अज्ञात का हिन्दी अनुवाद)
“स्वर्ग और नरक तथा उत्तम और अधम कुलमें जन्मकी प्राप्ति करानेवाले कर्मोका वर्णन”
पार्वतीने पूछा--भगवन्! मनुष्य किस प्रकारके शील, कैसे सदाचार और किन कर्मोसे युक्त होकर अथवा किस दानके द्वारा स्वर्गमें जाता है ।। १ ।।
श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! जो मनुष्य ब्राह्मणोंका सम्मान और दान करता है दीन, दुःखी और दरिद्र आदि मनुष्योंको भक्ष्य-भोज्य, अन्न-पान और वस्त्र प्रदान करता है, ठहरनेके स्थान, धर्मशाला, कुआँ, प्याऊ, पोखरी या बावड़ी आदि बनवाता है, लेनेवाले लोगोंकी इच्छा पूछ-पूछकर नित्य देनेयोग्य वस्तुएँ दान करता है, समस्त नित्य कर्मोंका अनुष्ठान करता है, आसन, शय्या, सवारी, गृह, रत्न, धन, धान्य, गौ, खेत और कन्याओंका प्रसन्नतापूर्वक दान करता है, देवि! ऐसा मनुष्य देवलोकमें जन्म लेता है || २--५ ।।
वहाँ चिरकालतक निवास करके उत्तम भोगोंका भोग करते हुए नन््दन आदि वनोंमें अप्सराओंके साथ प्रसन्नतापूर्वक रमण करता है ।। ६ ।।
देवि! फिर वह स्वर्गलोकसे नीचे आनेपर मनुष्य-जातिके भीतर महान् भोगोंसे सम्पन्न कुलमें जन्म लेता है और धन-धान्यसे सम्पन्न होता है || ७ ।।
मानवयोनिमें वह समस्त कमनीय गुणोंसे सम्पन्न एवं प्रसन्न होता है। उसके पास महान् भोगसामग्री संचित रहती है। उसका खजाना भी विशाल होता है। वह मनुष्य सभी दृष्टियोंसे धनवान् होता है ।। ८ ।।
देवि! ये दानशील प्राणी ही ऐसे महान् सौभाग्यसे सम्पन्न होते हैं। पूर्वकालमें ब्रह्माजीने इनका ऐसा ही परिचय दिया है। दाता मनुष्य सभीकी दृष्टि में प्रिय होते हैं ।।
देवि! दूसरे बहुत-से मनुष्य दान देनेमें कृपण होते हैं। वे मन्दबुद्धि मानव ब्राह्मणोंके माँगनेपर अपने पास धन होते हुए भी उन्हें कुछ नहीं देते || १० ।।
वे दीनों, अन्धों, दरिद्रों, भिखमंगों और अतिथियोंको देखते ही हट जाते हैं। उनके याचना करनेपर भी जिह्वाकी लोलुपताके कारण उन्हें अन्न नहीं देते || ११ ।।
वेन धन, न वस्त्र, न भोग, न सुवर्ण, न गौ और न अन्नकी बनी हुई नाना प्रकारकी खाद्य वस्तुओंका कभी दान करते हैं || १२ ।।
देवि! ऐसे अकर्मण्य, लोभी, नास्तिक तथा दानधर्मसे दूर रहनेवाले बुद्धिहीन मनुष्य नरकमें पड़ते हैं ।। १३ ।।
यदि कालचक्रके फेरसे वे मन्दबुद्धि मानव पुनः मनुष्ययोनिमें जन्म लेते हैं तो निर्धन कुलमें ही उत्पन्न होते हैं || १४ ।।
वहाँ सदा भूख-प्यासका कष्ट सहते हैं। सब लोग उन्हें समाजसे बाहर कर देते हैं तथा वे सब प्रकारके भोगोंसे निराश होकर पापाचारसे जीविका चलाते हैं || १५ ।।
देवि! इस पापकर्मसे ही मनुष्य अल्प भोगवाले कुलमें जन्म लेता है, थोड़े-से ही भोग भोगते और सदा निर्धन रहते हैं || १६ ।।
इनके सिवा दूसरे भी ऐसे मनुष्य हैं, जो सदा गर्व और अभिमानमें फूले तथा पापमें रत रहते हैं। वे मूर्ख आसन देनेयोग्य पूज्य पुरुषको बैठनेके लिये कोई पीढ़ा या चौकीतक नहीं देते हैं ।। १७ ।।
वे बुद्धिहीन अथवा मन्दबुद्धि पुरुष मार्ग देनेयोग्य पुरुषोंको जानेके लिये मार्ग नहीं देते और पाद्य अर्पण करनेयोग्य पूजनीय पुरुषोंको पाद्य (पैर धोनेके लिये जल) नहीं देते हैं ।। १८ ।।
इतना ही नहीं, वे अर्घ्य देनेयोग्य माननीय व्यक्तियोंका नाना प्रकारके सत्कारोंद्वारा विधिपूर्वक पूजन नहीं करते अथवा वे मूर्ख उन्हें अर््ध या आचमनीय नहीं देते हैं || १९
गुरुके आनेपर प्रेमपूर्वक उनकी पूजा नहीं करते--उन्हें गुरुवत् सम्मान नहीं देना चाहते, अभिमान और लोभके वशीभूत होकर वे सम्माननीय मनुष्योंका अपमान और बड़ेबूढ़ोंका तिरस्कार करते हैं। देवि! ऐसा करनेवाले सभी मनुष्य नरकगामी होते हैं ।। २०-२१ ।।
बहुत वर्षोके बाद जब वे उस नरकसे छुटकारा पाते हैं तो श्वपाक और पुल्कस आदि निन्दित और मूढ़ मनुष्योंके कुत्सित कुलमें जन्म लेते हैं। गुरुजनों और वृद्धोंका तिरस्कार करनेवाले वे अधम मानव चाण्डालोंके उन्हीं निन्दित कुलोंमें उत्पन्न होते हैं ।। २२-२३ ।।
देवि! जो न तो उद्दण्ड है, न अभिमानी है तथा जो देवताओं और द्विजोंकी पूजा करता है, संसारके लोग जिसे पूज्य मानते हैं, जो बड़ोंको प्रणाम करनेवाला, विनयी, मीठे वचन बोलनेवाला, सब वर्णोका प्रिय और सम्पूर्ण प्राणियोंका हित करनेवाला है, जिसका किसीके साथ द्वेष नहीं है, जिसका मुख प्रसन्न और स्वभाव कोमल है, जो सदा स्वागतपूर्वक स्नेहभरी वाणी बोलता है, किसी भी प्राणीकी हिंसा नहीं करता तथा सबका यथायोग्य सत्कारपूर्वक पूजन करता रहता है, जो मार्ग देने योग्य पुरुषोंको मार्ग देता और गुरुका उसके योग्य समादर करता है, अतिथियोंको आमन्त्रित करके उनकी सेवामें लगा रहता तथा स्वयं आये हुए अतिथियोंका भी पूजन करता है, ऐसा मनुष्य स्वर्गलोकमें जाता है। तत्पश्चात् मानव-योनिमें आकर विशिष्ट कुलमें जन्म लेता है । २४--२८ ।।
उस जन्ममें वह महान् भोगों और सम्पूर्ण रत्नोंसे सम्पन्न हो सुयोग्य ब्राह्मणोंको यथायोग्य दान देता और धर्मानुष्ठानमें तत्पर रहता है ।। २९ ।।
वहाँ सब प्राणी उसका सम्मान करते हैं और सब लोग उसके सामने नतमस्तक होते हैं। इस प्रकार मनुष्य अपने कर्मोका फल सदा स्वयं ही भोगता है ।। ३० ।।
धर्मात्मा मनुष्य सर्वदा उत्तम कुल, उत्तम जाति और उत्तम स्थानमें जन्म धारण करता है। यह साक्षात् ब्रह्माजीके बताये हुए धर्मका मैंने वर्णन किया है ।। ३१ ।।
शोभने! जिस मनुष्यका आचरण क्रूरतासे भरा हुआ है, जिससे समस्त जीवोंको भय प्राप्त होता है, जो हाथ, पैर, रस्सी, डंडे और ढेलेसे मारकर, खम्भोंमें बाँधकर तथा घातक शस्त्रोंका प्रहार करके जीव-जन्तुओंको सताता है, छल-कपटमें प्रवीण होकर हिंसाके लिये उन जीवोंमें उद्बेग पैदा करता है तथा उद्वेगजनक होकर सदा उन जन्तुओंपर आक्रमण करता है, ऐसे स्वभाव और आचारवाले मनुष्यको नरकमें गिरना पड़ता है ।।
यदि वह कालचक्रके फेरसे फिर मनुष्ययोनिमें आता है तो अनेक प्रकारकी विघ्नबाधाओंसे कष्ट उठानेवाले अधम कुलमें उत्पन्न होता है || ३५ ।।
देवि! ऐसा मनुष्य अपने ही किये हुए कर्मोके फलके अनुसार मनुष्योंमें तथा जाति-बन्धुओंमें नीच समझा जाता है और सब लोग उससे द्वेष रखते हैं।
इसके विपरीत जो मनुष्य सब प्राणियोंके प्रति दयादृष्टि रखता है, सबको मित्र समझता है, सबके ऊपर पिताके समान स्नेह रखता है, किसीके साथ वैर नहीं करता और इन्द्रियोंको वशमें किये रहता है, जो हाथ-पैर आदिको अपने अधीन रखकर किसी भी जीवको न तो उद्वेगमें डालता और न मारता ही है, जिसपर सब प्राणी विश्वास करते हैं, जो रस्सी, डंडे, ढेले और घातक अस्त्र-शस्त्रोंसे प्राणियोंको कष्ट नहीं पहुँचाता, जिसके कर्म कोमल एवं निर्दोष होते हैं तथा जो सदा ही दयापरायण होता है, ऐसे स्वभाव और आचरणवाला पुरुष स्वर्गलोकमें दिव्य शरीर धारण करता है और वहाँके दिव्य भवनमें देवताओंके समान आनन्दपूर्वक निवास करता है || ३७--४० ।।
फिर पुण्यकर्मोंके क्षीण होनेपर यदि वह मृत्यु-लोकमें जन्म लेता है, तो उसके ऊपर बाधाओंका आक्रमण कम होता है। वह निर्भय हो सुखसे अपनी उन्नति करता है। सुखका भागी होकर आयास और उद्वेगसे रहित जीवन व्यतीत करता है। देवि! यह सत्पुरुषोंका मार्ग है, जहाँ किसी प्रकारकी विघ्न-बाधा नहीं आने पाती है || ४१-४२ ।।
पार्वतीजीने पूछा--भगवन्! इन मनुष्योंमेंसे कुछ तो ऊहापोहमें कुशल, ज्ञानविज्ञानसे सम्पन्न, बुद्धिमान् और अर्थनिषुण देखे जाते हैं || ४३ ।।
देव! कुछ दूसरे मानव ज्ञान-विज्ञानसे शून्य और दुर्बुद्धि दिखायी देते हैं। ऐसी दशामें मनुष्य कौन-सा विशेष कर्म करनेसे बुद्धिमान हो सकता है? ।। ४४ ।।
विरूपाक्ष! मनुष्य मन्दबुद्धि कैसे होता है? सम्पूर्ण धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ महादेव! आप मेरे इस संदेहका निवारण कीजिये || ४५ ।।
देव! कुछ लोग जन्मान्ध, कुछ रोगसे पीड़ित और कितने ही नपुंसक देखे जाते हैं। इसका क्या कारण है? यह मुझे बताइये ।। ४६ ।।
श्रीमहादेवजीने कहा--देवि! जो कुशल मनुष्य सिद्ध, वेदवेत्ता और धर्मज्ञ ब्राह्मणोंसे प्रतिदिन उनकी कुशल पूछते हैं और अशुभ कर्मका परित्याग करके शुभकर्मका सेवन करते हैं, वे परलोकमें स्वर्ग और इहलोकमें सदा सुख पाते हैं || ४७-४८ ।।
ऐसे आचरणवाला पुरुष यदि स्वर्गसे लौटकर फिर मनुष्ययोनिमें आता है तो वह मेधावी होता है। शास्त्र उसकी बुद्धिका अनुसरण करता है, अतः वह सदा कल्याणका भागी होता है ।। ४९ ।।
जो परायी स्त्रियोंके प्रति सदा दोषभरी दृष्टि डालते हैं, उस दुष्ट स्वभावके कारण वे जन्मान्ध होते हैं ।।
जो दूषित हृदयसे किसी नंगी स्त्रीकी ओर निहारते हैं, वे पापकर्मी मनुष्य इस लोकमें रोगसे पीड़ित होते हैं || ५१ ।।
जो दुराचारी, दुर्बुद्धि एवं मूढ़ मनुष्य पशु आदिकी योनिमें मैथुन करते हैं, वे पुरुषोंमें नपुंसक होते हैं ।।
जो पशुओंकी हत्या कराते, गुरुकी शय्यापर सोते और वर्णसंकर जातिकी स्त्रियोंसे समागम करते हैं, वे मनुष्य नपुंसक होते हैं |। ५३ ।।
पार्वतीने पूछा--देवश्रेष्ठ] कौन सदोष कर्म हैं और कौन निर्दोष, कौन-सा कर्म करके मनुष्य कल्याणका भागी होता है? ।। ५४ ।।
श्रीमहेश्वरने कहा--जो श्रेष्ठ मार्गको पानेकी इच्छा रखकर सदा ही ब्राह्मणोंसे उसके विषयमें पूछता है, धर्मका अन्वेषण करता और सदगुणोंकी अभिलाषा रखता है, वही स्वर्गलोकके सुखका अनुभव करता है ।।
देवि! ऐसा मनुष्य यदि कभी मानवयोनिको प्राप्त होता है तो वहाँ प्रायः मेधावी एवं धारण शक्तिसे सम्पन्न होता है ।। ५६ ।।
देवि! यह सत्पुरुषोंका धर्म है, उसे कल्याणकारी मानना चाहिये। मैंने मनुष्योंके हितके लिये इस धर्मका तुम्हें भलीभाँति उपदेश किया है || ५७ ।।
पार्वतीने पूछा--भगवन्! दूसरे बहुत-से ऐसे मनुष्य हैं, जो अल्पबुद्धि होनेके कारण धर्मसे द्वेष करते हैं। वेदवेत्ता ब्राह्मणोंके पास नहीं जाना चाहते हैं | ५८ ।।
कुछ मनुष्य व्रतधारी, श्रद्धालु और धर्मपरायण होते हैं तथा दूसरे व्रतहीन, नियमश्रष्ट तथा राक्षसोंके समान होते हैं || ५९ ।।
कितने ही यज्ञशील होते हैं और दूसरे मनुष्य होम और यज्ञसे दूर ही रहते हैं। किस कर्मविपाकसे मनुष्य इस प्रकार परस्परविरोधी स्वभावके हो जाते हैं? यह मुझे बताइये ।। ६० ।।
श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! शास्त्र लोकधर्मोकी उन मर्यादाओंको स्थापित करते हैं, जो सबके हितके लिये निर्मित हुई हैं। जो उन शास्त्रोंको प्रमाण मानते हैं, वे दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करते देखे जाते हैं ।।
जो मोहके वशीभूत होकर अधर्मको धर्म कहते हैं, वे व्रतहीन मर्यादाको नष्ट करनेवाले पुरुष ब्रह्मराक्षस कहे गये हैं || ६२ ।।
वे मनुष्य यदि कालयोगसे इस संसारमें मनुष्य होकर जन्म लेते हैं तो होम और वषट्कारसे रहित तथा नराधम होते हैं ।। ६३ ।।
देवि! यह धर्मका समुद्र, धर्मात्माओंके लिये प्रिय और पापात्माओंके लिये अप्रिय है। मैंने तुम्हारे संदेहका निवारण करनेके लिये यह सब विस्तारपूर्वक बताया है ।।
उमाने कहा--देवदेव! त्रिलोचन! वृषभध्वज! भगवन्! महेश्वर! आपकी कृपासे मैंने पूर्वोक्त सब विषयोंको सुना है ।।
सुनकर आपके उस परम उत्तम उपदेशको मैंने बुद्धिके द्वारा ग्रहण किया है। इस समय मनुष्योंके विषयमें एक संदेह ऐसा रह गया है, जिसका समाधान आवश्यक है ।।
मनुष्योंमें यह जो राजा दिखायी देता है, उसके भी प्राण, सिर और धड़ दूसरे मनुष्योंके समान ही हैं; फिर किस कर्मके फलसे यह सबमें प्रधान पद पानेका अधिकारी हुआ है?
यह राजा नाना प्रकारके मनुष्योंको दण्ड देता और उन्हें डाँटता-फटकारता है। यह मृत्युके पश्चात् कैसे पुण्यात्माओंके लोक पाता है? मानद! अतः मैं राजाके आचारव्यवहारका वर्णन सुनना चाहती हूँ ।।
श्रीमहेश्वरने कहा--शुभानने! अब मैं तुम्हें राजधर्मकी बात बताऊँगा; क्योंकि जगत्का सारा शुभाशुभ आचार-व्यवहार राजाके ही अधीन है। देवि! राज्यको बहुत बड़ी तपस्याका फल माना गया है ।।
प्राचीन कालकी बात है, सर्वत्र अराजकता फैली हुई थी। प्रजापर महान् संकट आ गया। प्रजाकी यह संकटापन्न अवस्था देख ब्रह्माजीने मनुको राजसिंहासनपर बिठाया ।।
तभीसे राजाओंका शुभाशुभ बर्ताव देखनेमें आया है। वरारोहे! राजाका जो आचरण जगत्के लिये हितकर और लाभदायक है, वह मुझसे सुनो ।।
जिस बर्तावके कारण वह मृत्युके पश्चात् स्वर्गकका भागी हो सकता है, वही बता रहा हूँ। उसमें जैसा पराक्रम और जैसा यश होना चाहिये, वह भी सुनो। पिताकी ओरसे प्राप्त हुए अथवा और पहलेसे चले आते हुए अथवा स्वयं ही पराक्रमद्वारा प्राप्त करके वशमें किये हुए राज्यको राजा धर्मका आश्रय ले विधिपूर्वक उपभोगमें लाये ।।
पहले अपने आपको ही विनयसे सम्पन्न करे। तत्पश्चात् सेवकों और प्रजाओंको विनयकी शिक्षा दे। यही विनयका क्रम है ।।
शुभेक्षणे! राजाको ही आदर्श मानकर उसके आचरण सीखनेकी इच्छासे प्रजावर्गके लोग स्वयं भी विनयसे सम्पन्न होते हैं ।।
जो राजा स्वयं विनय सीखनेके पहले प्रजाको ही विनय सिखाता है, वह अपने दोषोंपर दृष्टि न डालनेके कारण उपहासका पात्र होता है ।।
विद्याके अभ्यास और वृद्ध पुरुषोंके संगसे अपने आपको विनयशील बनाये। विद्या धर्म और अर्थरूप फल देनेवाली है। जो उस विद्याके ज्ञाता हैं, उन्हींको वृद्ध कहते हैं ।।
देवि! इसके बाद राजाको अपनी इन्द्रियोंपर विजय पाना चाहिये--यह बात बतायी गयी। इन्द्रियोंको काबूमें न रखनेसे जो महान् दोष प्राप्त होता है, वह राजाको नीचे गिरा देता है ।।
पाँचों इन्द्रियोंको अपने अधीन करके उनके पाँचों विषयोंको सुखा डाले। ज्ञान और विनयके द्वारा आवश्यक प्रयत्न करके काम-क्रोध आदि छ: दोषोंको त्याग दे तथा शास्त्रीय दृष्टिका सहारा लेकर न्यायपरायण हो सेवकोंका संग्रह करे ।।
जो सदाचार, शास्त्रज्ञान और उत्तम कुलसे सम्पन्न हों, जिनकी सचाई और ईमानदारीकी परीक्षा ले ली गयी हो, जो उस परीक्षामें उत्तीर्ण हुए हों, जिनके साथ बहुत-से जासूस हों और जो जितेन्द्रिय हों--ऐसे अमात्योंको यथायोग्य अपने कर्मोमें उनकी योग्यताके अनुसार नियुक्त करे ।।
बुद्धिमान् मन्त्री, बहुजनप्रिय राष्ट्र, दुर्धर्ष श्रेष्ठ नगर या दुर्ग, कठिन अवसरोंपर काम देनेवाला कोष, सामनीतिके द्वारा राजामें अनुराग रखनेवाली सेना, दुविधेमें न पड़ा हुआ मित्र और विनयके तत्त्वको जाननेवाला राज्यका स्वामी--ये सात प्रकृतियाँ कही गयी हैं ।
प्रजाकी रक्षाके लिये ही यह सारा प्रबन्ध किया गया है। रक्षाकी हेतुभूत जो ये प्रकृतियाँ है, इनके सहयोगसे राजा लोकहितका सम्पादन करे ।।
राजाको प्रजाकी रक्षाके लिये ही अपनी रक्षा अभीष्ट होती है, अतः वह सदा सावधान होकर आत्मरक्षा करे ।।
मनको वशमें रखनेवाला राजा भोजन-आच्छादन-स्नान, बाहर निकलना तथा सदा स्त्रियोंके समुदायसे संयोग रखना--इन सबसे अपनी रक्षा करे ।।
वह मनको सदा अपने अधीन रखकर स्वजनोंसे, दूसरोंसे, शस्त्रसे, विषसे तथा स्त्रीपुत्रोंसे भी निरन्तर अपनी रक्षा करे ।।
आत्मवान् राजा प्रजाकी रक्षाके लिये सभी स्थानोंसे अपनी रक्षा करे और सदा प्रजाके हितमें संलग्न रहे ।।
प्रजाका कार्य ही राजाका कार्य है, प्रजाका सुख ही उसका सुख है, प्रजाका प्रिय ही उसका प्रिय है तथा प्रजाके हितमें ही उसका अपना हित होता है। प्रजाके हितके लिये ही उसका सर्वस्व है, अपने लिये कुछ भी नहीं है ।।
प्रकृतियोंकी रक्षाके लिये राग-द्वेष छोड़कर किसी विवादके निर्णयके लिये पहले दोनों पक्षोंकी यथार्थ बातें सुन ले। फिर अपनी बुद्धिके द्वारा स्वयं उस मामलेपर तबतक विचार करे, जबतक कि उसे यथार्थताका सुस्पष्ट ज्ञान न हो जाय ।।
तत्त्वको जाननेवाले अनेक श्रेष्ठ पुरुषोंक साथ बैठकर परामर्श करनेके बाद अपराधी, अपराध, देश, काल, न्याय और अन्यायका ठीक-ठीक ज्ञान प्राप्त करके फिर शास्त्रके अनुसार राजा अपराधी मनुष्योंको दण्ड दे ।।
पक्षपात छोड़कर ऐसा करनेवाला राजा धर्मका भागी होता है। प्रत्यक्ष देखकर, माननीय पुरुषोंके उपदेश सुनकर अथवा युक्तियुक्त अनुमान करके राजाको सदा ही अपने देशके शुभाशुभ वृत्तान्तको जानना चाहिये ।।
गुप्तचरोंद्वारा और कार्यकी प्रवृत्तिसे देशके शुभाशुभ वृत्तान्तको जानकर उसपर विचार करे। तत्पश्चात् अशुभका तत्काल निवारण करे और अपने लिये शुभका सेवन करे ।
देवि! राजा निन्दनीय मनुष्योंकी निन्दा ही करे, पूजनीय पुरुषोंका पूजन करे और दण्डनीय अपराधियोंको दण्ड दे। इसमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये ।।
पाँच व्यक्तियोंकी अपेक्षा रखकर अर्थात् पाँच मन्त्रियोंक साथ बैठकर सदा ही राजकार्यके विषयमें गुप्त मन्त्रणा करे। जो बुद्धिमान, कुलीन, सदाचारी और शास्त्रज्ञानसम्पन्न हों, उन्हींके साथ राजाको सदा मन्त्रणा करनी चाहिये ।।
जो इच्छानुसार राज्यकार्यसे विमुख हो जाते हों, ऐसे लोगोंके साथ मन्त्रणा करनेका विचार भी मनमें नहीं लाना चाहिये। राजाको राष्ट्रके हितका ध्यान रखकर सत्य-धर्मका पालन करना और कराना चाहिये ।।
दुर्ग आदि तथा मनुष्योंकी देखभालके लिये राजा सम्पूर्ण उद्योग सदा स्वयं ही करे। वह देशकी उन्नति करनेवाले भृत्योंको सावधानीके साथ कार्यमें नियुक्त करे और देशको हानि पहुँचानेवाले समस्त अप्रियजनोंका परित्याग कर दे। जो राजाके आश्रित होकर जीविका चला रहे हों, ऐसे लोगोंकी देखभाल भी राजा प्रतिदिन स्वयं ही करे ।।
वह प्रसन्नमुख और सबका परम प्रिय होकर लोगोंको जीविका दे, उनके साथ उत्तम बर्ताव करे। किसीसे पापपूर्ण, रूखा और तीखा वचन बोलना उसके लिये कदापि उचित नहीं ।।
सत्पुरुषोंके बीचमें वह कभी ऐसी बात न कहे, जो विश्वासके योग्य न हो। प्रत्येक मनुष्यके गुणों और दोषोंको उसे अच्छी तरह समझना चाहिये ।।
सत्पुरुषोंके बीचमें वह कभी ऐसी बात न कहे, जो विश्वासके योग्य न हो। प्रत्येक मनुष्यके गुणों और दोषोंको उसे अच्छी तरह समझना चाहिये ।।
अपनी चेष्टाको धैर्यपूर्वक छिपाये रखे। क्षुद्र बुद्धिका प्रदर्शन न करे अथवा मनमें क्षुद्र विचार न लाये। दूसरेकी चेष्टाको अच्छी तरह समझकर संसारमें उनके साथ सम्पर्क स्थापित करे ।।
राजाको चाहिये कि वह अपने भयसे, दूसरोंके भयसे, पारस्परिक भयसे तथा अमानुष भयोंसे अपनी प्रजाको सुरक्षित रखे ।।
जो लोभी, कठोर तथा डाका डालनेवाले मनुष्य हों, उन्हें जहाँ-तहाँसे पकड़वाकर राजा कैदमें डाल दे ।।
राजकुमारोंको जन्मसे ही विनयशील बनावे। उनमेंसे जो भी अपने अनुरूप गुणोंसे युक्त हो, उसे युवराजपदपर नियुक्त करे ।।
शोभने! एक क्षणके लिये भी बिना राजाका राज्य नहीं रहना चाहिये। अतः: अपने पीछे राजा होनेके लिये एक युवराजको नियत करना सदा ही आवश्यक है ।।
कुलीन पुरुषों, वैद्यों, श्रोत्रिय ब्राह्मणों, तपस्वी मुनियों तथा वृत्तियुक्त दूसरे पुरुषोंका भी राजा विशेष सत्कार करे। अपने लिये, राज्यके हितके लिये तथा कोष-संग्रहके लिये ऐसा करना आवश्यक है ।।
नीतिज्ञ पुरुष अपने कोषको चार भागोंमें विभक्त करे--धर्मके लिये, पोष्य वर्गके पोषणके लिये, अपने लिये तथा देश-कालवश आनेवाली आपफत्तिके लिये ।।
राजाको चाहिये कि अपने देशमें जो अनाथ, रोगी और वृद्ध हों, उनका स्वयं पोषण करे। संधि, विग्रह तथा अन्य नीतियोंका बुद्धिपूर्वक भलीभाँति विचार करके प्रयोग करे ।
राजा सबका प्रिय होकर सदा अपने मण्डल [(देशके भिन्न-भिन्न भाग) में विचरे। शुभ कार्योमें भी वह अकेला कुछ न करे ।।
अपने और दूसरोंसे संकटकी सम्भावनाका विचार करके द्वेष या लोभवश धार्मिक पुरुषोंके साथ सम्बन्धका त्याग न करे ।।
प्रजाका धर्म है रक्षणीयता और क्षत्रिय राजाका धर्म है रक्षा; अतः दुष्ट राजाओंसे पीड़ित हुई प्रजाकी सर्वत्र रक्षा करे ।।
सेनाको संकटोंसे बचावे, नीतिसे अथवा धन खर्च करके भी प्राय: युद्धको टाले। सैनिकों तथा प्रजाजनोंके प्राणोंकी रक्षाके उद्देश्यसे ही ऐसा करना चाहिये ।।
अनिवार्य कारण उपस्थित होनेपर ही युद्ध करना चाहिये, अपने या पराये दोषसे नहीं। उत्तम युद्धमें प्राण-विसर्जन करना वीर योद्धाके लिये धर्मकी प्राप्ति करानेवाला होता है ।।
किसी बलवान शत्रुके आक्रमण करनेपर राजा उस आपत्तिसे बचनेका उपाय करे। प्रजाके हितके लिये समस्त विरोधियोंको अनुनय-विनयके द्वारा अनुकूल बना ले। देवि! यह संक्षेपसे राजधर्म बताया गया है ।।
इस प्रकार बर्ताव करनेवाला राजा प्रजाको दण्ड देता और फटकारता हुआ भी जलसे लिप्त न होनेवाले कमलदलके समान पापसे अछूता ही रहता है ।।
इस बर्तावसे रहनेवाले राजाकी जब मृत्यु होती है, तब वह स्वर्गलोकमें जाकर देवताओंके साथ आनन्द भोगता है ।।
(दाक्षिणात्यप्रतिमें अध्याय समाप्त)
[योद्धाओंके धर्मका वर्णन तथा रणयज्ञमें प्राणोत्सर्गकी महिमा]
भगवान् महेश्वर कहते हैं--राजा भाँति-भाँतिके भोग, वस्त्र और आभूषण देकर जिन लोगोंको अपनी सहायताके लिये बुलाता और रखता है, उनके साथ भोजन करके घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित करता है और नाना प्रकारके सत्कारोंद्वारा उन्हें संतुष्ट करता है, ऐसे योद्धाओंको उचित है कि युद्ध छिड़ जानेपर सहायताके समय उस राजाके लिये शस्त्र उठावे ।।
जब घोर संग्राममें शूरवीर एक-दूसरेको मारते और मारे जाते हों, उस अवसरपर जो नराधम सैनिक पीठ देकर सेनानायककी इच्छा न होते हुए भी बिना घायल हुए ही युद्धसे मुँह मोड़ लेते हैं, वे सेनापतिके सम्पूर्ण पापोंको स्वयं ही ग्रहण कर लेते हैं और उन भगेड़ोंके पास जो कुछ भी पुण्य होता है, वह सेनानायकको प्राप्त हो जाता है ।।
“अहिंसा परम धर्म है,' ऐसी जिनकी मान्यता है, वे भी यदि राजाके सेवक हैं, उनसे भरण-पोषणकी सुविधा एवं भोजन पाते हैं, ऐसी दशामें भी वे अपनी शक्तिके अनुरूप संग्रामोंमें जूझते नहीं हैं तो घोर नरकमें पड़ते हैं; क्योंकि वे स्वामीके अन्नका अपहरण करनेवाले हैं ।।
जो अपने प्राणोंकी परवाह छोड़कर पतंगकी भाँति निर्भय हो हाथमें हथियार उठाये अग्निके समान विनाशकारी संग्राममें प्रवेश कर जाता है और योद्धाको मिलनेवाली निश्चित गतिको जानकर उत्साहपूर्वक जूझता है, वह स्वर्गलोकमें जाता है ।।
जो अत्यन्त घोर समरांगणमें मृगोंके झुडोंको संतप्त करनेवाले सिंहके समान शत्रुसैनिकोंको ताप देता हुआ अपने नायक (राजा या सेनापति) की रक्षा करता है, मध्याह्नकालके सूर्यकी भाँति रणक्षेत्रमें जिसकी ओर देखना शत्रुओंके लिये अत्यन्त कठिन हो जाता है तथा जो संग्राममें शस्त्र उठाये निर्दयतापूर्वक प्रहार करता है, वह शुद्धचित्त होकर उस युद्धके द्वारा ही मानो महान् यज्ञका अनुष्ठान करता है ।।
उस समय कवच ही उसका काला मृगचर्म है, धनुष ही दाँतुन या दन्तकाष्ठ है, रथ ही वेदी है, ध्वज यूप है और रथकी रस्सियाँ ही बिछे हुए कुशोंका काम देती हैं। मान, दर्प और अहंकार--ये त्रिविध अग्नियाँ हैं, चाबुक, खुवा है, सारथि उपाध्याय है, खुकू-भाण्ड आदि जो कुछ भी यज्ञकी सामग्री है, उसके स्थानमें उस योद्धाके भिन्न-भिन्न अस्त्र-शस्त्र हैं। सायकोंको ही समिधा माना गया है ।।
उस यशस्वी वीरके अंगोंसे जो पसीने ढलते हैं, वे ही मानो मधु हैं। मनुष्योंके मस्तक पुरोडाश हैं, रुधिर आहुति है, तृणीरोंको चरु समझना चाहिये। वसाको ही वसुधारा माना गया है, मांसभक्षी भूतोंके समुदाय ही उस यज्ञमें द्विज हैं। मारे गये मनुष्य, हाथी और घोड़े ही उनके भोजन और अन्नपान हैं ।।
मारे गये योद्धाओंके जो वस्त्र, आभूषण और सुवर्ण हैं, वे ही मानो उस रणयज्ञकी दक्षिणा हैं ।।
देवि! जो संग्राममें हाथीकी पीठपर बैठा हुआ युद्धके मुहानेपर मारा जाता है, वह ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है ।।
रथके बीचमें बैठा हुआ या घोड़ेकी पीठपर चढ़ा हुआ जो वीर युद्धमें मारा जाता है, वह इन्द्रलोकमें सम्मानित होता है ।।
मारे गये योद्धा स्वर्गमें पूजित होते हैं; किन्तु मारनेवाला इसी लोकमें प्रशंसित होता है। अतः युद्धमें दोनों ही सुखी होते हैं--जो मारता है वह और जो मारा जाता है वह ।।
अतः संग्रामभूमिमें पहुँच जानेपर निर्भय होकर शत्रुपर प्रहार करना चाहिये। जो हथियार उठाकर संग्राममें निर्भय होकर प्रहार करता है, धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ उस वीरको निस्संदेह सभी धर्म प्राप्त होते हैं। ठीक उसी तरह जैसे महासागरमें सहस्रों नदियाँ आकर मिलती हैं ।।
धर्म ही, यदि उसका हनन किया जाय तो मारता है और धर्म ही सुरक्षित होनेपर रक्षा करता है; अतः प्रत्येक मनुष्यको, विशेषत: राजाको धर्मका हनन नहीं करना चाहिये ।।
जहाँ राजा धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करता है तथा जहाँ पितरों और देवताओंके साथ षट्कर्मपरायण ब्राह्मणोंकी पूजा होती है, उस देशमें न तो कभी अनावृष्टि होती है, न रोगोंका आक्रमण होता है और न किसी तरहके उपद्रव ही होते हैं। राजाके स्वधर्म-परायण होनेपर वहाँकी सारी प्रजा धर्मशील होती है ।।
देवि! प्रजाको सदा ऐसे नरेशकी इच्छा रखनी चाहिये, जो सदाचारी तो हो ही, देशमें सब ओर गुप्तचर नियुक्त करके शत्रुओंके छिद्रोंकी जानकारी रखता हो। सदा ही प्रमादशून्य और प्रतापी हो ।।
सुश्रोणि! पृथ्वीपर बहुत-से ऐसे क्षुद्र मनुष्य हैं, जो राजाओंका महान् विनाश करनेपर तुले रहते हैं; अतः विद्वान् राजाको कभी प्रमाद नहीं करना चाहिये (आत्मरक्षाके लिये सदा सावधान रहना चाहिये।) ।।
पहलेके छोड़े हुए मित्रोंपर, अन्यान्य मनुष्योंपर, हाथियोंपर कभी विश्वास नहीं करना चाहिये। प्रतिदिनके स्नान और खानपानमें भी किसीका पूर्णतः विश्वास करना उचित नहीं है ।।
जो राष्ट्रके हितके लिये, गौ और ब्राह्मणोंके उपकारके लिये, किसीको बन्धनसे मुक्त करनेके लिये और मित्रोंकी सहायताके निमित्त अपने दुस्त्यज प्राणोंका परित्याग कर देता है, वह राजाको प्रिय होता है और अपने कुलको उन्नतिके शिखरपर पहुँचा देता है ।।
वरारोहे! यदि कोई सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाली कामधेनुको तथा पर्वत और वनोंसहित समुद्रपर्यन्त लोकधारिणी पृथ्वीको धनसे परिपूर्ण करके द्विजोंको दान कर देता है, उसका वह दान भी पूर्वोक्त प्राणत्यागी योद्धाके त्यागके समान नहीं है। वह प्राण-त्यागी ही उस दातासे बढ़कर है ।।
जिसके पास धन और सम्पत्ति है, वह सहस्रों यज्ञ कर सकता है। उसके उन यज्ञोंसे कौन-सी आश्वर्यकी बात हो गयी! प्राणोंका परित्याग करना तो सभीके लिये अत्यन्त दुष्कर है ।।
अतः सम्पूर्ण यज्ञोंमें प्राणयज्ञ ही बढ़कर है। देवि! इस प्रकार मैंने तुम्हारे समक्ष रणयज्ञका यथार्थरूपसे वर्णन किया है ।।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)
[संक्षेपसे राजधर्मका वर्णन]
श्रीमहादेवजी कहते हैं--देवि! राजाओंको अपने सेवकोंके साथ हास-परिहास नहीं करना चाहिये; क्योंकि ऐसा करनेसे उन्हें लघुता प्राप्त होती है और उनकी आज्ञाका पालन नहीं किया जाता है ।।
श्रीमहादेवजी कहते हैं--देवि! राजाओंको अपने सेवकोंके साथ हास-परिहास नहीं करना चाहिये; क्योंकि ऐसा करनेसे उन्हें लघुता प्राप्त होती है और उनकी आज्ञाका पालन नहीं किया जाता है ।।
सेवकोंके साथ हँसी-परिहास करनेसे राजाका तिरस्कार होता है। वे धृष्ट सेवक न माँगने योग्य वस्तुओंको भी माँग बैठते हैं और न कहने योग्य बातें भी कह डालते हैं ।।
पहलेसे ही उचित लाभ मिलनेपर भी वे संतुष्ट नहीं होते; इसलिये राजा सेवकोंके साथ हँसी-मजाक करना छोड़ दे ।।
राजा अविश्वस्त पुरुषपर कभी विश्वास न करे। जो विश्वस्त हो, उसपर भी पूरा विश्वास न करे; विशेषतः अपने समान गोत्रवाले भाई-बन्धुओंपर किसी भी उपायसे कदापि विश्वास न करे ।।
जैसे वज्र वृक्षको नष्ट कर देता है, उसी प्रकार विश्वाससे उत्पन्न हुआ भय राजाको नष्ट कर डालता है। प्रमादवश लोभके वशीभूत हुआ राजा मारा जाता है। अतः प्रमाद और लोभको अपने भीतर न आने दे तथा किसीपर भी विश्वास न करे ।।
राजा भयातुर मनुष्योंकी भयसे रक्षा करे, दीन-दु:खियोंपर अनुग्रह करे, कर्तव्य और अकर्तव्यको विशेषरूपसे समझे और सदा राष्ट्रके हितमें संलग्न रहे ।।
अपनी प्रतिज्ञाको सत्य कर दिखावे। राज्यमें स्थित रहकर प्रजाके पालनमें तत्पर रहे। लोभशून्य होकर न्याययुक्त बात कहे और प्रजाकी आयका छठा भागमात्र लेकर जीवननिर्वाह करे ।।
कर्तव्य-अकर्तव्यको समझे। सबको धर्मकी दृष्टिसे देखे! अपने राष्ट्रके निवासियोंपर दया करे और कभी न करने योग्य कर्ममें प्रवृत न हो ।।
जो मनुष्य राजाकी प्रशंसा करते हैं और जो उसकी निन्दा करते हैं, इनमेंसे शत्रु भी यदि निरपराध हो तो उसे मित्रके समान देखे ।।
दुष्टको अपराधके अनुसार दण्ड देकर उसका शासन करे। जहाँ राजा न्यायोचित दण्डमें रुचि रखता है, वहाँ धर्मका पालन होता है ।।
जहाँ राजा क्षमाशील न हो, वहाँ अधर्म नहीं होता। अशिष्ट पुरुषोंको दण्ड देना और शिष्ट पुरुषोंका पालन करना राजाका धर्म है ।।
राजा वधके योग्य पुरुषोंका वध करे और जो वधके योग्य न हों, उनकी रक्षा करे। ब्राह्मण, गौ, दूत, पिता, जो विद्या पढ़ाता है वह अध्यापक तथा जिन्होंने पहले कभी उपकार किये हैं वे मनुष्य--ये सब-के-सब अवध्य माने गये हैं। स्त्रियोंका तथा जो सबका अतिथि-सत्कार करनेवाला हो, उस मनुष्यका भी वध नहीं करना चाहिये ।।
पृथ्वी, गौ, सुवर्ण, सिद्धात्न, तिल और घी--इन वस्तुओंका ब्राह्मणके लिये प्रतिदिन दान करनेवाला राजा पापसे मुक्त हो जाता है ।।
जो राजा इस प्रकार राष्ट्रके हितमें तत्पर हो प्रतिदिन ऐसा बर्ताव करता है, उसके राष्ट्र, धन, धर्म, यश और कीर्तिका विस्तार होता है ।।
ऐसा राजा पाप और अनर्थका भागी नहीं होता। जो नरेश प्रजाकी आयके छठे भागका उपयोग तो करता है; परंतु धर्म या पराक्रमद्वारा स्वचक्र (अपनी मण्डलीके लोगों) तथा परचक्र (शत्रुमण्डलीके लोगों)-से प्रजाकी रक्षा नहीं करता एवं जो राजा दूसरेके राष्ट्रपर आक्रमण करनेके विषयमें सदा उद्योगहीन बना रहता है, उस प्रतापहीन राजाका राज्य शत्रुओंद्वारा नष्ट कर दिया जाता है ।।
दूसरे चक्रके राजाके लिये दूसरेके राष्ट्रका विनाश करनेपर जो पाप लागू होता है, वह समूचा पाप उस राजाको भी प्राप्त होता है, जिसका राज्य उसीकी दुर्बलताके कारण शत्रुओंद्वारा नष्ट कर दिया जाता है ।।
मामा, भानजा, माता, श्वशुर, गुरु तथा पिता--इनमेंसे प्रत्येकको छोड़कर यदि दूसरा कोई मनुष्य मारनेकी नीयतसे आ जाय तो उसे (आततायी समझकर) मार डालना चाहिये ।।
जो राजा अपने राष्ट्रकी रक्षाके लिये युद्धमें जूझता हुआ शत्रुमण्डलके द्वारा मारा जाता है, उसे जो गति मिलती है, उसको श्रवण करो ।।
वरारोहे! संग्राममें मारा गया नरेश अप्सराओंसे सेवित विमानपर आरूढ़ हो इस लोकसे इन्द्रलोकमें जाता है ।।
सुन्दरि! उसके अंगोंमें जितने रोमकूप होते हैं, उतने ही हजार वर्षोतक वह इन्द्रलोकमें सम्मानित होता है ।।
यदि कदाचित् वह फिर मनुष्यलोकमें आता है तो पुनः राजा या राजाके तुल्य ही शक्तिशाली पुरुष होता है ।।
इसलिये राजाको यत्नपूर्वक अपने राष्ट्रकी रक्षा करनी चाहिये। राजोचित व्यवहारोंका पालन, गुप्तचरोंकी नियुक्ति, सदा सत्यप्रतिज्ञ होना, प्रमाद न करना, प्रसन्न रहना, व्यवसायमें अत्यन्त कुपित न होना, भृत्यवर्गका भरण और वाहनोंका पोषण करना, योद्धाओंका सत्कार करना और किये हुए कार्यमें सफलता लाना--यह सब राजाओंका कर्तव्य है। ऐसा करनेसे उन्हें इहलोक और परलोकमें भी श्रेयकी प्राप्ति होती है ।।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)
[अहिंसाकी और इन्द्रिय-संयमकी प्रशंसा तथा दैवकी प्रधानता]
उमाने कहा--सर्वदेववन्दित देवाधिदेव महादेव! अब मैं धर्मके रहस्योंको सुनना चाहती हूँ ।।
श्रीमहेश्वरने कहा--अहिंसा परम धर्म है। अहिंसा परम सुख है। सम्पूर्ण धर्मशास्त्रोंमें अहिंसाको परमपद बताया गया है ।।
वरारोहे! देवताओं और अतिथियोंकी सेवा, निरन्तर धर्मशीलता, वेदाध्ययन, यज्ञ, तप, दान, दम, गुरु और आचार्यकी सेवा तथा तीर्थोंकी यात्रा--ये सब अहिंसा-धर्मकी सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं हैं। यह मैंने तुम्हें धर्मका परम गुह्य रहस्य बताया है, जिसकी शास्त्रोंमें भूरि-भूरि प्रशंसा की गयी है ।।
जो अपनी इन्द्रियोंका निरोध करता है, वही सुखी है और वही विद्वान है। इन्द्रियोंके निरोधसे, दानसे और इन्द्रिय-संयमसे मनुष्य मनमें जिस-जिस वस्तुकी इच्छा करता है, वह सब पा लेता है ।।
महाभागे! जिस-जिस ओरसे भारी हिंसाकी सम्भावना हो, उससे तथा मद्य और मांससे मनुष्यको निवृत्त हो जाना चाहिये। इससे हिंसाकी सम्भावना बहुत कम हो जाती है ।।
निवृत्ति परम धर्म है, निवृत्ति परम सुख है, जो मनसे विषयोंकी ओरसे निवृत्त हो गये हैं, उन्हें विशाल धर्मराशिकी प्राप्ति होती है ।।
इसमें संदेह नहीं कि धर्म और अधर्म पहले मनमें ही आते हैं। मनसे ही मनुष्य बँधता है और मनसे ही मुक्त होता है। यदि मनको वशमें कर लिया जाय, तब तो स्वर्ग मिलता है और यदि उसे खुला छोड़ दिया जाय तो नरककी प्राप्ति अवश्यम्भावी है ।।
जीव अपने पूर्वकृत कर्मके ही फलसे पशु-पक्षी एवं कीट आदि होते हैं। अपने-अपने कर्मोसे बँधे हुए प्राणी ही भिन्न-भिन्न योनियोंमें जन्म लेते हैं ।।
जो जीव जन्म लेता है, उसकी मृत्यु पहले ही पैदा हो जाती है। मनुष्यने पूर्व जन्ममें जैसा कर्म किया है, तदनुसार ही उसे सुख या दु:ख प्राप्त होता है ।।
प्राणी प्रमादमें पड़कर भले ही सो जाया, परंतु उनका प्रारब्ध या दैव प्रमादशून्य-सावधान होकर सदा जागता रहता है। उसका न कोई प्रिय है, न द्वेषपात्र है और न कोई मध्यस्थ ही है ।।
काल समस्त प्राणियोंके प्रति समान है। वह अवसरकी प्रतीक्षा करता रहता है। जिनकी आयु समाप्त हो गयी है, उन्हीं प्राणियोंका वह संहार करता है। वही समस्त देहधारियोंका जीवन है ।।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)
[त्रिवर्गकका निरूपण तथा कल्याणकारी आचार-व्यवहारका वर्णन]
श्रीमहेश्वरने कहा--प्रिये! विद्या, वार्ता, सेवा, शिल्यकला और अभिनय-कला--ये मनुष्योंके जीवन-निर्वाहके लिये पाँच वृत्तियाँ बनायी गयी हैं ।।
देवि! सभी मनुष्योंके लिये विद्याका योग पहले ही निश्चित कर दिया जाता है। विद्यासे लोग कर्तव्य और अकर्तव्यको जानते हैं, अन्यथा नहीं ।।
विद्यासे ज्ञान बढ़ता है, ज्ञानसे तत्त्वका दर्शन होता है और तत्त्वका दर्शन कर लेनेके पश्चात् मनुष्य विनीतचित्त होकर समस्त पुरुषार्थोका भाजन हो जाता है ।।
विद्यासे विनीत हुआ पुरुष संसारमें शुभ जीवन बिता सकता है; अतः अपने आपको पहले विद्याद्वारा पुरुषार्थका भाजन बनाकर क्रोधविजयी एवं जितेन्द्रिय पुरुष सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा-परमात्माका चिन्तन करे ।।
परमात्माका चिन्तन करके मनुष्य सत्पुरुषोंके लिये भी पूजनीय बन जाता है। जीवात्मा पहले कुल-परम्परासे चले आते हुए सदाचारका ही आश्रय ले ।।
देवि! यदि विद्यासे अपनी जीविका चलानेकी इच्छा हो तो शुश्रूषा आदि गुणोंसे सम्पन्न हो किसी गुरुसे राजविद्या अथवा लोकविद्याकी शिक्षा ग्रहण करे और उसे ग्रन्थ एवं अर्थके अभ्यारुद्वारा प्रयत्नपूर्वक दृढ़ करे ।।
देवि! ऐसा करनेसे मनुष्य विद्याका फल पा सकता है, अन्यथा नहीं। न्यायसे ही विद्याजनित फलोंको पानेकी इच्छा करे। वहाँ अधर्मको सर्वथा त्याग दे ।।
यदि वातवित्तिके द्वारा जीविका चलानेकी इच्छा हो तो जहाँ सींचनेके लिये जलकी व्यवस्था हो, ऐसे खेतमें तदनुरूप कार्य विधिपूर्वक करे ।।
अथवा यथासमय उस देशकी आवश्यकताके अनुसार वस्तु, उसके मूल्य, व्यय, लाभ और परिश्रम आदिका भलीभाँति विचार करके व्यापार करे ।।
देशवासी पुरुषको पशुओंका पालन-पोषण भी अवश्य करना चाहिये। अनेक प्रकारके बहुसंख्यक पशु भी उसके लिये अर्थप्राप्तिके साधक हो सकते हैं ।।
जो कोई बुद्धिमान् मनुष्य सेवाद्वारा जीवननिर्वाह करना चाहे तो वह मनको संयममें रखकर श्रवण करनेयोग्य मीठे वचनोंका प्रयोग करे ।।
जैसे-जैसे सेव्य स्वामी संतुष्ट रहे, वैसे ही वैसे उसे संतोष दिलावे। सेवकके गुणोंसे सम्पन्न हो अपने आपको स्वामीके आश्रित रखे ।।
स्वामीका कभी अप्रिय न करे, यही संक्षेपसे सेवाका स्वरूप है। उसके साथ वियोग होनेसे पहले अपने लिये दूसरी कोई गति न देखे ।।
शिल्पकर्म अथवा कारीगरी और नाट्यकर्म प्राय: निम्न जातिके लोगोंमें चलते हैं। शिल्प और नाटयमें भी यथायोग्य न्यायानुसार कार्यका वेतन लेना चाहिये ।।
सरल व्यवहारवाले सभी मनुष्योंसे सरलतासे ही वेतन लेना चाहिये। कुटिलतासे वेतन लेनेवालेके लिये वह पापका कारण बनता है ।।
जीविका-साधनके जितने उपाय हैं, उन सबके आरम्भोंपर पहले न्यायपूर्वक विचार करे। अपनी शक्ति, उपाय, देश, काल, कारण, प्रवास, प्रक्षेप और फलोदय आदिके विषयमें युक्तिपूर्वक विचार एवं चिन्तन करके दैवकी अनुकूलता देखकर जिसमें अपना हित निहित दिखायी दे, उसी उपायका आलम्बन करे ।।
इस प्रकार अपने लिये जीविकावृति चुनकर उसका सदा ही पालन करे और ऐसा प्रयत्न करे, जिससे वह दैव और मानुष विघ्नोंसे पुनः उसे छोड़ न बैठे ।।
रक्षा, वृद्धि और उपभोग करते हुए उस वृत्तिको पाकर नष्ट न करे। यदि रक्षा आदिकी चिन्ता छोड़कर केवल उपभोग ही किया जाय तो पर्वत-जैसी धनराशि भी नष्ट हो जाती है ।।
आजीविकाके उपायोंसे धनका उपार्जन करके विद्वान् पुरुष धर्म, अर्थ, काम तथा संकट-निवारण--इन चारोंके उद्देश्यसे उस धनके चार भाग करे ।।
भामिनि! इन चारों विभागोंमें भी जैसा विधान है, उसे सुनो। यज्ञ करने, दीनदुःखियोंपर अनुग्रह करके अन्न देने, देवताओं, ब्राह्मणों तथा पितरोंकी पूजा करने, मूलधनकी रक्षा करने, सत्पुरुषोंके रहने तथा क्रियापरायण धर्मात्मा पुरुषोंके सहयोगके लिये तथा इसी प्रकार अन्यान्य सत्कर्मोके उद्देश्यसे धर्मार्थ धनका दान करे ।।
फलकी प्राप्तिका विचार न करके धर्मके कार्यमें धन देना चाहिये। ऐश्वर्यपूर्ण स्थानकी प्राप्तिके लिये, राजाका प्रिय होनेके लिये, कृषि, गोरक्षा अथवा वाणिज्यके आरम्भके लिये, मन्त्रियों और मित्रोंके संग्रहके लिये, आमन्त्रण और विवाहके लिये, पूर्ण पुरुषोंकी वृत्तिके लिये, धनकी उत्पत्ति एवं प्राप्तिके लिये तथा अनर्थके निवारण और ऐसे ही अन्य कार्योंके लिये अर्थार्थ धनका त्याग करना चाहिये ।।
हेतुयुक्त अनुबन्ध (सकारण सम्बन्ध) देखकर उसके लिये धनका त्याग करना चाहिये। अर्थ अनर्थका निवारण करता है तथा धन एवं अभीष्ट फलकी प्राप्ति कराता है ।।
निर्धन मनुष्य सैकड़ों यत्न करके भी धन नहीं पा सकते। अतः धनकी रक्षा करनी चाहिये तथा विधिपूर्वक उसका दान करना चाहिये ।।
शरीरके पोषणके लिये विशेष प्रकारके आहारकी व्यवस्था तथा ऐसे ही अन्य कार्योंके निमित्त कामार्थ धनका व्यय करना उचित है ।।
गुण-दोषका विचार करके धर्म, अर्थ और काम-सम्बन्धी धनोंका तत्तत् कार्योमें व्यय करना चाहिये। शुचिस्मिते! धनका जो चौथा भाग है, उसे आपत्तिकालके लिये सदा सुरक्षित रखे ।।
शोभने! राज्य-विध्वंसका निवारण करने, दुर्भिक्षके समय काम आने, बड़े-बड़े रोगोंसे छुटकारा पाने, बुढ़ापेमें जीवन-निर्वाह करने, साहस और अमर्षपूर्वक शत्रुओंसे बदला लेने, विदेश-यात्रा करने तथा सब प्रकारकी आपत्तियोंसे छुटकारा पाने आदिके उद्देश्यसे अपने धनको अपने निकट बचाये रखना चाहिये ।।
धन संकटोंसे छुड़ानेवाला है, इसलिये इस जगत्में धनवानोंको सुख होता है ।।
वह धन यश, आयु तथा स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला है। इतना ही नहीं, वह परम यशस्वरूप है। धर्म, अर्थ और काम यह त्रिवर्ग कहलाता है। वह जिनके वशमें होता है, उन सबके लिये कल्याणकारी होता है। ऐसा बर्ताव करनेवाले लोग उभय लोकमें अपना हित साधन करते हैं ।।
प्रातःकाल उठना, शौच-स्नान करके शुद्ध होना, देवताओं और ब्राह्मणोंमें भक्ति रखते हुए गुरुजनोंकी सेवा तथा ब्राह्मण-वर्गको प्रणाम करना, बड़े-बूढ़ोंके आनेपर उठकर उनका स्वागत करना, देवस्थानमें मस्तक झुकाना, अतिथियोंके सम्मुख होकर उनका उचित आदर-सत्कार करना, बड़े-बूढ़ोंके उपदेशको मानना और आचरणमें लाना, उनके हितकर और लाभदायक वचनोंको सुनना, भृत्यवर्गको सान्त्वना और अभीष्ट वस्तुका दान देकर अपनाते हुए उसका पालन-पोषण करना, न्याययुक्त कर्म करना, अन्याय और अहितकर कार्यको त्याग देना, अपनी स्त्रीके साथ अच्छा बर्ताव करना, दोषोंका निवारण करना, पुत्रोंकोी विनय सिखाना, उन्हें भिन्न-भिन्न आवश्यक कार्योंमें लगाना, अशुभ पदार्थोंको त्याग देना, शुभ पदार्थोंका सेवन करना, कुलोचित धर्मोंका यथावत् रूपसे पालन करना और अपने ही पुरुषार्थसे सर्वथा अपने कुलकी रक्षा करना इत्यादि सारे शुभ व्यवहार वृत्त कहे गये हैं ।।
प्रतिदिन अपने हितके लिये और ज्ञान-प्राप्तिकी इच्छासे वृद्ध पुरुषोंका सेवन करे। दूसरेके द्रव्यको उससे पूछे बिना कदापि न ले ।।
धीर पुरुष दूसरेसे याचना न करे। अपने बाहुबलका भरोसा रखे। आहार और आचारव्यवहारमें भी सदा अपने शरीरकी रक्षा करे। जो भोजन हितकर एवं लाभदायक हो तथा अच्छी तरह पक गया हो, उसीको नियत मात्रामें ग्रहण करे ।।
देवताओं और अतिथियोंको पूर्णरूपसे विधिपूर्वक सत्कार करके शेष अन्नका पवित्र होकर भोजन करे और कभी किसीसे अप्रिय वचन न बोले ।।
गृहस्थ पुरुष धर्मपालनका व्रत लेकर अतिथिके लिये ठहरनेका स्थान, जल, उपहार और भिक्षा दे तथा गौओंका पालन-पोषण करे ।।
वह किसी विशेष कारणसे बाहरकी यात्रा भी कर सकता है, परंतु दोपहर या आधी रातके समय उसे प्रस्थान करनेका विचार नहीं करना चाहिये ।।
विषयोंमें डूबा न रहे। अपनी शक्तिके अनुसार धर्माचरण करे। गृहस्थ पुरुषकी जैसी आय हो, उसके अनुसार ही यदि उसका व्यय हो तो लोकमें उसकी प्रशंसा की जाती है ।।
भय अथवा लोभवश कभी ऐसा कर्म न करे जो यश और अर्थका नाशक तथा दूसरोंको पीड़ा देनेवाला हो ।।
किसी कर्मके गुण और दोषको दूरसे ही बुद्धिपूर्वक देखकर तदनन्तर उस शुभ कर्मको लाभदायक समझे तो आरम्भ करे या अशुभका त्याग करे ।।
अपने शुभ और अशुभ कर्ममें सदा अपने-आपको ही साक्षी माने और मन, वाणी तथा क्रियाद्वारा कभी पाप करनेकी इच्छा न करे ।।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)
[विविध प्रकारके कर्मफलोंका वर्णन]
उमाने पूछा--सुरासुरपते! सबकी प्रीति बढ़ानेवाले वरदायक देव! मनुष्योंमें ही कितने ही लोग क्लेशशून्य, उपद्रवरहित एवं धन-धान्यसे सम्पन्न होकर भाँति-भाँतिके भोग भोगते देखे जाते हैं और दूसरे बहुत-से मनुष्य क्लेशयुक्त, दरिद्र एवं भोगोंसे वंचित पाये जाते हैं। महादेव! मनुष्यलोकमें सब लोग समान क्यों नहीं बनाये गये (वहाँ इतनी विषमता क्यों है)? यह सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल हो रहा है ।।
श्रीमहेश्वर कहते हैं--देवि! जीव जैसा कर्म करता है, वैसा फल पाता है। वह अपने किये हुएका फल स्वयं ही भोगता है, दूसरा कोई उसे भोगनेका अधिकारी नहीं है ।।
शुभेक्षणे! जो लोग धर्म और कामसे निवृत्त हो लोभी, निर्दयी और प्रायः अपने ही शरीरके पोषक हो जाते हैं, शोभने! ऐसे लोग मृत्युके पश्चात् जब पुन: जन्म लेते हैं, तब दरिद्र और अधिक क्लेशके भागी होते हैं। इसमें संशय नहीं है ।।
उमाने पूछा--भगवन्! मनुष्योंमें जो लोग धन-धान्यसे सम्पन्न हैं, उनमेंसे भी कितने ही ऐसे हैं, जो सम्पूर्ण भोगोंके होनेपर भी भोगहीन देखे जाते हैं। वे उन भोगोंको क्यों नहीं भोगते? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ।।
श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! जो दूसरोंसे प्रेरित होकर धर्म करते हैं, स्वेच्छासे नहीं तथा धर्मविषयक श्रद्धाको दूर करके अश्रद्धासे दान या धर्म करते हैं और उसके लिये रोते या पछताते हैं; शोभने! ऐसे लोग जब मृत्युको प्राप्त होकर फिर जन्म लेते हैं तो धर्मके उन फलोंको पाकर कभी भोगते नहीं हैं। केवल खजानेकी रक्षा करनेवाले सिपाहीकी भाँति उस धनकी रखवाली करते हुए उसे बढ़ाते रहते हैं ।।
उमाने पूछा--महेश्वर! कितने ही मनुष्य धनहीन होनेपर भी भोगयुक्त दिखायी देते हैं। इसका क्या कारण है? यह मुझे बताइये ।।
श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! जो धन न होनेपर भी सदा दान देनेकी इच्छा रखते हैं, वे मनुष्य मृत्युके पश्चात् जब फिर जन्म लेते हैं, तब निर्धन होनेके साथ ही भोगयुक्त होते हैं (धर्मके प्रभावसे उनके योगक्षेमकी व्यवस्था होती रहती है) ।।
अतः धर्म और दानका उपदेश करना चाहिये--यह दिद्वानोंका निश्चय है। देवि! तुम्हारे इस प्रश्नका उत्तर तो दे दिया, अब और क्या सुनना चाहती हो? ।।
उमाने कहा--भगवन्! देवदेवेश्वर! त्रिलोचन! वृषभध्वज! देव! विभो! मनुष्य तीन प्रकारके दिखायी देते हैं ।।
कुछ लोग बैठे-बैठे ही उत्तम स्थान, ऐश्वर्य और विविध भोगोंका संग्रह पाकर उनका उपभोग करते हैं। दूसरे लोग यत्नपूर्वक भोगोंका संग्रह कर पाते हैं, और तीसरे ऐसे हैं, जो यत्न करनेपर भी कुछ नहीं पाते। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ।।
श्रीमहेश्वरने कहा--महाभागे! भामिनि! तुम न््यायतः मेरा उपदेश सुनना चाहती हो, अतः सुनो। देवि! दानधर्ममें तत्पर रहनेवाले जो मनुष्य संसारमें दानके सुयोग्य पात्रोंका विधिवत ज्ञान प्राप्त करके अथवा अनुमानसे भी उन्हें जानकर दूरसे भी स्वयं उनके पास चले जाते और उन्हें प्रसन्न करके अपनी दी हुई वस्तुएँ उन्हें स्वीकार करवाते हैं, उनके दान आदि कर्म संकेतसे ही होते हैं; अतः दान-पात्रोंको जनाये बिना ही जो उनके लिये दानकी वस्तुएँ दे देते हैं; देवि! वे ही पुनर्जन्ममें वैसे श्रेष्ठ पुरुष होते हैं तथा वे बिना यत्नके ही उन कर्मोके फलोंको प्राप्त कर लेते हैं और पुण्यके भागी होनेके कारण बैठे-बैठाये ही सब तरहके भोग भोगते हैं ।।
दूसरे जो लोग याचकोंके माँगनेपर दान देते ही हैं और जब-जब याचकने माँगा, तबतब उसे दान देकर उसके पुन: याचना करनेपर फिर दान दे देते हैं; देवि! वे मनुष्य पुनर्जन्म पानेपर यत्न और परिश्रमसे बारंबार उन दान-कर्मोके फल पाते रहते हैं ।।
कुछ लोग ऐसे हैं, जो याचना करनेपर भी याचकको कुछ नहीं देते। उनका चित्त लोभसे दूषित होता है और वे सदा दूसरोंके दोष ही देखा करते हैं ।।
शुभे! ऐसे लोग फिर जन्म लेनेपर बहुत यत्न करते रहते हैं तो भी कुछ नहीं पाते। बहुत दूँढ़नेपर भी उन्हें कोई भोग सुलभ नहीं होता ।।
जैसे बीज बोये बिना खेती नहीं उपजती, यही बात दानके फलके विषयमें समझनी चाहिये--दिये बिना किसीको कुछ नहीं मिलता। मनुष्य जो-जो देता है, केवल उसीको पाता है। देवि! यह विषय तुम्हें बताया गया। अब और क्या सुनना चाहती हो? ।।
उमाने पूछा--भगवन्! भगदेवताका नेत्र नष्ट करनेवाले महादेव! कुछ लोग बूढ़े हो जानेपर, जब कि उनके लिये भोग भोगने योग्य समय नहीं रह जाता, बहुत-से भोग और धन पा जाते हैं। वे वृद्ध होनेपर भी जहाँ-तहाँसे भोग और एऐश्वर्य प्राप्त कर लेते हैं; ऐसा किस कर्म-विपाकसे सम्भव होता है? यह मुझे बताइये ।।
श्रीमहेश्वरने कहा-देवि! मैं प्रसन्नतापूर्वक तुमसे इसका उत्तर देता हूँ, तुम एकाग्रचित्त होकर इसका तात््विक विषय सुनो। जो लोग धनसे सम्पन्न होनेपर भी दीर्घकालतक धर्मकार्यको भूले रहते हैं और जब रोगोंसे पीड़ित होते हैं, तब प्राणान्त-काल निकट आनेपर धर्म करना या दान देना आरम्भ करते हैं, शुभे! वे पुनर्जन्म लेनेपर दु:खमें मग्न हो यौवनका समय बीत जानेपर जब बूढ़े होते हैं, तब पहलेके दिये हुए दानोंके फल पाते हैं। शुभलक्षणे! देवि! यह कर्म-फल काल-योगसे प्राप्त होता है ।।
उमाने पूछा--महादेव! कुछ लोग युवावस्थामें ही भोगसे सम्पन्न होनेपर भी रोगोंसे पीड़ित होनेके कारण उन्हें भोगनेमें असमर्थ हो जाते हैं, इसका क्या कारण है? ।।
श्रीमहेश्वरने कहा--शुभलक्षणे! जो रोगोंसे कष्टमें पड़ जानेपर जब जीवनसे निराश हो जाते हैं, तब दान करना आस्मभ करते हैं। शुभे! वे ही पुनर्जन्म लेनेपर उन फलोंको पाकर रोगोंसे आक्रान्त हो उन्हें भोगनेमें असमर्थ हो जाते हैं ।।
उमाने पूछा--भगवन्! देवदेवेश्वर! मनुष्योंमें कुछ ही लोग रूपवान्, शुभ लक्षणसम्पन्न और प्रिय-दर्शन (परम मनोहर) देखे जाते हैं, किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ।।
श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! मैं प्रसन्नतापूर्वक इसका रहस्य बताता हूँ। तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो। जो मनुष्य पूर्वजन्ममें लज्जायुक्त, प्रिय वचन बोलनेवाले, शक्तिशाली और सदा स्वभावतः मधुर स्वभाववाले होकर सर्वदा समस्त प्राणियोंपर दया करते हैं, कभी मांस नहीं खाते हैं, धर्मके उद्देश्यसे वस्त्र और आभूषणोंका दान करते हैं, भूमिकी शुद्धि करते हैं, कारणवश अग्निकी पूजा करते हैं; ऐसे सदाचारसम्पन्न मनुष्य पुनर्जन्म लेनेपर रूपसौन्दर्यकी दृष्टिसे स्पृहणीय होते ही हैं, इसमें संशय नहीं है ।।
उमाने पूछा--भगवन्! मनुष्योंमें ही कुछ लोग बड़े कुरूप दिखायी देते हैं, इसमें कौन-सा कर्मविपाक कारण है? यह मुझे बताइये ।।
श्रीमहेश्वरने कहा--कल्याणि! सुनो, मैं तुमको इसका कारण बताता हूँ। पूर्वजन्ममें सुन्दर रूप पाकर जो मनुष्य दर्प और अहंकारसे युक्त हो स्तुति और निन्दा आदिके द्वारा कुरूप मनुष्योंकी बहुत हँसी उड़ाया करते हैं, दूसरोंको सताते, मांस खाते, पराया दोष देखते और सदा अशुद्ध रहते हैं, ऐसे अनाचारी मनुष्य यमलोकमें भलीभाँति दण्ड पाकर जब फिर किसी प्रकार मनुष्य-योनिमें जन्म लेते हैं, तब रूपहीन और कुरूप होते ही हैं। इसमें विचार करनेकी कोई आवश्यकता नहीं ।।
उमाने पूछा--भगवन्! देवदेवेश्वर! कुछ मनुष्य सौभाग्यशाली होते हैं, जो रूप और भोगसे हीन होनेपर भी नारीको प्रिय लगते हैं। किस कर्म-विपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ।।
श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! जो मनुष्य पहले सौम्य-स्वभावके तथा प्रिय वचन बोलनेवाले होते हैं, अपनी ही पत्नीमें संतुष्ट रहते हैं, यदि कई पत्नियाँ हों तो उन सबपर समान भाव रखते हैं, अपने स्वभावके कारण अप्रिय लगनेवाली स्त्रियोंके प्रति भी उदारतापूर्ण बर्ताव करते हैं, स्त्रियोंके दोषोंकी चर्चा नहीं करते, उनके गुणोंका ही बखान करते हैं, समयपर अन्न और जलका दान करते हैं, अतिथियोंको स्वादिष्ट अन्न भोजन कराते हैं, अपनी पत्नीके प्रति ही अनुरक्त रहनेका नियम लेते हैं, धैर्यवान् और दुःखरहित होते हैं, शोभने! ऐसे आचारवाले मनुष्य पुनर्जन्म लेनेपर सदा सौभाग्यशाली होते ही हैं। देवि! वे धनहीन होनेपर भी अपनी पत्नीके प्रीतिपात्र होते हैं ।।
उमाने पूछा--भगवन्! बहुत-से श्रेष्ठ पुरुष भोगोंसे सम्पन्न होनेपर भी दुर्भाग्यके मारे दिखायी देते हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा सम्भव होता है? यह मुझे बताइये ।।
श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! इस बातको मैं तुम्हें बताता हूँ, तुम एकाग्रचित होकर सारी बातें सुनो। जो मनुष्य पहले अपनी पत्नीकी उपेक्षा करके स्वेच्छाचारी हो जाते हैं, लज्जा और भयको छोड़ देते हैं, मन, वाणी और शरीर तथा क्रियाद्वारा दूसरोंकी बुराई करते हैं और आश्रयहीन एवं निराहार रहकर पत्नीके हृदयमें क्रोध उत्पन्न करते हैं; ऐसे दूषित आचारवाले मनुष्य पुनर्जन्म लेनेपर दुर्भाग्ययुक्त और नारी जातिके लिये अप्रिय ही होते हैं। ऐसे भाग्यहीनोंको अपनी पत्नीसे भी अनुरागजनित सुख नहीं सुलभ होता ।।
उमाने पूछा--भगवन्! देवदेवेश्वर! मनुष्योंमेंसे कुछ लोग ज्ञान-विज्ञानसे सम्पन्न, बुद्धिमान् और दिद्वान् होनेपर भी दुर्गतिमें पड़े दिखायी देते हैं। वे विधिपूर्वक यत्न करके भी उस दुर्गतिसे नहीं छूट पाते। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ।।
श्रीमहेश्वरने कहा--कल्याणि! सुनो, मैं इसका कारण तुम्हें बताता हूँ। देवि! जो मनुष्य पहले केवल विद्वान् होनेपर भी आश्रयहीन और भोजन-सामग्रीसे वंचित होकर केवल अपने ही उदर-पोषणके प्रयत्नमें लगे रहते हैं, शुभे! वे पुनर्जन्म लेनेपर ज्ञान और बुद्धिसे युक्त होनेपर भी अकिंचन ही रह जाते हैं, क्योंकि बिना बोया हुआ बीज नहीं जमता है।।
उमाने पूछा--भगवन्! इस जगत्में मूर्ख, अचेत तथा ज्ञान-विज्ञानसे रहित मनुष्य भी सब ओरसे समृद्धिशाली और दृढ़मूल दिखायी देते हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ।।
श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! जो मनुष्य पहले मूर्ख होनेपर भी सब ओर दीन-दु:खियोंपर अनुग्रह करके उन्हें दान देते रहे हैं, जो पहलेसे दानके महत्त्वको न समझकर भी जहाँ-तहाँ दान देते ही रहे हैं, शुभे! वे मनुष्य पुनर्जन्म प्राप्त होनेपर वैसी अवस्थाको प्राप्त होते ही हैं। कोई मूर्ख हो या पण्डित, प्रत्येक मनुष्य दानका फल भोगता है। बुद्धिसे अनपेक्षित दान भी सर्वथा फल देता ही है ।।
उमाने पूछा--भगवन! देवदेवेश्वर! मनुष्योंमें ही कुछ लोग बड़े मेधावी, किसी बातको एक बार सुनकर ही उसे याद कर लेनेवाले और विशद अक्षर-ज्ञानसे सम्पन्न होते हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ।।
श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! जो मनुष्य पहले मूर्ख होनेपर भी सब ओर दीन-दु:खियोंपर अनुग्रह करके उन्हें दान देते रहे हैं, जो पहलेसे दानके महत्त्वको न समझकर भी जहाँ-तहाँ दान देते ही रहे हैं, शुभे! वे मनुष्य पुनर्जन्म प्राप्त होनेपर वैसी अवस्थाको प्राप्त होते ही हैं। कोई मूर्ख हो या पण्डित, प्रत्येक मनुष्य दानका फल भोगता है। बुद्धिसे अनपेक्षित दान भी सर्वथा फल देता ही है ।।
उमाने पूछा--भगवन! देवदेवेश्वर! मनुष्योंमें ही कुछ लोग बड़े मेधावी, किसी बातको एक बार सुनकर ही उसे याद कर लेनेवाले और विशद अक्षर-ज्ञानसे सम्पन्न होते हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ।।
श्रीमहे श्वरने कहा--देवि! जो मनुष्य पहले गुरुकी अत्यन्त सेवा करनेवाले रहे हैं और ज्ञानके लिये विधिपूर्वक गुरुका आश्रय लेकर स्वयं भी दूसरोंको विधिसे ही अपनी विद्या ग्रहण कराते रहे हैं, अविधिसे नहीं। अपने ज्ञानके द्वारा जो कभी अपनी झूठी बड़ाई नहीं करते रहे हैं, अपितु शान्त और मौन रहे हैं तथा जो जगतमें यत्नपूर्वक विद्यालयोंकी स्थापना करते रहे हैं, शोभने! ऐसे पुरुष जब मृत्युको प्राप्त होकर पुनर्जन्म लेते हैं, तब मेधावी, किसी बातको एक बार ही सुनकर उसे याद कर लेनेवाले और विशद अक्षर-ज्ञानसे सम्पन्न होते हैं ।।
उमाने पूछा--देव! दूसरे मनुष्य यत्न करनेपर भी जहाँ-तहाँ शास्त्रज्ञान और बुद्धिसे बहिष्कृत दिखायी देते हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ।।
श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! जो मनुष्य ज्ञानके घमंडमें आकर अपनी झूठी प्रशंसा करते हैं और ज्ञान पाकर उसके अहंकारसे मोहित हो दूसरोंपर आक्षेप करते हैं, जिन्हें सदा अपने अधिक ज्ञानका गर्व रहता है, जो ज्ञानसे दूसरोंके दोष प्रकट किया करते हैं और दूसरे ज्ञानियोंको नहीं सहन कर पाते हैं, शोभने! ऐसे मनुष्य मृत्युके पश्चात् पुनर्जन्म लेनेपर चिरकालके बाद मनुष्य-योनि पाते हैं। देवि! उस जन्ममें वे सदा यत्न करनेपर भी बोधहीन और बुद्धिरहित होते हैं ।।
उमाने पूछा--भगवन्! कितने ही मनुष्य समस्त कल्याणमय गुणोंसे युक्त होते हैं। वे गुणवान् स्त्री-पुत्र, दास-दासी तथा अन्य उपकरणोंसे सम्पन्न होते हैं। स्थान, ऐश्वर्य तथा मनोहर भोगों और पारस्परिक समृद्धिसे संयुक्त होते हैं। रोगहीन, बाधाओंसे रहित, रूपआरोग्य और बलसे सम्पन्न, धन-धान्यसे परिपूर्ण, भाँति-भाँतिके विचित्र एवं मनोहर महल, यान और वाहनोंसे युक्त एवं सब प्रकारके भोगोंसे संयुक्त हो वे प्रतिदिन जाति-भाइयोंके साथ निर्विष्न आनन्द भोगते हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ।।
श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! यह मैं तुम्हें बताता हूँ, तुम एकाग्रचित होकर सब बातें सुनो। जो धनाढ्य या निर्धन मनुष्य पहले शास्त्रज्ञान और सदाचारसे युक्त, दान करनेके इच्छुक, शास्त्रप्रेमी, दूसरोंके इशारेको समझकर सदा दान देनेके लिये दृढ़ विचार रखनेवाले, सत्यप्रतिज्ञ, क्षमाशील, लोभ-मोहसे रहित, सुपात्रको दान देनेवाले, व्रत और नियमोंसे युक्त तथा अपने दुःखके समान ही दूसरोंके भी दुःखको समझकर किसीको दु:ख न देनेवाले होते हैं, जिनका शील-स्वभाव सौम्य होता है, आचार-व्यवहार शुभ होते हैं, जो देवताओं तथा ब्राह्मणोंके पूजक होते हैं, शोभामयी देवि! ऐसे शील-सदाचारवाले मानव पुनर्जन्म पानेपर स्वर्गमें या पृथ्वीपर अपने सत्कर्मोंके फल भोगते हैं ।।
वैसे पुरुष जब मनुष्योंमें जन्म ग्रहण करते हैं, तब वे सभी तुम्हारे बताये अनुसार कल्याणमय गुणोंसे सम्पन्न होते हैं। उन्हें रूप, द्रव्य, बल, आयु, भोग, ऐश्वर्य, उत्तम कुल और शास्त्रज्ञान प्राप्त होते हैं। इन सभी सदगुणोंकी प्राप्ति दानसे ही होती है, अन्यथा नहीं। शुभानने! तुम यह जान लो कि सब कुछ तपस्या और दानका ही फल है ।।
उमाने पूछा--प्रभो! मनुष्योंमें ही कुछ लोग दुर्गतियुक्त अधिक क्लेशसे पीड़ित, दान और भोगसे वंचित, तीन प्रकारके भयोंसे युक्त, रोग और भोगके भयसे पीड़ित, दुष्ट पत्नीसे तिरस्कृत तथा सदा सभी कार्योंमें विघ्नका ही दर्शन करनेवाले होते हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ।।
श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! जो मनुष्य पहले आसुरभावके आश्रित, क्रोध और लोभसे युक्त, भोजन-सामग्रीसे वंचित, अकर्मण्य, नास्तिक, धूर्त, मूर्ख, अपना ही पेट पालनेवाले दूसरोंको सतानेवाले तथा प्राय: सभी प्राणियोंके प्रति निर्दय होते हैं। शोभने! ऐसे आचारव्यवहारसे युक्त मनुष्य पुनर्जन्मके समय किसी प्रकार मनुष्ययोनिको पाकर जहाँ-कहीं भी उत्पन्न होते हैं, सर्वत्र अपने ही प्रमादके कारण दुःखसे पीड़ित होते हैं और जैसा तुमने बताया है, वैसे ही अवांछनीय दोषसे युक्त होते हैं ।।
देवि! मनुष्यका किया हुआ शुभ या अशुभ कर्म ही उसे सुख या दुःखरूप फलकी प्राप्ति करानेवाला है। यह बात मैंने तुम्हें बता दी। अब और क्या सुनना चाहती हो? ।।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)
[अन्धत्व और पंगुत्व आदि नाना प्रकारके दोषों और रोगोंके कारणभूत दुष्कर्मोंका वर्णन]
उमाने कहा--भगवन्! मेरी प्रीति बढ़ानेवाले देवदेवेश्वर! इस संसारमें कुछ लोग जन्मसे ही अन्धे दिखायी देते हैं और कुछ लोगोंके जन्म लेनेके पश्चात् उनकी आँखें नष्ट हो जाती हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ।।
श्रीमहेश्वरने कहा--प्रिये! जो पूर्वजन्ममें काम या स्वेच्छाचारवश पराये घरोंमें अपनी लोलुपताका परिचय देते हैं और परायी स्त्रियोंपर अपनी दूषित दृष्टि डालते हैं तथा जो मनुष्य क्रोध और लोभके वशीभूत होकर दूसरोंको अन्धा बना देते हैं, अथवा रूपविषयक लक्षणोंको जानकर उसका मभिथ्या प्रदर्शन करते हैं। ऐसे आचारवाले मनुष्य मृत्युको प्राप्त होनेपर यमदण्डसे दण्डित हो चिरकालतक नरकोॉमें पड़े रहते हैं ।।
उसके बाद यदि वे मनुष्ययोनिमें जन्म लेते हैं, तब स्वभावतः अन्धे होते हैं अथवा जन्म लेनेके बाद अन्धे हो जाते हैं या सदा ही नेत्ररोगसे पीड़ित रहते हैं। इस विषयमें विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है ।।
उमाने पूछा--प्रभो! कुछ मनुष्य सदा मुखके रोगसे व्यथित रहते हैं, दाँत, कण्ठ और कपोलोंके रोगसे अत्यन्त कष्ट भोगते हैं, कुछ तो जन्मसे ही रोगी होते हैं और कुछ जन्म लेनेके बाद कारणवश उन रोगोंके शिकार हो जाते हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ।।
श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! एकाग्रचित होकर सुनो, मैं प्रसन्नतापूर्वक तुम्हें सब कुछ बताता हूँ। जो कुवाक्य बोलनेवाले मनुष्य अपनी जिह्लासे गुरुजनों या दूसरोंके प्रति अत्यन्त कड़वे, झूठे, रूखे तथा घोर वचन बोलते हैं, जो क्रोधके कारण दूसरोंकी जीभ काट लेते हैं अथवा जो कार्यवश प्राय: अधिकाधिक झूठ ही बोलते हैं, उनके जिद्डाप्रदेशमें ही रोग होते हैं।।
जो परदोष और निन्दादियुक्त कुवचन सुनते हैं तथा जो दूसरोंके कानोंको हानि पहुँचाते हैं, वे दूसरे जन्ममें कर्ण-सम्बन्धी नाना प्रकारके रोगोंका कष्ट भोगते हैं ।।
ऐसे ही लोगोंको दन्तरोग, शिरोरोग, कर्णरोग तथा अन्य सभी मुखसम्बन्धी दोष अपनी करनीके फलरूपसे प्राप्त होते हैं ।।
उमाने पूछा--देव! मनुष्योंमें कुछ लोग सदा कुक्षि और पक्षसम्बन्धी दोषों तथा उदरसम्बन्धी रोगोंसे पीड़ित रहते हैं ।।
कुछ लोगोंके उदरमें तीखे शूल-से उठते हैं, जिनसे वे बहुत पीड़ित होते और दु:खमें डूब जाते हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ।।
श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! पहले जो मनुष्य काम और क्रोधके अत्यन्त वशीभूत हो दूसरोंकी परवा न करके केवल अपने ही लिये आहार जुटाते और खाते हैं, अभक्ष्य भोजनका दान करते हैं, विश्वस्त मनुष्योंको जहर दे देते हैं, न खानेयोग्य वस्तुएँ खिला देते हैं, शौच और मंगलाचारसे रहित होते हैं; शोभने! ऐसे आचरणवाले लोग पुनर्जन्म लेनेपर किसी तरह मानव-शरीरको पाकर उन्हीं रोगोंसे पीड़ित होते हैं ।।
देवि! नाना प्रकारके रूपवाले उन रोगोंसे पीड़ित हो वे दुःखमें निमग्न हो जाते हैं। पूर्वजन्ममें जैसा किया था वैसा भोगते हैं ।।
उमाने पूछा--देव! बहुत-से मनुष्य प्रमेहसम्बन्धी रोगोंसे पीड़ित देखे जाते हैं, कितने ही पथरी और शर्करा (पेशाबसे चीनी आना) आदि रोगोंके शिकार हो जाते हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ।।
श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! जो मनुष्य पूर्वजन्ममें परायी स्त्रियोंका सतीत्व नष्ट करनेवाले होते हैं, जो धूर्त मानव पशुयोनिमें मैथुनके लिये चेष्टा करते हैं, रूपके घमंडमें भरे हुए जो धूर्त काम-दोषसे कुमारी कन््याओं और विधवाओंके साथ बलात्कार करते हैं, शोभने! ऐसे मनुष्य मृत्युके पश्चात् जब फिर जन्म लेते हैं, तब मनुष्ययोनिमें आनेके बाद वैसे ही रोगी होते हैं। प्रिये! वे प्रमेहसम्बन्धी भयंकर रोगोंसे पीड़ित रहते हैं ।।
उमाने पूछा--भगवन्! कुछ मनुष्य सूखारोग (जिसमें शरीर सूख जाता है) से पीड़ित एवं दुर्बल दिखायी देते हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ।।
श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! जो मनुष्य मांसपर लुभाये रहते हैं, अत्यन्त लोलुप हैं, अपने लिये स्वादिष्ट भोजन चाहते हैं, दूसरोंकी भोगसामग्री देखकर जलते हैं तथा जो दूसरोंके भोगोंमें दोषदृष्टि रखते हैं, शोभने! ऐसे आचारवाले मनुष्य पुनर्जन्म लेनेपर सूखारोगसे पीड़ित हो इतने दुर्बल हो जाते हैं कि उनके शरीरमें फैली हुई नस-नाड़ियाँतक दिखायी देती हैं। देवि! वे पापकर्मोका फल भोगनेवाले मनुष्य वैसे ही होते हैं ।।
उमाने पूछा--भगवन्! कुछ मनुष्य कोढ़ी होकर कष्ट पाते हैं, यह किस कर्मविपाकका फल है? यह मुझे बताइये ।।
श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! जो मनुष्य पहले मोहवश आघात, वध, बन्धन तथा व्यर्थ दण्डके द्वारा दूसरोंके रूपका नाश करते हैं, किसीकी प्रिय वस्तु नष्ट कर देते हैं। चिकित्सक होकर दूसरोंको अपथ्य भोजन देते हैं, द्वेष और लोभके वशीभूत होकर दुष्टता करते हैं, प्राणियोंकी हिंसाके लिये निर्दय बन जाते हैं, मल देते और दूसरोंकी चेतनाका नाश करते हैं, शोभने! ऐसे आचरणवाले पुरुष पुनर्जन्मके समय यदि मनुष्य-जन्म पाते हैं तो मनुष्योंमें सदा दु:खी ही रहते हैं ।।
उस जन्ममें वे सैकड़ों कुष्ठ रोगोंसे घिरकर क्लेशसे पीड़ित होते हैं। कोई चर्मदोषसे युक्त होते हैं, कोई व्रणकुष्ठ (कोढ़के घाव) से पीड़ित होते हैं अथवा कोई सफेद कोढ़से लांछित दिखायी देते हैं। देवि! जिसने जैसा किया है उसके अनुसार फल पाकर वे सब मनुष्य नाना प्रकारके कुष्ठ रोगोंके शिकार हो जाते हैं ।।
उमाने पूछा--भगवन्! किस कर्मके विपाकसे कुछ मनुष्य अंगहीन एवं पंगु हो जाते हैं, यह मुझे बताइये ।।
श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! जो मनुष्य पहले लोभ और मोहसे आच्छादित होकर प्राणियोंके प्राणोंकी हिंसा करनेके लिये उनके अंग-भंग कर देते हैं, शस्त्रोंस काटकर उन प्राणियोंको निश्चेष्ट बना देते हैं, शोभने! ऐसे आचारवाले पुरुष मरनेके बाद पुनर्जन्म लेनेपर अंगहीन होते हैं; इसमें संशय नहीं है। वे स्वभावत: पंगुरूपमें उत्पन्न होते हैं अथवा जन्म लेनेके बाद पंगु हो जाते हैं ।।
उमाने पूछा--भगवन्! कुछ मनुष्य ग्रन्थि (गठिया), पिल््लक (फीलपाँव) आदि रोगोंसे कष्ट पाते देखे जाते हैं, इसका क्या कारण है? यह मुझे बताइये ।।
श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! जो मनुष्य पहले लोगोंकी ग्रथियोंका भेदन करनेवाले रहे हैं; जो मुष्टि-प्रहार करनेमें निर्दय, नृशंस, पापाचारी, तोड़-फोड़ करनेवाले और शूल चुभाकर पीड़ा देनेवाले रहे हैं, शोभने! ऐसे आचरणवाले लोग फिर जन्म लेनेपर गठिया और फीलपाँवसे कष्ट पाते तथा अत्यन्त दु:खी होते हैं ।।
उमाने पूछा--भगवन्! देव! कुछ मनुष्य सदा पैरोंके रोगोंसे पीड़ित दिखायी देते हैं। इसका क्या कारण है? यह मुझे बताइये ।।
श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! जो मनुष्य पहले क्रोध और लोभके वशी भूत होकर देवताके स्थानको अपने पैरोंसे भ्रष्ट करते, घुटनों और एड़ियोंसे मारकर प्राणियोंकी हिंसा करते हैं; शोभने! ऐसे आचरणवाले लोग पुनर्जन्म लेनेपर श्वपद आदि नाना प्रकारके पाद-रोगोंसे पीड़ित होते हैं ।।
उमाने पूछा--भगवन्! देव! इस भूतलपर कुछ ऐसे लोगोंकी बहुत बड़ी संख्या दिखायी देती है, जो वात, पित्त और कफजनित रोगोंसे तथा एक ही साथ इन तीनोंके संनिपातसे तथा दूसरे-दूसरे अनेक रोगोंसे कष्ट पाते हुए बहुत दुःखी रहते हैं ।।
वे धनी हों या दरिद्र, पूर्वाक्त रोगोंमेंसे कुछके द्वारा अथवा समस्त रोगोंके द्वारा कष्ट पाते रहते हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ।।
श्रीमहेश्वरने कहा--कल्याणि! इसका कारण मैं तुम्हें बताता हूँ, सुनो। देवि! जो मनुष्य पूर्वजन्ममें असुरभावका आश्रय ले स्वच्छन्दचारी, क्रोधी और गुरुद्रोही हो जाते हैं, मन, वाणी, शरीर और क्रियाद्वारा दूसरोंको दुःख देते हैं, काटते, विदीर्ण करते और पीड़ा देते हुए सदा ही प्राणियोंके प्रति निर्दयता दिखाते हैं। शोभने! ऐसे आचरणवाले लोग पुनर्जन्मके समय यदि मनुष्य-जन्म पाते हैं तो वे वैसे ही होते हैं ।।
प्रिये! उस शरीरमें वे बहुतेरे भयंकर रोगोंसे संतप्त होते हैं। किसीको उलटी होती है तो कोई खाँसीसे कष्ट पाते हैं। दूसरे बहुत-से मनुष्य ज्वर, अतिसार और तृष्णासे पीड़ित रहते हैं। किन्हींको अनेक प्रकारके पादगुल्म सताते हैं। कुछ लोग कफदोषसे पीड़ित होते हैं। कितने ही नाना प्रकारके पादरोग, व्रणकुष्ठ और भगन्दर रोगोंसे रुग्ण रहते हैं। वे धनी हों या दरिद्र सब लोग रोगोंसे पीड़ित दिखायी देते हैं ।।
इस प्रकार उन-उन शरीरोंमें वे अपने किये हुए कर्मका ही फल भोगते हैं। कोई भी बिना किये हुए कर्मके फलको नहीं पा सकता। देवि! इस प्रकार यह विषय मैंने तुम्हें बताया, अब और क्या सुनना चाहती हो? ।।
उमाने पूछा--भगवन्! देवदेवेश्वर! भूतनाथ! आपको नमस्कार है। देव! दूसरे मनुष्य छोटे शरीरवाले, टठेढ़े-मेढ़े अंगोंवाले, कुबड़े, बौने और लूले दिखायी देते हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ।।
श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! जो मनुष्य पहले लोभ और मोहसे युक्त हो खरीद-बिक्रीके लिये अनाज तौलनेके बाटोंको तोड़-फोड़कर छोटे कर देते हैं, तराजूमें भी कुछ दोष रख लेते हैं और प्रतिदिन क्रय-विक्रयके समय जब उन बाटोंको रखकर अनाज तौलते हैं, तब सभीके मालमेंसे आधेकी चोरी कर लेते हैं। जो क्रोध करते, दूसरोंके शरीरपर चोट करके उसके अंगोंमें दोष उत्पन्न कर देते हैं, जो मूर्ख मांस खाते और सदा झूठ बोलते हैं, शोभने! ऐसे आचरणवाले मनुष्य पुनर्जन्म लेनेपर छोटे शरीरवाले बौने और कुबड़े होते हैं ।।
उमाने पूछा--भगवन्! मनुष्योंमेंसे कुछ लोग उन्मत्त और पिशाचोंके समान इधरउधर घूमते दिखायी देते हैं। उनकी ऐसी अवस्थामें कौन-सा कर्म-फल कारण है? यह मुझे बताइये ।।
श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! जो मनुष्य पहले दर्प और अहंकारसे युक्त हो नाना प्रकारकी अंटशंट बातें करते हैं, दूसरोंकी खूब हँसी उड़ाते हैं, लोभवश, उन्मत्त बना देनेवाले भोगोंद्वारा दूसरोंको मोहित करते हैं, जो मूर्ख वृद्धों और गुरुजनोंका व्यर्थ ही उपहास करते हैं तथा शास्त्रज्ञानमें चतुर एवं प्रवीण होनेपर भी सदा झूठ बोलते हैं, शोभने! ऐसे आचरणवाले मनुष्य पुनर्जन्म लेनेपर उन्मत्तों और पिशाचोंके समान भटकते फिरते हैं; इसमें संशय नहीं है ।।
उमाने पूछा--भगवन्! कुछ मनुष्य संतानहीन होनेके कारण अत्यन्त दुःखी रहते हैं। वे जहाँ-तहाँसे प्रयत्न करनेपर भी संतानलाभसे वंचित ही रह जाते हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ।।
श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! जो मनुष्य पहले समस्त प्राणियोंके प्रति निर्दयताका बर्ताव करते हैं, मृगों और पक्षियोंके भी बच्चोंको मारकर खा जाते हैं, गुरुसे द्वेष रखते, दूसरोंके पुत्रोंके दोष देखते हैं, पार्वण आदि श्राद्धोंके द्वारा शास्त्रोक्त रीतिसे पितरोंकी पूजा नहीं करते; शोभने! ऐसे आचरणवाले जीव फिर जन्म लेनेपर दीर्घकालके पश्चात् मानवयोनिको पाकर संतानहीन तथा पुत्रशोकसे संतप्त होते हैं; इसमें विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है ।।
उमाने कहा--भगवन! मनुष्योंमें कुछ लोग अत्यन्त दुःखी दिखायी देते हैं। उनके निवासस्थानमें उद्वेगका वातावरण छाया रहता है। वे उद्विग्न रहकर संयमपूर्वक व्रतका पालन करते हैं। नित्य शोकमग्न तथा दुर्गतिग्रस्त रहते हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ।।
श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! जो मनुष्य पहले प्रतिदिन घूस लेते हैं, दूसरोंको डराते और उनके मनमें विकार उत्पन्न कर देते हैं, अपने इच्छानुसार दरिद्रोंका ऋण बढ़ाते हैं, जो कुत्तोंसे खेलते और वनमें मृगोंको त्रास पहुँचाते हैं, जहाँ-तहाँ प्राणियोंकी हिंसा करते हैं, जिनके घरोंमें पले हुए कुत्ते व्यर्थ ही लोगोंको डराते रहते हैं, प्रिये! ऐसे आचरणवाले मनुष्य मृत्युको प्राप्त होकर यमदण्डसे पीड़ित हो चिरकालतक नरकमें पड़े रहते हैं। फिर किसी प्रकार मनुष्यका जन्म पाकर अधिक दु:खसे भरे हुए सैकड़ों बाधाओंसे व्याप्त कुत्सित देशमें उत्पन्न हो वहाँ दुः:खी, शोकमग्न और सब ओरसे उद्विग्न बने रहते हैं ।।
उमाने पूछा--भगवन्! भगदेवताके नेत्रको नष्ट करनेवाले महादेव! मनुष्योंमें कुछ लोग कायर, नपुंसक और हिजड़े देखे जाते हैं, जो इस भूतलपर स्वयं तो नीच हैं ही, नीच कर्मोमें तत्पर रहते और नीचोंका ही साथ करते हैं। उनके नपुंसक होनेमें कौन-सा कर्मविपाक कारण होता है? यह मुझे बताइये ।।
श्रीमहेश्वरने कहा--कल्याणि! मैं वह कारण तुम्हें बताता हूँ, सुनो! जो मनुष्य पहले भयंकर कर्ममें तत्पर होकर पशुके पुरुषत्वका नाश करने अर्थात् पशुओंको बधिया करनेके कार्यद्वारा जीवननिर्वाह करते और उसीमें सुख मानते हैं, प्रिये! ऐसे आचरणवाले मनुष्य मृत्युकों पाकर यमदण्डसे दण्डित हो चिरकालतक नरकमें निवास करते हैं। यदि मनुष्यजन्म धारण करते हैं तो वैसे ही कायर, नपुंसक और हिजड़े होते हैं ।।
देवि! जैसे पुरुषोंको कर्मजनित फल प्राप्त होता है, उसी प्रकार स्त्रियोंको भी अपनेअपने कर्मोका फल भोगना पड़ता है। यह विषय मैंने तुम्हें बता दिया। अब और क्या सुनना चाहती हो? ।।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)
[उमा-महे श्वर-संवादमें कितने ही महत्त्वपूर्ण विषयोंका विवेचन]
उमाने पूछा--भगवन्! देवदेवेश्वर! मनुष्यलोकमें बहुत-सी युवती स्त्रियाँ समस्त कल्याणोंसे रहित विधवा दिखायी देती हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ।।
श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! जो स्त्रियाँ पहले जन्ममें बुद्धिमें मोह छा जानेके कारण पतिके कुटु॒म्बका व्यर्थ नाश करती हैं, विष देती, आग लगाती और पतियोंके प्रति अत्यन्त निर्दय होती हैं, अपने पतियोंसे द्वेष रखनेके कारण दूसरी स्त्रियोंके पतियोंसे सम्बन्ध स्थापित कर लेती हैं, ऐसे आचरणवाली नारियाँ यमलोकमें भलीभाँति दण्डित हो चिरकालतक नरकमें पड़ी रहती हैं। फिर किसी तरह मनुष्य-योनि पाकर वे भोगरहित विधवा हो जाती हैं ।।
उमाने पूछा--भगवन! देवदेवेश्वर! मनुष्योंमें ही कोई दासभावको प्राप्त दिखायी देते हैं, जो सब प्रकारके कर्मोंमें सर्वथा संलग्न रहते हैं। वे पीटे जाते हैं, डॉँट-फटकार सहते हैं और सब तरहसे सताये जाते हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ।।
श्रीमहेश्वरने कहा--कल्याणि! वह कारण मैं बताता हूँ, सुनो। देवि! जो मनुष्य पहले दूसरोंके धनका अपहरण करते हैं, जो क्रूरतावश किसीके ऐसे धनको हड़प लेते हैं, जिसके कारण उसके ऊपर ऋण बढ़ जाता है, जो रखनेके लिये दिये हुए या धरोहरके तौरपर रखे हुए पराये धनको दबा लेते हैं अथवा प्रमादवश दूसरोंके भूले या खोये हुए धनको हर लेते हैं, दूसरोंको वध-बन्धन और क्लेशमें डालकर उनसे अपनी दासता कराते हैं; देवि! ऐसे लोग मृत्युको प्राप्त हो यमदण्डसे दण्डित होकर जब किसी तरह मनुष्य-योनिमें जन्म लेते हैं, तब जन्मसे ही दास होते हैं और उन्हींकी सेवा करते हैं, जिनका धन उन्होंने पूर्वजन्ममें हर लिया है। जबतक उनके पापका भोग समाप्त नहीं हो जाता, तबतक वे दासकर्म ही करते रहते हैं, यही शास्त्रका निश्चय है ।।
पराये धनका अपहरण करनेवाले दूसरे लोग पशु होकर भी धनीकी सेवा करते हैं। ऐसा करनेसे उनका पूर्वापराधजनित कर्म क्षीण होता है ।।
सब प्रकारसे उस धनके स्वामीको प्रसन्न कर लेना ही उसके ऋणसे छुटकारा पानेका उपाय है, किंतु जो यथावत् रूपसे उस ऋणसे छूटना नहीं चाहता, उसे पुनर्जन्म लेकर उसकी सेवा करनी पड़ती है ।।
जो उस बन्धनसे छूटना चाहता हो, वह यथोचित रूपसे सारे काम करता और परिश्रमको सर्वथा सहता हुआ स्वामीको प्रसन्न करनेकी आकांक्षा रखे ।।
जिसे स्वामी प्रसनन््न्तापूर्वक दासताके बन्धनसे मुक्त कर देता है, वह मुक्त एवं शुद्ध हो जाता है। स्वामीको भी चाहिये कि वह ऐसे सेवकोंको सदा संतुष्ट रखे ।।
उनसे यथायोग्य कार्य कराये और विशेष कारणसे ही उन्हें दण्ड दे। जो वृद्धों, बालकों और दुर्बल मनुष्योंका पालन करता है, वह धर्मका भागी होता है। देवि! यह विषय तुम्हें बताया गया। अब और क्या सुनना चाहती हो ।।
उमाने पूछा--भगवन्! इस भूतलपर राजा लोग जिन मनुष्योंको दण्ड दे देते हैं, अब उस दण्डसे ही उनके पापोंका नाश हो जाता है या नहीं? यह मेरा संदेह है। आप इसका निवारण करें ।।
श्रीमहे श्वरने कहा--देवि! तुम्हारा संदेह ठीक है, तुम एकाग्रचित्त होकर इसका यथार्थ उत्तर सुनो। इस भूमिपर राजालोग जिस अपराधका नाम लेकर जिन मनुष्योंको दण्ड दे देते हैं, उसके लिये वे यमलोकमें यमराजके दण्डद्वारा दण्डित नहीं होते हैं ।।
इस पृथ्वीपर जो वास्तविक अपराधी बिना दण्ड पाये रह जाते हैं अथवा झूठे ही दूसरे लोग दण्डित हो जाते हैं, उस दशामें यमराज उन वास्तविक अपराधियोंको अवश्य दण्ड देते हैं; क्योंकि वे यह अच्छी तरह जानते हैं कि किसने अपराध किया है और किसने नहीं किया है ।।
कोई भी मनुष्य इस लोकमें कर्म करके यमराजको नहीं लाँध सकता, उसे अवश्य दण्ड भोगना पड़ता है। शोभने! राजा और यम सबको भरपूर दण्ड देते हैं ।।
तीनों लोकोंमें कोई भी ऐसा पुरुष नहीं है, जो कर्मोके फलका बिना भोगे नाश कर सके। प्रिये! इस विषयमें तुम्हें सारी बातें बता दीं। अब संदेहरहित हो जाओ ।।
उमाने पूछा--भगवन्! यदि ऐसी बात है तो भूमण्डलके मनुष्य पाप-कर्म करके उसके निवारणके लिये प्रायश्ित्त क्यों करते हैं? ।।
कहते हैं कि अश्वमेधयज्ञ सम्पूर्ण पापोंको हर लेनेवाला है। लोग दूसरे-दूसरे प्रायश्ित्त भी पापोंका नाश करनेके लिये ही करते हैं (इधर आप कहते हैं कि तीनों लोकोंमें कोई कर्मफलका नाश करनेवाला है ही नहीं) अतः इस विषयमें मुझे संदेह हो गया है। आप मेरे इस संदेहका निवारण करें ।।
श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! तुमने ठीक संशय उपस्थित किया है। अब एकाग्रचित्त होकर इसका वास्तविक उत्तर सुनो। पहलेके महर्षियोंके मनमें भी यह महान् संदेह बना रहा है ।।
सज्जन हों या असज्जन, सभीके द्वारा दो प्रकारका पाप बनता है, एक तो वह पाप है, जिसे सदा किसी उद्देश्यको मनमें लेकर जान-बूझकर किया जाता है और दूसरा वह है, जो अकस्मात् दैवेच्छासे बिना जाने ही बन जाता है ।।
जो उद्देश्य-सिद्धिकी कामना रखकर क्रोधपूर्वक कोई असत् कर्म करता है, उसके उस कर्मका किसी तरह नाश नहीं होता है ।।
फलाभिसन्धिपूर्वक किये गये कर्मोंका नाश सहसौ्रों अश्वमेधयज्ञों और सैकड़ों प्रायश्चित्तोंसे भी नहीं होता। इसके सिवा और प्रकारसे--असावधानी या दैवेच्छासे जो पाप बन जाता है, वह प्रायश्चित्त और अश्वमेधयज्ञसे तथा दूसरे किसी श्रेष्ठ कर्मसे नष्ट हो जाता है ।।
प्रिये! इस प्रकार पाप कर्मके विषयमें तुम्हारा यह संदेह अब दूर हो जाना चाहिये। देवि! यह विषय मैंने तुम्हें बताया। अब और क्या सुनना चाहती हो? ।।
उमाने पूछा--भगवन! देवदेवेश्वर! जगतके मनुष्य तथा दूसरे प्राणी, जो किसी कारणसे या अकारण भी मृत्युको प्राप्त हो जाते हैं, इसमें कौन-सा कर्मविपाक कारण है? यह मुझे बताइये ।।
श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! जो निर्दयी मनुष्य पहले किसी कारणसे या अकारण भी दूसरे प्राणियोंके प्राण लेते हैं, वे उसी प्रकार अपनी करनीका फल पाते हैं। विष देनेवाले विषसे ही मरते हैं और शस्त्रद्वारा दूसरोंकी हत्या करनेवाले लोग स्वयं भी जन्मान्तरमें शस्त्रोंक आघातसे ही मारे जाते हैं ।।
तुम इसीको सत्य समझो। कर्म करनेवाला मनुष्य उन कर्मोंका फल न भोगे, ऐसा कोई पुरुष न इस पृथ्वीपर है न स्वर्गमें ।।
देवता, असुर और मनुष्य कोई भी अपने कर्मोका फल भोगे बिना नहीं रह सकता। आदिकालसे ही यह संसार कर्मसे गुँथा हुआ है ।।
कर्मोके परिणामके विषयमें ये बातें संक्षेपसे बतायी गयी हैं। कर्मसंचयके विषयमें जो बात मैंने अबतक नहीं कही हो, उसे भी तुम्हें अपनी बुद्धिद्वारा तर्क--ऊहापोह करके जान लेना चाहिये। तुम्हें सुननेकी इच्छा थी, इसलिये मैंने ये सारी बातें बतायीं। अब तुम और क्या सुनना चाहती हो? ।।
उमाने पूछा--भगवन्! भगनेत्रनाशन! आपका मत है कि मनुष्योंकी जो भली-बुरी अवस्था है, वह सब उनकी अपनी ही करनीका फल है। आपके इस मतको मैंने अच्छी तरह सुना; परंतु लोकमें यह देखा जाता है कि लोग समस्त शुभाशुभ कर्मफलको ग्रहजनित मानकर प्राय: उन ग्रहनक्षत्रोंकी ही आराधना करते रहते हैं। क्या उनकी यह मान्यता ठीक है? देव! यही मेरा संशय है। आप मेरे इस संदेहका निवारण कीजिये ।।
श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! तुमने उचित संदेह उपस्थित किया है। इस विषयमें जो सिद्धान्त मत है, उसे सुनो। महाभागे! ग्रह और नक्षत्र मनुष्योंक शुभ और अशुभकी सूचनामात्र देनेवाले हैं। वे स्वयं कोई काम नहीं करते हैं ।।
प्रजाके हितके लिये ज्यौतिषचक्र (ग्रह-नक्षत्र मण्डल)-के द्वारा भूत और भविष्यके शुभाशुभ फलका बोध कराया जाता है ।।
किंतु वहाँ शुभ कर्मफलकी सूचना (उत्तम) शुभ ग्रहोंद्वारा प्राप्त होती है और दुष्कर्मके फलकी सूचना अशुभ ग्रहोंद्वारा ।।
केवल ग्रह और नक्षत्र ही शुभाशुभ कर्मफलको उपस्थित नहीं करते हैं। सारा अपना ही किया हुआ कर्म शुभाशुभ फलका उत्पादक होता है। ग्रहोंने कुछ किया है--यह कथन लोगोंका प्रवादमात्र है |।
उमाने पूछा--भगवन्! जीव नाना प्रकारके शुभाशुभ कर्म करके जब दूसरा जन्म धारण करता है, तब दोनोंमेंसे पहले किसका फल भोगता है, शुभका या अशुभका? देव! यह मेरा संशय है। आप इसे मिटा दीजिये ।।
श्रीमहे श्वरने कहा--देवि! तुम्हारा संदेह उचित ही है, अब मैं तुम्हें इसका यथार्थ उत्तर देता हूँ। कुछ लोगोंका कहना है कि पहले अशुभ कर्मका फल मिलता है, दूसरे कहते हैं कि पहले शुभ कर्मका फल प्राप्त होता है। परंतु ये दोनों ही बातें मिथ्या कही गयी हैं। सच्ची बात क्या है? यह मैं तुम्हें बता रहा हूँ ।।
इस पृथ्वीपर मनुष्य क्रमश: दोनों प्रकारके फल भोगते देखे जाते हैं। कभी धनकी वृद्धि होती है कभी हानि, कभी सुख मिलता है कभी दुःख, कभी निर्भयता रहती है और कभी भय प्राप्त होता है। इस प्रकार सभी फल क्रमश: भोगने पड़ते हैं ।।
कभी धनाढ्य लोग दुःखका अनुभव करते हैं और कभी दरिद्र भी सुख भोगते हैं। इस प्रकार एक ही साथ लोग शुभ और अशुभका भोग करते देखे जाते हैं। सारा जगत् इस बातका साक्षी है ।।
प्रिये! किंतु नरक और स्वर्गलोकमें ऐसी स्थिति नहीं है। नरकमें सदा दुःख ही दुःख है और स्वर्गमें सदा सुख ही सुख ।।
शुभे! वहाँ भी शुभ या अशुभमेंसे जो बहुत अधिक होता है, उसका भोग पहले और जो बहुत कम होता है, उसका भोग पीछे होता है। ये सब बातें मैंने तुम्हें बता दीं, अब और क्या सुनना चाहती हो? ।।
उमाने पूछा--भगवन्! इस लोकमें प्राणी किस कारणसे मर जाते हैं? जन्म ले-लेकर वे यहीं बने क्यों नहीं रहते हैं? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ।।
श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! इस विषयमें जो यथार्थ बात है, वह मैं तुम्हें बता रहा हूँ। कर्मोका भोग समाप्त होनेपर आत्मा इस शरीरको कैसे छोड़ता है? यह एकाग्रचित्त होकर सुनो ।।
शरीर और आत्माका (जड और चेतनका) जो संयोग है, उसीको जीव या प्राणी कहते हैं। इनमें आत्माको नित्य और शरीरको अनित्य बताया जाता है ।।
जब कालसे आक्रान्त होकर शरीर जरावस्थासे जर्जर हो जाता है, कोई कर्म करने योग्य नहीं रह जाता और सर्वथा गल जाता है, तब देहधारी जीव उसे त्यागकर चल देता है।।
नित्य जीवात्मा जब अनित्य शरीरको त्यागकर चला जाता है, तब लोकमें उस प्राणीकी मृत्यु हुई मानी जाती है। देवता, असुर और मनुष्य कोई भी कालका उल्लंघन नहीं कर सकते ।।
जैसे आकाशमें कोई भी जड द्रव्य स्थिर नहीं रह सकता, उसी प्रकार यह काल निरन्तर दौड़ लगाता रहता है। एक क्षण भी स्थिर नहीं रहता ।।
वह जीव फिर किसी दूसरे शरीरमें प्रवेश करके अन्यत्र जन्म लेता है। इस प्रकार आदि कालसे ही लोककी सदा ऐसी ही गति चल रही है ।।
उमाने पूछा--भगवन्! इस संसारमें बाल्यावस्थामें भी प्राणियोंकी मृत्यु होती देखी जाती है और अत्यन्त वृद्ध मनुष्य भी चिरजीवी होकर जीवित दिखायी देते हैं ।।
महेश्वर! केवल काल-मृत्यु अर्थात् वृद्धावस्थामें ही मृत्यु होनेकी बात प्रमाणभूत नहीं रह गयी है; अतः प्राणियोंके जीवनके लिये उठे हुए मेरे इस संदेहका आप निवारण कीजिये ।।
श्रीमहे श्वरने कहा--देवि! इसका कारण सुनो। इस विषयमें एक ही निर्णय है ।।
जबतक पूर्वकृत कर्म (प्रारब्ध) शेष है, तबतक मनुष्य जीवित रहता है। उसी कर्मके अधीन होकर प्रारब्ध भोगका काल समाप्त होनेपर बालक भी मर जाते हैं और उसी कर्मकी मात्राके अनुसार वृद्ध पुरुष भी दीर्घकालतक जीवित रहते हैं। देवि! यह सब विषय तुम्हें बताया गया। प्रिये इस विषयमें अब तुम संशयरहित हो जाओ ।।
उमाने पूछा--भगवन्! किस आचरणसे मनुष्य चिरजीवी होते हैं और किससे अल्पायु हो जाते हैं? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ।।
श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! यह सारा गूढ़ रहस्य मनुष्योंके लिये परम लाभदायक है। जिस आचरणसे सम्पन्न मनुष्य चिरजीवी होते हैं, वह सब सुनो ।।
अहिंसा, सत्यभाषण, क्रोधका त्याग, क्षमा, सरलता, गुरुजनोंकी नित्य सेवा, बड़ेबूढ़ोंका पूजन, पवित्रताका ध्यान रखकर न करनेयोग्य कर्मोंका त्याग, सदा ही पथ्य भोजन इत्यादि गुणोंवाला आचार दीर्घजीवी मनुष्योंका है ।।
तपस्या, ब्रह्मचर्य तथा रसायनके सेवनसे मनुष्य अधिक धैर्यशाली, बलवान् और चिरजीवी होते हैं ।।
धर्मात्मा पुरुष स्वर्गमें हो या मनुष्यलोकमें, वे दीर्घधकालतक अपने पदपर बने रहते हैं। इनके सिवा दूसरे जो पापकर्मी प्रायः झूठ बोलनेवाले, हिंसाप्रेमी, गुरुद्रोही, अकर्मण्य, शौचाचारसे रहित, नास्तिक, घोरकर्मी, सदा मांस खाने और मद्य पीनेवाले, पापाचारी, गुरुसे द्वेष रखनेवाले, क्रोधी और कलहप्रेमी हैं, ऐसे असदाचारी पुरुष चिरकालतक नरकमें पड़े रहते हैं तथा तिर्यग्योनिमें स्थित होते हैं, वे मनुष्य-शरीरमें अत्यन्त अल्प समयतक ही रहते हैं ।।
इसीलिये ऐसे मनुष्य अल्पायु होते हैं। अगम्य स्थानोंमें जानेसे, अपथ्य वस्तुओंका भोजन करनेसे मनुष्योंकी आयु क्षीण होती है, क्योंकि वे आयुका नाश करनेवाले हैं ।
ऊपर बताये हुए कारणोंसे मनुष्य अल्पायु होते हैं, अन्यथा चिरजीवी होते हैं। यह सारा विषय मैंने तुम्हें बता दिया। अब और क्या सुनना चाहती हो? ।।
उमाने पूछा--देवदेव! महादेव! भगवन्! यह विषय तो मैंने अच्छी तरह सुन लिया। अब यह बताइये कि आत्माका स्त्री या पुरुषमेंसे किस जातिके साथ सम्बन्ध है? ।।
जीवात्मा स्त्रीरूप है या पुरुषरूप? एक है या अलग-अलग? देव! यह मेरा संशय है। आप इसका निवारण करें ।।
श्रीमहे श्वरने कहा--जीवात्मा सदा ही निर्विकार है! वह न स्त्री है न पुरुष। वह कर्मके अनुसार विभिन्न जातियोंमें जन्म लेता है। पुरुषोचित कर्म करके स्त्री भी पुरुष हो सकती है ।और स्त्री-भावनासे युक्त पुरुष तदनुरूप कर्म करके उस कर्मके अनुसार स्त्री हो सकता है ।।
उमाने पूछा--भगवन! सर्वलोकेश्वर! यदि आत्मा कर्म नहीं करता तो शरीरमें दूसरा कौन कर्म करनेवाला है? यह मुझे बताइये ।।
श्रीमहेश्वरने कहा--भामिनि! कर्ता कौन है? यह सुनो। आत्मा कर्म नहीं करता है। प्रकृतिके गुणोंसे युक्त प्राणीद्वारा ही सदा कर्म किया जाता है ।।
जगतमें प्राणियोंका शरीर जैसे वात, पित्त और कफ--इन तीन दोषोंसे व्याप्त रहता है, इसी प्रकार प्राणी सत्त्व, रज और तम--इन गुणोंसे व्याप्त होता है ।।
सत्त्व, रज और तम--ये तीनों शरीरधारीके गुण हैं। इनमेंसे सत्त्व सदा प्रकाशस्वरूप माना गया है। रजोगुण दुःखरूप और तमोगुण मोहरूप बताया गया है। लोकमें इन तीनों गुणोंसे युक्त कर्मकी प्रवृत्ति होती है ।।
सत्यभाषण, प्राणियोंपर दया, शौच, श्रेय, प्रीति, क्षमा और इन्द्रिय-संयम--ये तथा ऐसे ही अन्य कर्म भी सात्त्विक कहलाते हैं ।।
दक्षता, कर्मपरायणता, लोभ, विधिके प्रति मोह, स्त्री-संग, माधुर्य तथा सदा ऐश्वर्यका लोभ--ये नाना प्रकारके भाव और कर्म रजोगुणसे प्रकट होते हैं ।।
असत्यभाषण, रूखापन, अत्यन्त अधीरता, हिंसा, असत्य, नास्तिकता, निद्रा, आलस्य और भय--ये तथा पापयुक्त कर्म तमोगुणसे प्रकट होते हैं ।।
इसलिये समस्त शुभाशुभ कार्यारम्भ गुणमय है, अतः आत्माको व्यग्रतारहित, अकर्ता और अविनाशी समझो ।।
सात््विक मनुष्य पुण्यलोकोंमें जाते हैं। राजस जीव मनुष्यलोकमें स्थित होते हैं तथा तमोगुणी मनुष्य पशु-पक्षियोंकी योनिमें और नरकमें स्थित होते हैं ।।
उमाने पूछा--इस शरीरके भेदनसे अथवा शस्त्रद्वारा मारे जानेसे आत्मा स्वयं ही क्यों चला जाता है? यह मुझे बताइये ।।
श्रीमहेश्वरने कहा--कल्याणि! इसका कारण मैं बताता हूँ, सुनो। इस विषयमें सूक्ष्म बुद्धिवाले विद्वान् भी मोहित हो जाते हैं ।।
जन्मधारी प्राणियोंके कर्मोंका क्षय हो जानेपर इस देहमें जिस किसी भी कारणसे उपद्रव होने लगता है। उसके कारण शरीरका क्षय हो जानेपर देहाभिमानी जीव कर्मके अधीन हो उस शरीरको त्यागकर चला जाता है ।।
शरीर क्षीण होता है, आत्मा नहीं। वह वेदनाओंसे भी विचलित नहीं होता। जबतक कर्मफल शेष रहता है, तबतक जीवात्मा इस शरीरमें स्थित रहता है और कर्मोंका क्षय होनेपर पुनः चला जाता है ।।
आदिकालसे ही इस जगत्में आत्माकी ऐसी ही गति मानी गयी है। देवि! यह सब विषय तुम्हें बताया गया। अब और क्या सुनना चाहती हो? ।।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)
(नोट:- ये अध्याय समाप्त नहीं हुआ है,, आगे निरंतर है,)
1269 पेज तक




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